14 सितंबर 2026
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एमएमडीआर कानून लागू होने पर बाबूलाल मरांडी का वार: झारखंड का ₹450 कोयला टैक्स गैरकानूनी, बिजली होगी महंगी

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एमएमडीआर कानून लागू होने पर बाबूलाल मरांडी का वार: झारखंड का ₹450 कोयला टैक्स गैरकानूनी, बिजली होगी महंगी

सारांश

झारखंड में कोयले पर ₹450 प्रति टन का अतिरिक्त कर एक राज्यस्तरीय फैसला है — लेकिन इसके नतीजे राष्ट्रव्यापी होंगे। नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी का कहना है कि संशोधित एमएमडीआर कानून अब राज्यों की इस मनमानी पर रोक लगाता है, और यह कर बिजली दरों व देश की विकास गति दोनों को नुकसान पहुँचाएगा।

मुख्य बातें

नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने 14 सितंबर 2026 को झारखंड सरकार के कोयले पर ₹450 प्रति टन के अतिरिक्त कर का विरोध किया।
संशोधित एमएमडीआर अधिनियम के तहत अब कोई भी राज्य सरकार प्रमुख खनिजों पर मनमाने ढंग से कर नहीं लगा सकती।
30 टन कोयला ले जाने वाले एक ट्रक पर ₹13,500 की अतिरिक्त लागत आएगी, जो सीधे बिजली उत्पादन को प्रभावित करेगी।
मरांडी के अनुसार, इस कर से बिजली महंगी होगी और देश के व्यापार व उद्योग प्रभावित होंगे।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एमएमडीआर संशोधन को संभव करने का श्रेय देते हुए मरांडी ने इसे 'बड़ी उपलब्धि' बताया।

झारखंड के नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने 14 सितंबर 2026 को रांची में राज्य सरकार द्वारा कोयले पर लगाए गए ₹450 प्रति टन के अतिरिक्त कर पर कड़ा एतराज जताया और कहा कि संशोधित एमएमडीआर (खान एवं खनिज विकास एवं विनियमन) अधिनियम के लागू होने के बाद अब कोई भी राज्य सरकार प्रमुख खनिजों पर मनमाने ढंग से कर नहीं लगा सकती। मरांडी के अनुसार, यह अतिरिक्त कर न केवल बिजली को महंगा करेगा, बल्कि देश की आर्थिक विकास गति को भी धीमा करेगा।

मुख्य आरोप और तर्क

बाबूलाल मरांडी ने कहा, 'संशोधित एमएमडीआर अधिनियम अब कानून बन गया है और वह पूरे देश में लागू होता है तथा प्रमुख खनिजों को कवर करता है। अब कोई भी राज्य सरकार मनमाने ढंग से कर नहीं लगा सकती। जब कोई राज्य सरकार मनमाने ढंग से कर लगाती है, तो इसका असर सिर्फ राज्य पर नहीं, बल्कि पूरे देश पर पड़ता है।'

उन्होंने जोड़ा कि ₹450 के अतिरिक्त कर का व्यावहारिक अर्थ है कि 30 टन कोयला ले जाने वाले प्रत्येक ट्रक पर ₹13,500 की अतिरिक्त लागत आएगी। यह बढ़ी हुई लागत सीधे बिजली उत्पादन संयंत्रों तक पहुँचेगी और अंततः घरेलू तथा औद्योगिक बिजली उपभोक्ताओं की जेब पर बोझ बनेगी।

आम जनता और उद्योगों पर असर

मरांडी ने तर्क दिया कि कोयला सीधे ताप विद्युत संयंत्रों में जाता है, जो देश की बिजली आपूर्ति की रीढ़ हैं। कोयले पर अतिरिक्त लागत का अर्थ है उत्पादन लागत में वृद्धि, जिसका बोझ अंततः आम उपभोक्ताओं और उद्योगों पर स्थानांतरित होगा। उन्होंने कहा कि व्यापार और उद्योग तभी फल-फूल सकते हैं जब सस्ती बिजली सुनिश्चित हो।

गौरतलब है कि झारखंड देश के प्रमुख कोयला उत्पादक राज्यों में से एक है और यहाँ से निकला कोयला कई राज्यों के बिजली संयंत्रों को ईंधन देता है। ऐसे में, राज्य स्तर पर लगाया गया अतिरिक्त कर राष्ट्रीय बिजली अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने की क्षमता रखता है।

एमएमडीआर संशोधन का महत्व

मरांडी ने संशोधित एमएमडीआर अधिनियम को एक 'बड़ी उपलब्धि' बताया और कहा कि अब तक कोई भी इसे संभव नहीं कर पाया था। उन्होंने इसका श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को देते हुए कहा कि मोदी ने इसे देश के लिए संभव कर दिखाया। यह कानून प्रमुख खनिजों पर राज्यों की स्वायत्त कर-निर्धारण शक्ति को सीमित करता है, जिससे खनिज क्षेत्र में एकसमान राष्ट्रीय नीति का मार्ग प्रशस्त होता है।

यह ऐसे समय में आया है जब खनिज-समृद्ध राज्यों और केंद्र के बीच राजस्व बँटवारे को लेकर लंबे समय से विवाद चला आ रहा है। संशोधित कानून राज्यों की इस शक्ति पर अंकुश लगाता है, जिसे विपक्ष अपने पक्ष में एक राजनीतिक हथियार के रूप में भी देख रहा है।

राजनीतिक परिदृश्य

झारखंड में सत्तारूढ़ सरकार और नेता प्रतिपक्ष के बीच खनन कर को लेकर यह टकराव राज्य की राजनीति में एक नया मोर्चा खोल रहा है। बाबूलाल मरांडी का यह बयान राज्य सरकार पर केंद्रीय कानून की अनदेखी का आरोप है, जो आने वाले दिनों में कानूनी और राजनीतिक बहस का केंद्र बन सकता है।

आगे देखना होगा कि झारखंड सरकार इस कर के बचाव में क्या कानूनी स्थिति अपनाती है और क्या केंद्र सरकार इस मामले में कोई हस्तक्षेप करती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

जहाँ खनिज-समृद्ध राज्य अपने राजस्व अधिकारों को लेकर केंद्र से लगातार टकराते रहे हैं। ₹450 प्रति टन का कर अपने आप में एक राज्यस्तरीय निर्णय है, लेकिन झारखंड की केंद्रीय भूमिका को देखते हुए इसके प्रभाव दूसरे राज्यों की बिजली दरों तक पहुँचते हैं — यही इस बहस की असली जटिलता है। संशोधित एमएमडीआर कानून का उल्लेख राजनीतिक रूप से सुविधाजनक है, लेकिन यह कानून ठीक किस हद तक राज्य की कर-शक्ति को सीमित करता है, इसका कानूनी स्पष्टीकरण अभी अदालतों में तय होना बाकी है — और यही वह सूक्ष्म पहलू है जिसे अधिकांश राजनीतिक बयानों में नजरअंदाज किया जा रहा है।
RashtraPress
14 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

एमएमडीआर अधिनियम क्या है और यह झारखंड के कोयला टैक्स से कैसे जुड़ा है?
एमएमडीआर (खान एवं खनिज विकास एवं विनियमन) अधिनियम भारत में खनिज खनन को नियंत्रित करने वाला केंद्रीय कानून है। इसके संशोधित स्वरूप के अनुसार, राज्य सरकारें प्रमुख खनिजों — जिनमें कोयला शामिल है — पर मनमाने ढंग से अतिरिक्त कर नहीं लगा सकतीं। नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी का तर्क है कि झारखंड सरकार का ₹450 प्रति टन कोयला टैक्स इसी कानून का उल्लंघन है।
झारखंड सरकार ने कोयले पर कितना अतिरिक्त कर लगाया है?
झारखंड सरकार ने कोयले पर ₹450 प्रति टन का अतिरिक्त कर लगाया है। इसका व्यावहारिक असर यह है कि 30 टन कोयला ले जाने वाले एक ट्रक पर ₹13,500 की अतिरिक्त लागत आएगी।
इस कोयला टैक्स से आम जनता पर क्या असर पड़ेगा?
बाबूलाल मरांडी के अनुसार, कोयले की बढ़ी हुई लागत सीधे बिजली उत्पादन संयंत्रों तक पहुँचेगी, जिससे बिजली महंगी होगी। इससे घरेलू उपभोक्ताओं के बिजली बिल बढ़ेंगे और उद्योग व व्यापार भी प्रभावित होंगे, जो अंततः देश की विकास गति को धीमा कर सकता है।
एमएमडीआर संशोधन का श्रेय किसे दिया गया है?
नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने संशोधित एमएमडीआर अधिनियम को 'बड़ी उपलब्धि' बताते हुए इसका श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दिया। उनके अनुसार, यह काम पहले कोई नहीं कर पाया था और मोदी ने इसे संभव कर दिखाया।
क्या राज्य सरकारें अब खनिजों पर कोई टैक्स नहीं लगा सकतीं?
संशोधित एमएमडीआर अधिनियम के तहत राज्य सरकारें प्रमुख खनिजों पर मनमाने ढंग से अतिरिक्त कर नहीं लगा सकतीं। हालांकि, इस कानून की सटीक सीमाएँ और झारखंड के मामले में इसकी लागूता कानूनी रूप से अभी पूरी तरह परिभाषित होनी बाकी है।
राष्ट्र प्रेस
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