एमएमडीआर कानून लागू होने पर बाबूलाल मरांडी का वार: झारखंड का ₹450 कोयला टैक्स गैरकानूनी, बिजली होगी महंगी
सारांश
मुख्य बातें
झारखंड के नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने 14 सितंबर 2026 को रांची में राज्य सरकार द्वारा कोयले पर लगाए गए ₹450 प्रति टन के अतिरिक्त कर पर कड़ा एतराज जताया और कहा कि संशोधित एमएमडीआर (खान एवं खनिज विकास एवं विनियमन) अधिनियम के लागू होने के बाद अब कोई भी राज्य सरकार प्रमुख खनिजों पर मनमाने ढंग से कर नहीं लगा सकती। मरांडी के अनुसार, यह अतिरिक्त कर न केवल बिजली को महंगा करेगा, बल्कि देश की आर्थिक विकास गति को भी धीमा करेगा।
मुख्य आरोप और तर्क
बाबूलाल मरांडी ने कहा, 'संशोधित एमएमडीआर अधिनियम अब कानून बन गया है और वह पूरे देश में लागू होता है तथा प्रमुख खनिजों को कवर करता है। अब कोई भी राज्य सरकार मनमाने ढंग से कर नहीं लगा सकती। जब कोई राज्य सरकार मनमाने ढंग से कर लगाती है, तो इसका असर सिर्फ राज्य पर नहीं, बल्कि पूरे देश पर पड़ता है।'
उन्होंने जोड़ा कि ₹450 के अतिरिक्त कर का व्यावहारिक अर्थ है कि 30 टन कोयला ले जाने वाले प्रत्येक ट्रक पर ₹13,500 की अतिरिक्त लागत आएगी। यह बढ़ी हुई लागत सीधे बिजली उत्पादन संयंत्रों तक पहुँचेगी और अंततः घरेलू तथा औद्योगिक बिजली उपभोक्ताओं की जेब पर बोझ बनेगी।
आम जनता और उद्योगों पर असर
मरांडी ने तर्क दिया कि कोयला सीधे ताप विद्युत संयंत्रों में जाता है, जो देश की बिजली आपूर्ति की रीढ़ हैं। कोयले पर अतिरिक्त लागत का अर्थ है उत्पादन लागत में वृद्धि, जिसका बोझ अंततः आम उपभोक्ताओं और उद्योगों पर स्थानांतरित होगा। उन्होंने कहा कि व्यापार और उद्योग तभी फल-फूल सकते हैं जब सस्ती बिजली सुनिश्चित हो।
गौरतलब है कि झारखंड देश के प्रमुख कोयला उत्पादक राज्यों में से एक है और यहाँ से निकला कोयला कई राज्यों के बिजली संयंत्रों को ईंधन देता है। ऐसे में, राज्य स्तर पर लगाया गया अतिरिक्त कर राष्ट्रीय बिजली अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने की क्षमता रखता है।
एमएमडीआर संशोधन का महत्व
मरांडी ने संशोधित एमएमडीआर अधिनियम को एक 'बड़ी उपलब्धि' बताया और कहा कि अब तक कोई भी इसे संभव नहीं कर पाया था। उन्होंने इसका श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को देते हुए कहा कि मोदी ने इसे देश के लिए संभव कर दिखाया। यह कानून प्रमुख खनिजों पर राज्यों की स्वायत्त कर-निर्धारण शक्ति को सीमित करता है, जिससे खनिज क्षेत्र में एकसमान राष्ट्रीय नीति का मार्ग प्रशस्त होता है।
यह ऐसे समय में आया है जब खनिज-समृद्ध राज्यों और केंद्र के बीच राजस्व बँटवारे को लेकर लंबे समय से विवाद चला आ रहा है। संशोधित कानून राज्यों की इस शक्ति पर अंकुश लगाता है, जिसे विपक्ष अपने पक्ष में एक राजनीतिक हथियार के रूप में भी देख रहा है।
राजनीतिक परिदृश्य
झारखंड में सत्तारूढ़ सरकार और नेता प्रतिपक्ष के बीच खनन कर को लेकर यह टकराव राज्य की राजनीति में एक नया मोर्चा खोल रहा है। बाबूलाल मरांडी का यह बयान राज्य सरकार पर केंद्रीय कानून की अनदेखी का आरोप है, जो आने वाले दिनों में कानूनी और राजनीतिक बहस का केंद्र बन सकता है।
आगे देखना होगा कि झारखंड सरकार इस कर के बचाव में क्या कानूनी स्थिति अपनाती है और क्या केंद्र सरकार इस मामले में कोई हस्तक्षेप करती है।