चरक-सुश्रुत संहिता की पुस्तक कूटनीति से भारतीय ज्ञान परंपरा विश्व पटल पर: व्योमेश शुक्ला
सारांश
मुख्य बातें
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा स्लोवाकिया संसद के स्पीकर को चरक संहिता और सुश्रुत संहिता भेंट किए जाने को हिंदी के प्रतिष्ठित कवि एवं नागरी प्रचारिणी सभा के प्रमुख व्योमेश शुक्ला ने भारतीय ज्ञान परंपरा के वैश्विक प्रसार की दिशा में एक ऐतिहासिक पहल करार दिया। उनके अनुसार यह कदम महज कूटनीतिक शिष्टाचार नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक और ज्ञानात्मक कूटनीति का एक सशक्त प्रतीक है।
पुस्तक कूटनीति का महत्व
व्योमेश शुक्ला ने कहा कि चरक को भारतीय चिकित्सा विज्ञान का प्रथम पुरुष माना जाता है, जबकि सुश्रुत को शल्य चिकित्सा का जनक। उन्होंने स्पष्ट किया कि इन ग्रंथों का विश्व मंच पर आदान-प्रदान भारत की प्राचीन विद्या, संस्कृति और बौद्धिक परंपरा के महत्व को नई ऊर्जा देता है। यह ऐसे समय में आया है जब भारत वैश्विक स्तर पर अपनी सॉफ्ट पावर को सुदृढ़ करने में जुटा है।
पुस्तक-संस्कृति की पुनर्स्थापना की ज़रूरत
शुक्ला ने रेखांकित किया कि तकनीक के इस युग में पुस्तकें जीवन के केंद्र से दूर होती जा रही हैं। ऐसे में पुस्तकों को उपहार स्वरूप देने और प्राप्त करने की परंपरा को पुनर्जीवित करना अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि प्रधानमंत्री मोदी की इस पहल से भारतीय भाषाओं, साहित्य और प्राचीन ग्रंथों के विदेशी भाषाओं में अनुवाद को बल मिलेगा।
भारतीय ज्ञान-संपदा का वैश्विक विस्तार
शुक्ला के अनुसार वैदिक वाङ्मय, आयुर्वेद, नाट्यशास्त्र, संगीत और अन्य भारतीय विद्याओं का विशाल भंडार पुस्तकों में सुरक्षित है। उन्होंने कहा कि इन्हें केवल संरक्षित रखना पर्याप्त नहीं — इन्हें पढ़ना, समझना और दुनिया तक पहुँचाना भी उतना ही ज़रूरी है। गौरतलब है कि भारत सरकार हाल के वर्षों में विदेश नीति में सांस्कृतिक तत्वों को प्राथमिकता देती रही है।
ज्ञान-आधारित कूटनीति को नई दिशा
व्योमेश शुक्ला ने कहा कि भारत के पास विश्व को देने के लिए बहुत कुछ है और हमारे प्राचीन ग्रंथ उसी ज्ञान के जीवंत प्रमाण हैं। उनके अनुसार पुस्तकों का यह आदान-प्रदान भारतीय अतिथि-सत्कार, सांस्कृतिक सौहार्द और ज्ञान-आधारित कूटनीति को नई मज़बूती प्रदान करेगा। इस पहल से भारत की ज्ञान-संपदा विश्व के अधिकाधिक लोगों तक पहुँचने का मार्ग प्रशस्त होगा।