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मोदी-पेजेश्कियन फोन वार्ता: पश्चिम एशिया युद्धविराम का स्वागत, कूटनीति पर भारत का जोर

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मोदी-पेजेश्कियन फोन वार्ता: पश्चिम एशिया युद्धविराम का स्वागत, कूटनीति पर भारत का जोर

सारांश

पश्चिम एशिया में युद्धविराम सहमति के बाद PM मोदी ने ईरानी राष्ट्रपति पेजेश्कियन से फोन पर बात की — यह तीन महीनों में तीसरी वार्ता है। भारत ने कूटनीति और समुद्री मार्गों की सुरक्षा पर जोर देते हुए क्षेत्र में अपनी सक्रिय भूमिका का संकेत दिया।

मुख्य बातें

PM नरेंद्र मोदी ने 30 जून 2026 की शाम ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन से फोन पर बातचीत की।
मोदी ने पश्चिम एशिया में संघर्ष समाप्त करने की युद्धविराम सहमति का स्वागत किया।
भारत ने दोहराया कि सभी विवादों का हल बातचीत और कूटनीति से होना चाहिए।
मोदी ने समुद्री मार्गों पर निर्बाध व्यापार और आवाजाही की अहमियत पर जोर दिया।
यह मार्च 2026 के बाद दोनों नेताओं के बीच तीसरी प्रमुख टेलीफोन वार्ता है।
ईरान के विदेश मंत्री अराघची ने चाबहार बंदरगाह को भारत के लिए मध्य एशिया और यूरोप का 'सुनहरा द्वार' बताया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार, 30 जून 2026 की शाम ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन से टेलीफोन पर बातचीत की और पश्चिम एशिया में हालिया संघर्ष को समाप्त करने के लिए बनी सहमति का स्वागत किया। इस वार्ता में दोनों नेताओं ने क्षेत्रीय स्थिरता, समुद्री मार्गों की सुरक्षा और द्विपक्षीय सहयोग पर विस्तार से चर्चा की।

वार्ता में क्या हुआ

बातचीत के दौरान राष्ट्रपति पेजेश्कियन ने प्रधानमंत्री मोदी को पश्चिम एशिया के हालिया घटनाक्रम और आगे की स्थिति से अवगत कराया। मोदी ने युद्धविराम सहमति का स्वागत करते हुए कहा कि क्षेत्र में स्थायी शांति और स्थिरता के लिए निरंतर प्रयास अनिवार्य हैं। उन्होंने एक बार फिर भारत का यह सुस्थापित रुख दोहराया कि सभी विवादों का समाधान बातचीत और कूटनीति के माध्यम से ही होना चाहिए।

समुद्री मार्गों पर भारत की चिंता

प्रधानमंत्री मोदी ने इस वार्ता में विशेष रूप से रेखांकित किया कि पश्चिम एशिया में शांति के साथ-साथ समुद्री मार्गों पर निर्बाध आवाजाही और व्यापार सुनिश्चित करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यह भारत की उस व्यापक नीति का हिस्सा है जो हिंद महासागर क्षेत्र में स्वतंत्र नौवहन को राष्ट्रीय हित से जोड़ती है।

पूर्व की वार्ताओं का संदर्भ

यह दोनों नेताओं के बीच हाल के महीनों में तीसरी महत्वपूर्ण बातचीत है। 12 मार्च को हुई वार्ता में मोदी ने क्षेत्र में बढ़ते तनाव पर चिंता व्यक्त करते हुए आम नागरिकों की जानमाल की हानि और बुनियादी ढाँचे को पहुँचे नुकसान का उल्लेख किया था। 21 मार्च की बातचीत में उन्होंने क्षेत्रीय अवसंरचना पर हुए हमलों की निंदा की थी और समुद्री सुरक्षा पर जोर दिया था।

चाबहार बंदरगाह: सहयोग का प्रतीक

पिछले महीने नई दिल्ली में ब्रिक्स देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक में शामिल हुए ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ने चाबहार बंदरगाह को भारत-ईरान सहयोग की सबसे अहम मिसाल बताया। उन्होंने कहा, "चाबहार बंदरगाह भारत और ईरान के सहयोग की सबसे अहम मिसालों में से एक है। हमें खुशी है कि इसके विकास में भारत ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। फिलहाल अमेरिका के प्रतिबंधों की वजह से इसकी रफ्तार कुछ धीमी हुई है, लेकिन मुझे पूरा विश्वास है कि यह बंदरगाह भारत के लिए मध्य एशिया, कॉकेसस और फिर यूरोप तक पहुँचने का सुनहरा रास्ता बनेगा।"

अराघची ने यह भी कहा, "यह एक बेहद रणनीतिक और महत्वपूर्ण बंदरगाह है, जो हमारे, भारत और कई दूसरे देशों के लिए भी काफी अहम है। मुझे उम्मीद है कि भारत चाबहार बंदरगाह पर अपना काम जारी रखेगा, ताकि इसका पूरा विकास हो सके।"

भारत की भूमिका पर ईरान का आकलन

अराघची ने भारत की कूटनीतिक क्षमता को रेखांकित करते हुए कहा, "भारत की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अच्छी छवि है और वह इस क्षेत्र में कूटनीति, शांति और सुरक्षा को बढ़ावा देने में बड़ी भूमिका निभा सकता है। भारत की फारस की खाड़ी के लगभग सभी देशों से अच्छे संबंध हैं, इसलिए हम इस क्षेत्र में भारत की किसी भी सकारात्मक और रचनात्मक भूमिका का स्वागत करते हैं।" यह बयान ऐसे समय में आया है जब पश्चिम एशिया में भारत की मध्यस्थ भूमिका को लेकर अंतरराष्ट्रीय चर्चा तेज हो रही है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि सक्रिय कूटनीतिक खिलाड़ी बनने की कोशिश कर रहा है — और ईरान इसे खुलकर आमंत्रित कर रहा है। लेकिन यह संतुलन नाजुक है: भारत एक तरफ ईरान के साथ चाबहार सहयोग बनाए रखना चाहता है, दूसरी तरफ अमेरिकी प्रतिबंधों के दबाव में है। अराघची का यह बयान कि 'अमेरिकी प्रतिबंधों से रफ्तार धीमी हुई है' — सार्वजनिक रूप से भारत को एक कठिन विकल्प के सामने खड़ा करता है। यह देखना होगा कि भारत की 'बातचीत और कूटनीति' की नीति क्या वाशिंगटन और तेहरान दोनों के साथ एक साथ चल सकती है।
RashtraPress
1 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

PM मोदी और ईरानी राष्ट्रपति पेजेश्कियन के बीच 30 जून को क्या बात हुई?
PM मोदी ने पश्चिम एशिया में संघर्ष समाप्त करने की युद्धविराम सहमति का स्वागत किया और क्षेत्र में स्थायी शांति के लिए निरंतर कूटनीतिक प्रयासों की जरूरत पर बल दिया। राष्ट्रपति पेजेश्कियन ने मोदी को क्षेत्र के हालिया घटनाक्रम की जानकारी दी।
पश्चिम एशिया पर मोदी और पेजेश्कियन के बीच पहले कब बातचीत हुई थी?
दोनों नेताओं के बीच 12 मार्च और 21 मार्च 2026 को भी बातचीत हुई थी। 12 मार्च को मोदी ने क्षेत्र में बढ़ते तनाव और नागरिक नुकसान पर चिंता जताई थी, जबकि 21 मार्च को क्षेत्रीय बुनियादी ढाँचे पर हमलों की निंदा की थी।
चाबहार बंदरगाह भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?
चाबहार बंदरगाह भारत को मध्य एशिया, कॉकेसस और यूरोप तक पहुँचने का वैकल्पिक समुद्री-स्थलीय मार्ग देता है, जो पाकिस्तान को बायपास करता है। ईरान के विदेश मंत्री अराघची ने इसे भारत के लिए 'सुनहरा द्वार' बताया है, हालाँकि अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण इसके विकास की गति धीमी हुई है।
पश्चिम एशिया संकट पर भारत का आधिकारिक रुख क्या है?
भारत का रुख है कि सभी विवादों का समाधान बातचीत और कूटनीति के माध्यम से होना चाहिए। PM मोदी ने समुद्री मार्गों पर निर्बाध व्यापार और आवाजाही को भी क्षेत्रीय स्थिरता का अनिवार्य हिस्सा बताया है।
ईरान पश्चिम एशिया में भारत की क्या भूमिका चाहता है?
ईरान के विदेश मंत्री अराघची ने कहा कि भारत की फारस की खाड़ी के लगभग सभी देशों से अच्छे संबंध हैं और वह क्षेत्र में कूटनीति, शांति व सुरक्षा को बढ़ावा देने में बड़ी भूमिका निभा सकता है। ईरान ने भारत की किसी भी 'सकारात्मक और रचनात्मक' भूमिका का स्वागत किया है।
राष्ट्र प्रेस
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