PM मोदी ने म्यांमार राष्ट्रपति से की मुलाकात, आंग सान सू की की रिहाई का मुद्दा उठाया
सारांश
मुख्य बातें
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2 जून 2025 को नई दिल्ली के हैदराबाद हाउस में म्यांमार के राष्ट्रपति यू मिन आंग ह्लाइंग के साथ द्विपक्षीय वार्ता के दौरान नोबेल पुरस्कार विजेता नेता आंग सान सू की की हिरासत का मुद्दा सीधे उठाया। विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने एक विशेष प्रेस ब्रीफिंग में यह जानकारी देते हुए बताया कि प्रधानमंत्री ने म्यांमार में स्थायी शांति बहाली और सभी पक्षों को समावेशी वार्ता में शामिल करने की आवश्यकता पर बल दिया।
बातचीत का मुख्य घटनाक्रम
विदेश सचिव मिस्री ने बताया कि प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्रपति ह्लाइंग के सामने आंग सान सू की का मामला स्पष्ट रूप से उठाया। उन्होंने कहा, 'यह बातचीत काफी हद तक म्यांमार में लंबे समय से चल रही शांति प्रक्रिया के इर्द-गिर्द थी — सभी जातीय समूहों को एक ही मंच पर लाने और एकजुट म्यांमार के लिए आगे का रास्ता खोजने पर।' वार्ता में यह भी रेखांकित किया गया कि अभी सभी पक्षों के बीच पूर्ण सहमति नहीं बन पाई है।
प्रधानमंत्री का संदेश था कि जब म्यांमार लोकतंत्र की राह पर लौटे, तो वहाँ टिकाऊ शांति होनी चाहिए, हर समुदाय की भागीदारी सुनिश्चित हो और किसी भी पक्ष को वार्ता से बाहर न रखा जाए।
भारत की कूटनीतिक रणनीति
विदेश सचिव मिस्री ने भारत के 'संवाद-प्रथम' दृष्टिकोण को स्पष्ट करते हुए कहा, 'इतिहास ने दिखाया है कि अलगाव की नीति बेहतर नतीजे नहीं देती और यह लोकतांत्रिक बदलाव नहीं लाती। दूसरी ओर, दूरी बनाने से एक खाली जगह पैदा होती है जिसे अन्य शक्तियाँ भर देती हैं — और ऐसे में नुकसान भारत को उठाना पड़ सकता है, जबकि उन बाहरी ताकतों की लोकतंत्र को बढ़ावा देने में कोई विशेष रुचि नहीं होती।'
यह बयान भारत की उस सुस्थापित नीति को दर्शाता है जिसके तहत वह अपने पड़ोसियों से — चाहे वहाँ की राजनीतिक परिस्थितियाँ जो भी हों — निरंतर संपर्क बनाए रखता है। भारत अपनी 'नेबरहुड फर्स्ट', 'एक्ट ईस्ट' और 'महासागर नीति' के तहत म्यांमार में शांति प्रक्रिया का समर्थन करता आया है।
आंग सान सू की का मामला
म्यांमार की पूर्व स्टेट काउंसलर और नोबेल शांति पुरस्कार विजेता आंग सान सू की को फरवरी 2021 के सैन्य तख्तापलट के बाद हिरासत में लिया गया था, जब सेना ने लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित सरकार को अपदस्थ कर दिया। उन पर भ्रष्टाचार, कोविड प्रोटोकॉल उल्लंघन और सेना के विरुद्ध असंतोष भड़काने सहित कई आरोप लगाए गए।
सैन्य अदालत ने उन्हें कुल 33 वर्ष की सजा सुनाई, जिसे बाद में गृह नजरबंदी में परिवर्तित कर दिया गया। संयुक्त राष्ट्र और कई अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्थाओं ने उनके खिलाफ चले मुकदमों को राजनीतिक रूप से प्रेरित करार दिया है और उनकी तत्काल एवं बिना शर्त रिहाई की माँग की है।
द्विपक्षीय संबंधों को नई दिशा
राजनीतिक संवाद के अलावा, दोनों देशों ने अपने द्विपक्षीय संबंधों को व्यापक आधार देने पर भी सहमति जताई। इसमें व्यापार, निवेश, कनेक्टिविटी, विकास सहयोग, सुरक्षा और सीमा प्रबंधन जैसे क्षेत्र शामिल हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने इस अवसर पर दोहराया कि भारत म्यांमार का भरोसेमंद पड़ोसी है और संकट के समय सहायता के लिए सदैव तत्पर रहता है।
आगे की राह
यह बैठक ऐसे समय में हुई है जब म्यांमार में जातीय सशस्त्र संगठनों और सैन्य जुंटा के बीच संघर्ष जारी है और अंतरराष्ट्रीय समुदाय में म्यांमार को लेकर कूटनीतिक दबाव बढ़ रहा है। भारत का यह कदम संकेत देता है कि नई दिल्ली म्यांमार के आंतरिक संक्रमण में एक सक्रिय एवं जिम्मेदार भूमिका निभाने का इरादा रखती है।