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म्यांमार नहीं बनने देगा भारत-विरोधी गतिविधियों का अड्डा, यू मिन आंग ह्लाइंग ने PM मोदी को दिया भरोसा

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म्यांमार नहीं बनने देगा भारत-विरोधी गतिविधियों का अड्डा, यू मिन आंग ह्लाइंग ने PM मोदी को दिया भरोसा

सारांश

PM मोदी ने म्यांमार राष्ट्रपति ह्लाइंग के साथ नई दिल्ली में हुई बातचीत में भारत-विरोधी विद्रोही समूहों का मुद्दा सीधे उठाया। ह्लाइंग ने आश्वासन दिया कि म्यांमार की धरती भारत की सुरक्षा के खिलाफ इस्तेमाल नहीं होगी — 1,643 किमी की साझा सीमा और 'एक्ट ईस्ट' नीति के बीच यह कूटनीतिक संकेत अहम है।

मुख्य बातें

PM नरेंद्र मोदी ने नई दिल्ली में म्यांमार राष्ट्रपति यू मिन आंग ह्लाइंग के साथ द्विपक्षीय वार्ता की।
राष्ट्रपति ह्लाइंग ने आश्वासन दिया कि म्यांमार की भूमि भारत-विरोधी विद्रोही समूहों के लिए इस्तेमाल नहीं होने दी जाएगी।
विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने बताया कि म्यांमार ने भारत की सुरक्षा-चिंताओं को दूर करने की प्रतिबद्धता दोहराई।
भारत और म्यांमार के बीच 1,643 किलोमीटर लंबी साझा सीमा है, जो उत्तर-पूर्वी राज्यों को सीधे प्रभावित करती है।
म्यांमार में स्थिरता को भारत ने आसियान एकजुटता और दक्षिण-पूर्व एशिया कनेक्टिविटी के लिए भी ज़रूरी बताया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2 जून 2025 को नई दिल्ली में म्यांमार के राष्ट्रपति यू मिन आंग ह्लाइंग के साथ हुई द्विपक्षीय वार्ता में म्यांमार की धरती पर सक्रिय भारतीय विद्रोही समूहों का मुद्दा सीधे उठाया। राष्ट्रपति ह्लाइंग ने स्पष्ट आश्वासन दिया कि म्यांमार की भूमि का उपयोग भारत के सुरक्षा हितों के विरुद्ध किसी भी रूप में नहीं होने दिया जाएगा।

मुख्य घटनाक्रम

विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने बातचीत के बाद मीडिया को जानकारी देते हुए कहा कि राष्ट्रपति ह्लाइंग ने भारत की सुरक्षा-चिंताओं को दूर करने की म्यांमार की प्रतिबद्धता एक बार फिर दोहराई है। उन्होंने कहा कि नई दिल्ली को भरोसा दिलाया गया है कि भारत के लिए खतरा बनने वाले समूहों पर अंकुश लगाने के लिए ज़रूरी कदम उठाए जाएंगे।

मिस्री के शब्दों में, 'म्यांमार में हमारी सीमाओं के पास भारतीय विद्रोही समूहों की गतिविधियों का बहुत ज़रूरी सवाल है और यह कुछ ऐसा है, जिसे प्रधानमंत्री ने फिर से राष्ट्रपति के सामने उठाया और राष्ट्रपति ने एक बार फिर अपना भरोसा दोहराया कि म्यांमार इन चिंताओं को लेकर संवेदनशील है और यह सुनिश्चित करने के लिए हर ज़रूरी काम करेगा कि इनके खिलाफ कार्रवाई हो और ये भारत की सुरक्षा के लिए खतरे का कारण न बनें।'

म्यांमार की आंतरिक स्थिरता पर भारत का रुख

विदेश सचिव मिस्री ने म्यांमार की अंदरूनी स्थिति पर भी विस्तार से बात की। उन्होंने म्यांमार की सेना और विभिन्न जातीय हथियारबंद संगठनों के बीच जारी तनाव को रेखांकित करते हुए कहा कि म्यांमार सरकार सभी पक्षों को एक साझा मंच पर लाकर शांति प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रही है।

उन्होंने कहा, 'यह असल में यह देखने की कोशिश है कि म्यांमार में मौजूदा शासन का ढाँचा या सरकार का सिस्टम कैसा है, उसमें किस तरह के बदलावों की ज़रूरत हो सकती है ताकि कुछ ऐसा बनाया जा सके जिसके आसपास व्यापक राष्ट्रीय सहमति हो।'

भारत के सामरिक हित और 1,643 किमी की सीमा

मिस्री ने स्पष्ट किया कि म्यांमार में शांति और स्थिरता भारत के लिए केवल सुरक्षा का मामला नहीं, बल्कि व्यापक सामरिक हित का विषय है। उन्होंने कहा कि म्यांमार के साथ 1,643 किलोमीटर लंबी सीमा पर बसे भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों की सुरक्षा और दक्षिण-पूर्व एशिया से कनेक्टिविटी — दोनों दाँव पर हैं।

उन्होंने यह भी जोड़ा कि म्यांमार में अस्थिरता का असर आसियान की एकजुटता पर भी पड़ता है, क्योंकि म्यांमार इस क्षेत्रीय समूह का एक अहम सदस्य है। यह बातचीत ऐसे समय में हुई है जब म्यांमार में सैन्य सरकार और विद्रोही गुटों के बीच संघर्ष थमने का नाम नहीं ले रहा, और भारत की पूर्वोत्तर सीमा पर सुरक्षा दबाव लगातार बना हुआ है।

क्षेत्रीय संदर्भ और आगे की राह

गौरतलब है कि यह पहली बार नहीं है जब भारत ने म्यांमार से विद्रोही समूहों पर कार्रवाई का आग्रह किया हो — पिछले कई वर्षों में दोनों देशों के बीच इस मुद्दे पर कई दौर की बातचीत हो चुकी है। भारत का 'एक्ट ईस्ट' नीति के तहत म्यांमार के साथ संपर्क बनाए रखना इस लिहाज़ से महत्वपूर्ण है कि म्यांमार दक्षिण-पूर्व एशिया का प्रवेशद्वार है। आने वाले समय में दोनों देशों के बीच सुरक्षा सहयोग और शांति प्रक्रिया में भारत की भूमिका पर नज़र रहेगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

जबकि उत्तर-पूर्वी सीमा पर विद्रोही गतिविधियाँ पूरी तरह नहीं थमी हैं। असली सवाल यह है कि म्यांमार की सैन्य सरकार, जो खुद अपने देश के बड़े हिस्से पर नियंत्रण खो चुकी है, इन वादों को ज़मीन पर उतारने में कितनी सक्षम है। भारत की 'एक्ट ईस्ट' नीति और म्यांमार से कनेक्टिविटी परियोजनाएँ अस्थिरता के कारण पहले से ही धीमी पड़ी हैं। कूटनीतिक संवाद ज़रूरी है, लेकिन बिना सत्यापन-योग्य कार्रवाई के, ये बयान महज़ औपचारिकता बनकर रह जाते हैं।
RashtraPress
17 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

PM मोदी और म्यांमार राष्ट्रपति ह्लाइंग की बातचीत में क्या तय हुआ?
PM मोदी ने म्यांमार में सक्रिय भारतीय विद्रोही समूहों का मुद्दा उठाया और राष्ट्रपति ह्लाइंग ने आश्वासन दिया कि म्यांमार की ज़मीन भारत के सुरक्षा हितों के खिलाफ इस्तेमाल नहीं होगी। म्यांमार ने इन समूहों पर कार्रवाई की प्रतिबद्धता दोहराई।
भारत के लिए म्यांमार में स्थिरता क्यों ज़रूरी है?
भारत और म्यांमार के बीच 1,643 किलोमीटर लंबी सीमा है जो उत्तर-पूर्वी राज्यों से लगती है। म्यांमार में अस्थिरता से विद्रोही गतिविधियों को बढ़ावा मिलता है और दक्षिण-पूर्व एशिया से भारत की कनेक्टिविटी परियोजनाएँ भी प्रभावित होती हैं।
विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने म्यांमार की आंतरिक स्थिति पर क्या कहा?
मिस्री ने कहा कि म्यांमार सरकार सभी जातीय हथियारबंद संगठनों को एक मंच पर लाकर व्यापक राष्ट्रीय सहमति बनाने की कोशिश कर रही है। उन्होंने शासन ढाँचे में सुधार की ज़रूरत पर भी ज़ोर दिया।
आसियान और म्यांमार का भारत की नीति से क्या संबंध है?
म्यांमार आसियान का सदस्य है और भारत की 'एक्ट ईस्ट' नीति के तहत दक्षिण-पूर्व एशिया से जुड़ाव का प्रवेशद्वार है। विदेश सचिव मिस्री के अनुसार, म्यांमार में अस्थिरता का असर आसियान की एकजुटता पर भी पड़ता है।
क्या पहले भी म्यांमार ने भारत को ऐसा आश्वासन दिया है?
हाँ, दोनों देशों के बीच विद्रोही समूहों के मुद्दे पर पहले भी कई दौर की वार्ता हो चुकी है और म्यांमार ने पहले भी इसी तरह की प्रतिबद्धता जताई है। हालाँकि, म्यांमार की अंदरूनी अस्थिरता के कारण इन वादों के क्रियान्वयन पर सवाल उठते रहे हैं।
राष्ट्र प्रेस
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