PM मोदी ने एक्स पर साझा किया अथर्ववेद का सुभाषित, प्रेम और सद्भाव का दिया संदेश
सारांश
मुख्य बातें
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 सितंबर 2026 को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक वैदिक सुभाषित साझा करते हुए सामाजिक एकता, परस्पर प्रेम और सद्भाव का संदेश दिया। उन्होंने अथर्ववेद के तीसरे कांड के 30वें सूक्त के प्रथम मंत्र को उद्धृत किया, जो मनुष्यों के बीच हृदय की एकता और द्वेष-रहित जीवन की प्रेरणा देता है।
कौन-सा मंत्र किया साझा
प्रधानमंत्री मोदी ने 'सहृदयं सांमनस्यमविद्वेषं कृणोमि वः। अन्यो अन्यमभि हर्यत वत्सं जातमिवाघ्न्या॥' मंत्र को अपने एक्स हैंडल पर पोस्ट किया। यह मंत्र अथर्ववेद की उस परंपरा का हिस्सा है जो मनुष्यों के बीच सामूहिक चेतना और आपसी स्नेह को जीवन का आधार मानती है।
मंत्र का हिंदी अर्थ एवं व्याख्या
इस मंत्र का भाव यह है कि ईश्वर मनुष्यों से कहते हैं — 'मैं तुम्हारे बीच ऐसे वचनों और कर्मों की स्थापना करता हूँ जिससे तुम सहृदय (एक जैसा हृदय रखने वाले), सांमनस्य (समान मन वाले) और अविद्वेष (द्वेष व ईर्ष्या से रहित) बनो।' मंत्र आगे कहता है कि मनुष्यों को एक-दूसरे से वैसा ही प्रेम करना चाहिए, जैसे गाय अपने नवजात बछड़े से निःस्वार्थ और अगाध स्नेह करती है।
प्रधानमंत्री मोदी ने इस मंत्र की व्याख्या करते हुए कहा कि मनुष्य को ऐसे कर्म करने चाहिए जो हृदय में प्रेम, सौहार्द्र और सद्भाव को बढ़ाएँ, और समाज में परस्पर स्नेह को बढ़ावा दें।
मंत्र का सामाजिक संदर्भ
यह वैदिक मंत्र परिवार, समाज और राष्ट्र के स्तर पर मतभेदों को मिटाकर एकता के सूत्र में बँधने की प्रेरणा देता है। गाय-बछड़े के उदाहरण के माध्यम से यह समझाया गया है कि जिस प्रकार माँ का प्रेम बिना स्वार्थ और शर्त के होता है, उसी प्रकार मनुष्यों के बीच का स्नेह भी होना चाहिए। यह ऐसे समय में आया है जब सामाजिक विभाजन और असहिष्णुता को लेकर राष्ट्रीय विमर्श में तेज़ी आई है।
प्रधानमंत्री के सुभाषित साझा करने की परंपरा
गौरतलब है कि प्रधानमंत्री मोदी समय-समय पर वेद, उपनिषद और अन्य भारतीय शास्त्रों से सूक्तियाँ और मंत्र सोशल मीडिया पर साझा करते रहे हैं। यह उनके सार्वजनिक संवाद का एक नियमित हिस्सा बन चुका है, जिसके माध्यम से वे सांस्कृतिक और आध्यात्मिक मूल्यों को आम जनता तक पहुँचाने का प्रयास करते हैं। इस बार अथर्ववेद के इस विशेष मंत्र का चुनाव सामाजिक एकजुटता के व्यापक संदेश की ओर संकेत करता है।
मंत्र का मूल सार
इस वैदिक प्रार्थना का मूल सार यही है कि सबका उद्देश्य और विचार एक-दूसरे के हित में हो। जब मनुष्य सहृदयता, समान मनोवृत्ति और द्वेष-रहितता को अपने जीवन में उतारते हैं, तभी एक सुदृढ़ और संयुक्त समाज की नींव पड़ती है। प्रधानमंत्री के इस संदेश को सामाजिक एकता की दिशा में एक सांस्कृतिक पहल के रूप में देखा जा रहा है।