उपराष्ट्रपति सी पी राधाकृष्णन ने एमपी लीड फेलोशिप के 40 युवाओं से की मुलाकात, बोले — बड़े सपने देखें, राष्ट्र-निर्माण में दें योगदान
सारांश
मुख्य बातें
उपराष्ट्रपति सी पी राधाकृष्णन ने 3 जुलाई 2025 को नई दिल्ली में एमपी लीड फेलोशिप के प्रतिभागियों से मुलाकात की और उन्हें देश सेवा के प्रति समर्पित, नैतिक मूल्यों वाले नेता बनने का आग्रह किया। राज्यसभा सदस्य डॉ. अजीत माधवराव गोपचाडे द्वारा प्रारंभ इस दो महीने के इंटर्नशिप कार्यक्रम में 5,000 से अधिक आवेदकों में से चुने गए 40 फेलो शामिल हैं, जिनमें 62 प्रतिशत महिलाएँ हैं।
नेतृत्व पर उपराष्ट्रपति का संदेश
राधाकृष्णन ने स्पष्ट किया कि नेतृत्व की असली कसौटी अधिकार नहीं, बल्कि विनम्रता, ईमानदारी और करुणा के साथ समाज की सेवा करने की क्षमता है। उन्होंने युवाओं से आग्रह किया कि वे जिज्ञासा के साथ सीखें, निडर होकर नई पहल करें और व्यापक राष्ट्रीय हित के प्रति समर्पित रहें।
उन्होंने कहा, 'कौन जानता है, आपमें से कोई एक भारत के उपराष्ट्रपति के पद पर भी हो सकता है।' यह वक्तव्य युवा फेलो के लिए एक प्रेरणादायक संदेश के रूप में सामने आया।
भारत की सभ्यतागत एकता पर जोर
उपराष्ट्रपति ने भारत की सांस्कृतिक विरासत और एकता पर विशेष बल दिया। उन्होंने कहा, 'भारत एक था, भारत एक है और भारत हमेशा एक रहेगा।' उन्होंने फेलो से क्षेत्र, भाषा और जाति से ऊपर उठने का आह्वान किया।
उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि हिमालय से लेकर कन्याकुमारी तक भारत की साझा सांस्कृतिक विरासत ने सदैव देश को एकजुट रखा है और यही इसकी सबसे बड़ी शक्ति है। गौरतलब है कि यह संदेश ऐसे समय में आया है जब देश में क्षेत्रीय पहचान को लेकर सार्वजनिक विमर्श तेज़ हो रहा है।
भारत की विकास यात्रा से प्रेरणा
राधाकृष्णन ने 1960 के दशक में अनाज की भारी कमी से जूझते भारत और आज दुनिया के सबसे बड़े अनाज निर्यातक देशों में उसकी गिनती होने के बीच के ऐतिहासिक बदलाव को याद किया। उन्होंने कहा कि युवाओं को पिछली पीढ़ियों द्वारा झेली गई कठिनाइयों को समझना चाहिए और इस विकास यात्रा से प्रेरणा लेनी चाहिए।
उन्होंने यह भी जोड़ा कि अवसरों के साथ-साथ योग्यता और निरंतर आत्म-सुधार भी अनिवार्य हैं — केवल सुविधाएँ या नेटवर्क पर्याप्त नहीं।
एमपी लीड फेलोशिप: कार्यक्रम की रूपरेखा
राज्यसभा सदस्य डॉ. अजीत माधवराव गोपचाडे की पहल पर शुरू की गई यह फेलोशिप युवाओं को शासन-व्यवस्था, सार्वजनिक नीति और विधायी प्रक्रियाओं का प्रत्यक्ष अनुभव प्रदान करती है। उपराष्ट्रपति ने इसे करियर की शुरुआत के लिए एक आदर्श मंच बताया, जो क्लासरूम से बाहर की दुनिया से परिचित कराता है और राष्ट्रीय नेताओं के साथ संवाद के अवसर देता है।
उन्होंने भरोसा जताया कि यह फेलोशिप भविष्य के ऐसे राष्ट्र-निर्माताओं को तैयार करेगी जो विकसित और आत्मनिर्भर भारत के निर्माण में ठोस योगदान देंगे।
संवैधानिक मूल्य और नागरिक कर्तव्य
उपराष्ट्रपति ने संवैधानिक मूल्यों के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि लोकतंत्र तभी फलता-फूलता है, जब नागरिक अपने अधिकारों के साथ-साथ अपने कर्तव्यों का भी पालन करते हैं। यह वक्तव्य ऐसे समय में आया है जब युवा राजनीतिक सहभागिता और सुशासन के प्रश्न राष्ट्रीय बहस के केंद्र में हैं। आने वाले वर्षों में इस कार्यक्रम से निकले फेलो सार्वजनिक जीवन, प्रशासन और न्यायपालिका में जिम्मेदार भूमिकाएँ निभाते दिख सकते हैं।