श्रीनगर में मुहर्रम जुलूस: गुरु बाजार से डलगेट तक उमड़े सैकड़ों शिया श्रद्धालु
सारांश
मुख्य बातें
श्रीनगर में बुधवार, 24 जून 2026 को मुहर्रम के अवसर पर सैकड़ों शिया मुस्लिम श्रद्धालुओं ने शोक जुलूस में हिस्सा लिया। गुरु बाजार से शुरू होकर डलगेट तक पहुँचने वाला यह जुलूस पूरी तरह शांतिपूर्ण रहा और प्रशासन ने इसके लिए व्यापक सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित की।
जुलूस का मार्ग और आयोजन
जुलूस गुरु बाजार से आरंभ होकर बुदशाह चौक और मौलाना आजाद रोड से होते हुए डलगेट पहुँचा। सड़कों पर काले झंडे लहराए गए और स्वयंसेवकों ने जुलूस में शामिल श्रद्धालुओं को पानी व कोल्ड ड्रिंक्स उपलब्ध कराने के लिए स्टॉल लगाए। काले वस्त्र धारण किए बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने इमाम हुसैन की शहादत को याद करते हुए मातमी रस्में अदा कीं और कर्बला के शहीदों की याद में शोक-गीत गाए।
प्रशासन की तैयारियाँ
ट्रैफिक विभाग ने जुलूस के मार्ग पर विशेष रूट रेगुलेशन लागू किया, ताकि श्रद्धालुओं की आवाजाही निर्बाध रहे और शहर के बाहर से आने वालों के लिए वैकल्पिक रास्ते उपलब्ध हों। बटमालू सहित अन्य स्थानों से आने वाले लोगों के लिए विशेष पार्किंग की व्यवस्था की गई। चिकित्सा विभाग ने जुलूस मार्ग पर अस्थायी स्वास्थ्य शिविर स्थापित किए। वरिष्ठ नागरिक एवं पुलिस अधिकारी पूरे समय मौजूद रहे और जुलूस के दौरान कोई अप्रिय घटना नहीं हुई।
विद्वान की आवाज़
शिया विद्वान मसरूर अब्बास अंसारी ने कहा, 'मुहर्रम को समय और हालात के हिसाब से मनाया जाता है। हर मुहर्रम एक खास संदेश लेकर आता है। इस साल का मुहर्रम भी एक संदेश लेकर आया है क्योंकि हम इसे पहली बार अपने नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के बिना मना रहे हैं। यह मुहर्रम अयातुल्ला खामेनेई की शहादत के कुछ ही दिनों बाद आया है, जिसकी वजह से लोगों में एक खास जोश और ऊर्जा है।'
कश्मीर में मुहर्रम जुलूस की पृष्ठभूमि
गौरतलब है कि 1990 के दशक में कश्मीर में आतंकवाद के उभार के बाद अधिकारियों ने मुहर्रम जुलूसों पर प्रतिबंध लगा दिया था। हालात में क्रमिक सुधार के साथ, प्रशासन पिछले तीन वर्षों से इस पारंपरिक जुलूस की अनुमति दे रहा है — जो घाटी में सामाजिक सामान्यीकरण की दिशा में एक उल्लेखनीय कदम माना जा रहा है।
कर्बला की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
शिया मान्यताओं के अनुसार, इमाम हुसैन — पैगंबर मुहम्मद के नवासे — कूफा के लोगों के बुलावे पर शांति स्थापित करने के लिए अपने परिवार और साथियों सहित निकले थे। उमय्यद खलीफा यज़ीद की विशाल सेना ने उन्हें फरात नदी के किनारे कर्बला में घेर लिया। घेराबंदी के दौरान छोटे बच्चों तक को पानी से वंचित रखा गया। 10 मुहर्रम, 61 हिजरी — यानी 10 अक्टूबर, 680 ईस्वी — को इमाम हुसैन और उनके काफिले की शहादत हुई। यह दुखद ऐतिहासिक घटना आज के इराक की धरती पर हुई थी। उल्लेखनीय है कि मुहर्रम में शोक मनाने की परंपरा शिया और सुन्नी दोनों समुदायों में समान रूप से प्रचलित है।
इस वर्ष का जुलूस शांतिपूर्ण संपन्न होना घाटी में बढ़ती सामाजिक स्थिरता का संकेत देता है, और आने वाले वर्षों में इस परंपरा के और अधिक विस्तार की उम्मीद जताई जा रही है।