FCRA संशोधन बिल की JPC जांच हो: नागालैंड CM नेफ्यू रियो और मिजोरम CM लालदुहोमा की अमित शाह से मांग
सारांश
मुख्य बातें
नागालैंड के मुख्यमंत्री नेफ्यू रियो और मिजोरम के मुख्यमंत्री लालदुहोमा ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से आग्रह किया है कि प्रस्तावित 'विदेशी योगदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026' को अंतिम रूप देने से पहले संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के पास व्यापक जांच के लिए भेजा जाए। 10 अगस्त को सामने आई इस मांग के केंद्र में पूर्वोत्तर के उन चर्च और धर्मार्थ संस्थाओं की चिंताएं हैं, जो दशकों से शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सेवाओं में विदेशी सहयोग पर निर्भर रही हैं।
मुख्यमंत्री रियो का पत्र और मुख्य तर्क
गृह मंत्री अमित शाह को लिखे पत्र में नेफ्यू रियो ने कहा कि सरकार प्रस्तावित कानून को JPC के पास भेजने पर विचार करे, जहाँ इसके प्रावधानों की पूरी तरह से जांच हो और संबंधित हितधारकों के प्रतिनिधियों की बात सुनी जाए। रियो ने स्पष्ट किया, "हम विदेशी योगदान के संबंध में पारदर्शिता, जवाबदेही और कानून का पालन सुनिश्चित करने की भारत सरकार की जिम्मेदारी को पूरी तरह से पहचानते हैं और उसका सम्मान करते हैं।"
उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि नियामक ढाँचे का दुरुपयोग रोकने के साथ-साथ यह भी सुनिश्चित करना उतना ही जरूरी है कि पीढ़ियों से सेवारत असली धर्मार्थ, शैक्षिक, स्वास्थ्य और मानवीय संस्थाएं अनजाने में प्रभावित न हों या अनिश्चितता में न पड़ें।
नागालैंड का विशिष्ट सामाजिक-ऐतिहासिक संदर्भ
रियो ने ईसाई प्रतिनिधियों और चर्च संगठनों के साथ अपनी हालिया बैठकों का उल्लेख करते हुए गृह मंत्री से अनुरोध किया कि वे नागालैंड के अनोखे सामाजिक, ऐतिहासिक और विकासगत परिस्थितियों के संदर्भ में इन चिंताओं पर संवेदनशीलता के साथ विचार करें। उन्होंने बताया कि नागालैंड में ईसाई धर्म और चर्च का इतिहास 150 वर्ष से अधिक पुराना है और बैपटिस्ट आंदोलन के अमेरिकी बैपटिस्ट समुदायों के साथ ऐतिहासिक संबंध रहे हैं।
रियो के अनुसार, "एक सदी से भी अधिक समय से, देश और विदेश के चर्चों, ईसाई मिशनों और संगठनों ने नागालैंड के विकास में अहम भूमिका निभाई है — उनका योगदान राज्य बनने से पहले से है और हमारे इतिहास के कुछ सबसे मुश्किल और अलग-थलग दौर में भी जारी रहा।" दूरदराज और आर्थिक रूप से कमजोर इलाकों में शिक्षा, स्वास्थ्य और मानवीय सेवाएं काफी हद तक कानूनी विदेशी योगदान और साझेदारी पर टिकी हैं।
रियो ने चेताया कि प्रस्तावित संशोधन, अगर मौजूदा रूप में लागू किए जाते हैं, तो राज्य में चल रहे कई कल्याण, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सेवा कार्यक्रमों पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है।
मिजोरम की स्थिति: चर्च संगठनों का ज्ञापन
मिजोरम के मुख्यमंत्री लालदुहोमा ने बताया कि उन्होंने हाल ही में नई दिल्ली में गृह मंत्री शाह से राज्य की दो सबसे बड़ी चर्च संस्थाओं — मिजोरम कोहरान ह्रुआइट्यूट कमेटी (MKHC) और काउंसिल ऑफ चर्चेस इन मिजोरम (CCM) — के नेताओं के साथ मुलाकात की। इन संगठनों ने प्रस्तावित कानून के कुछ प्रावधानों पर अपनी चिंताएं और सुझाव रखे तथा केंद्रीय गृह मंत्रालय को एक ज्ञापन सौंपा। लालदुहोमा ने भी केंद्र से आग्रह किया कि बिल को JPC के पास भेजा जाए ताकि इसे अंतिम रूप देने से पहले व्यापक विचार-विमर्श हो सके।
पूर्वोत्तर में व्यापक प्रभाव
आंकड़ों के अनुसार, मिजोरम, नागालैंड और मेघालय में 60 लाख से अधिक ईसाई रहते हैं, जबकि मणिपुर, त्रिपुरा, असम, अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम में भी इनकी उल्लेखनीय संख्या है। यह ऐसे समय में आया है जब केंद्र सरकार FCRA के तहत विदेशी अनुदान की निगरानी को और कड़ा करने की दिशा में आगे बढ़ रही है — एक ऐसा कदम जिसे राष्ट्रीय सुरक्षा के नजरिए से जरूरी बताया जा रहा है, लेकिन पूर्वोत्तर के नागरिक समाज में इसे लेकर गहरी आशंकाएं हैं। गौरतलब है कि FCRA में इससे पहले 2010 और 2020 में भी संशोधन किए जा चुके हैं, और हर बार पूर्वोत्तर राज्यों में इसके प्रभाव को लेकर चिंताएं उठी हैं।
अब देखना यह होगा कि केंद्र सरकार इन दोनों मुख्यमंत्रियों की JPC जांच की मांग पर क्या रुख अपनाती है और क्या संसद के आगामी सत्र में इस विधेयक को समिति के पास भेजा जाता है।