नेशनल कॉन्फ्रेंस का 2 सितंबर को श्रीनगर-जम्मू में BJP दफ्तरों का शांतिपूर्ण घेराव का ऐलान
सारांश
मुख्य बातें
जम्मू-कश्मीर की सत्ताधारी नेशनल कॉन्फ्रेंस (NC) ने मंगलवार, 1 सितंबर को घोषणा की कि वह बुधवार, 2 सितंबर को श्रीनगर और जम्मू में भारतीय जनता पार्टी (BJP) के दफ्तरों का शांतिपूर्ण 'घेराव' करेगी। पार्टी का उद्देश्य केंद्र सरकार पर उन वादों को पूरा करने के लिए दबाव बनाना है, जो संसद और सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष जम्मू-कश्मीर के लोगों से किए गए थे।
घेराव की वजह क्या है
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पहले यह कह चुके हैं कि जम्मू-कश्मीर को 'सही समय' पर पूर्ण राज्य का दर्जा वापस दिया जाएगा। इसके अलावा, भारत सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में भी राज्य का दर्जा बहाल करने का भरोसा दिलाया था। नेशनल कॉन्फ्रेंस का तर्क है कि ये आश्वासन अब तक कार्रवाई में नहीं बदले हैं।
एनसी की प्रमुख मांगें
पार्टी ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट पर जारी बयान में मांगों की स्पष्ट सूची रखी। इनमें राज्य का दर्जा बहाल करना, संवैधानिक गारंटियों की बहाली, आरक्षण फाइल को मंजूरी देना और जम्मू-कश्मीर के लोगों के लिए न्याय सुनिश्चित करना शामिल हैं। पार्टी ने स्पष्ट किया कि यह प्रदर्शन पूरी तरह शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक होगा।
जनादेश का सम्मान करने की अपील
नेशनल कॉन्फ्रेंस ने अपने बयान में कहा, 'जम्मू-कश्मीर के लोगों का जनादेश कोई ब्लैंक चेक नहीं है। इसका सम्मान किया जाना चाहिए, इसे हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए।' पार्टी ने यह भी रेखांकित किया कि प्रस्तावित घेराव का मकसद केंद्र सरकार से जवाबदेही तय करना है, न कि किसी प्रकार का टकराव।
पहले भी हो चुका है विरोध
गौरतलब है कि नेशनल कॉन्फ्रेंस ने संसद के मानसून सत्र की शुरुआत में नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर भी विरोध प्रदर्शन किया था, जिसका मकसद जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा वापस दिलाने के लिए केंद्र सरकार पर दबाव बनाना था। यह ऐसे समय में आया है जब जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनावों के बाद सत्ता में आई एनसी और केंद्र के बीच राज्य के दर्जे के मुद्दे पर तनाव बना हुआ है।
आगे क्या होगा
2 सितंबर को प्रस्तावित घेराव के बाद यह देखना होगा कि केंद्र सरकार इस दबाव पर क्या प्रतिक्रिया देती है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, एनसी का यह कदम जम्मू-कश्मीर की राजनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ हो सकता है, क्योंकि सत्ताधारी दल का विपक्षी दल की शैली में विरोध करना असामान्य है।