एनसीएलटी ने सुभाष चंद्रा को 99.97% डेट हेयरकट वाले फैसले पर लगाई रोक, पाँच सदस्यीय बेंच करेगी नई सुनवाई
सारांश
मुख्य बातें
नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (एनसीएलटी) ने 1 सितंबर 2026 को एस्सल ग्रुप के संस्थापक सुभाष चंद्रा के व्यक्तिगत दिवालियापन मामले में अपने पूर्व आदेश पर तत्काल रोक लगा दी और मामले की नए सिरे से सुनवाई का निर्देश दिया। इस मामले में ₹22,006.57 करोड़ के स्वीकृत दावों के बदले महज ₹6.5 करोड़ के भुगतान का प्रस्ताव था — यानी लेनदारों को करीब 99.97 प्रतिशत का नुकसान उठाना पड़ता।
मुख्य घटनाक्रम
जस्टिस (रिटायर्ड) अनूपिंदर सिंह ग्रेवाल की अध्यक्षता में गठित पाँच सदस्यीय बेंच ने कहा कि 25 अगस्त के फैसले पर कोई स्पष्ट बहुमत राय नहीं बन पाई थी। बेंच ने मामले से जुड़े सभी पक्षों को नोटिस जारी किए और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की अपील पर चंद्रा को अपनी संपत्ति प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से किसी को भी हस्तांतरित या बेचने से रोक दिया।
एनसीएलटी ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा, "हम यह भी निर्देश देते हैं कि गारंटर अपनी प्रॉपर्टी को सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से किसी और को ट्रांसफर या बेच नहीं सकता है।" पाँच सदस्यीय बेंच में न्यायिक सदस्य बाचू वेंकट बालारा दास और महेंद्र खंडेलवाल, तथा तकनीकी सदस्य अतुल चतुर्वेदी और रवींद्र चतुर्वेदी भी शामिल थे।
मामले की पृष्ठभूमि
यह कार्यवाही इंडियाबुल्स हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड द्वारा चंद्रा के विरुद्ध शुरू की गई दिवालियापन प्रक्रिया से उपजी है। मूल दो सदस्यीय बेंच ने पुनर्भुगतान योजना पर विभाजित फैसला सुनाया था, जिसके बाद मामला कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 419(5) के तहत तीसरे सदस्य न्यायिक सदस्य नीलेश शर्मा के पास भेजा गया।
25 अगस्त को शर्मा ने दिवाला और दिवालियापन संहिता (आईबीसी) की धारा 114 के तहत पुनर्भुगतान योजना को मंजूरी दी और अनिल कुमार द्वारा 960 लोगों की ओर से तथा सुनील जैन द्वारा 300 लोगों की ओर से दायर दावों को बाहर रखने का निर्देश दिया। उन्होंने यह भी कहा कि योजना आईबीसी के प्रावधानों के तहत सभी लेनदारों पर बाध्यकारी होगी — यहाँ तक कि विरोध करने वालों पर भी। गौरतलब है कि जब मामला मूल बेंच के पास लौटा, तो पाया गया कि तीसरे सदस्य के आदेश से मूल विभाजन दूर नहीं हुआ — तकनीकी सदस्य ने योजना अस्वीकार की थी, न्यायिक सदस्य ने इसे केवल सहायक लेनदारों तक सीमित रखना चाहा था, और तीसरे सदस्य ने इसे सभी पर लागू मान लिया।
लेनदारों का विरोध
एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस, यूनियन बैंक ऑफ इंडिया और केनरा बैंक सहित कई प्रमुख लेनदारों ने इस योजना का विरोध किया। एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस का स्वीकृत दावा ₹1,322.39 करोड़ था, जबकि उसे प्रस्तावित भुगतान केवल ₹38.09 लाख — यानी स्वीकृत बकाये का मात्र 0.028 प्रतिशत — था। यूनियन बैंक ऑफ इंडिया ने कहा है कि वह एनसीएलटी की मंजूरी को नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (एनसीएलएटी) में चुनौती देगा, जबकि एचडीएफसी बैंक भी अपील पर विचार कर रहा है।
सुभाष चंद्रा का पक्ष
चंद्रा ने इस कार्यवाही को 'भारी-भरकम व्यक्तिगत कर्ज माफी' के रूप में प्रस्तुत किए जाने पर आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि उन्होंने व्यक्तिगत रूप से उधारदाताओं से धनराशि नहीं ली थी और वे केवल एस्सल ग्रुप की उधार लेने वाली कंपनियों के लिए व्यक्तिगत गारंटर के रूप में शामिल थे। उनके बयान के अनुसार, ₹21,696 करोड़ के दावे स्वीकृत किए गए थे, जिनमें से विरोध करने वाले लेनदारों के दावे लगभग ₹3,992 करोड़ थे। इसमें से ₹620 करोड़ के दावे पहले ही निपटाए जा चुके थे, जिससे शेष राशि लगभग ₹3,372 करोड़ रह गई। उन्होंने यह भी कहा कि उधार लेने वाली कंपनियों ने कई आपत्ति जताने वाले लेनदारों को लगभग ₹1,113 करोड़ के भुगतान की पेशकश की है और बातचीत जारी है।
आगे क्या होगा
यह ऐसे समय में आया है जब आईबीसी के तहत व्यक्तिगत गारंटर मामलों की सुनवाई की प्रक्रिया और उसकी सीमाएँ राष्ट्रीय स्तर पर बहस का विषय बनी हुई हैं। पाँच सदस्यीय बेंच द्वारा नई सुनवाई के साथ-साथ सभी पक्षों को जारी नोटिस और संपत्ति हस्तांतरण पर रोक से यह स्पष्ट है कि मामला अभी लंबा खिंच सकता है। अब सभी की नज़रें एनसीएलटी की नई सुनवाई की तारीख और एनसीएलएटी में संभावित अपीलों पर टिकी हैं।