सुभाष चंद्रा को 99.97% कर्ज माफी: NCLT फैसले के खिलाफ HDFC बैंक NCLAT में अपील की तैयारी
सारांश
मुख्य बातें
एस्सेल ग्रुप के संस्थापक सुभाष चंद्रा की व्यक्तिगत दिवाला समाधान प्रक्रिया में राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (NCLT) द्वारा दी गई 99.97 प्रतिशत कर्ज छूट को HDFC बैंक ने चुनौती देने का मन बनाया है। बैंक ने गुरुवार, 27 अगस्त को पुष्टि की कि वह राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण (NCLAT) में अपील दायर करने के विकल्प पर सक्रिय रूप से विचार कर रहा है।
विवादित फैसले का सार
NCLT ने जिस पुनर्भुगतान योजना को मंजूरी दी है, उसके तहत ₹22,006.57 करोड़ के स्वीकृत दावों के बदले चंद्रा को केवल ₹6.25 करोड़ का भुगतान करना है, जबकि ₹25 लाख प्रक्रिया लागत के लिए अलग रखे गए हैं। यह अनुपात लेनदारों के लिए लगभग 99.97 प्रतिशत हेयरकट के बराबर है — अर्थात उनके हर ₹100 के दावे पर मात्र कुछ पैसे की वसूली।
HDFC बैंक की स्थिति
बैंक के एक प्रवक्ता ने स्पष्ट किया कि इस मामले में HDFC बैंक का स्वीकृत दावा कुल दावों का केवल 3.2 प्रतिशत था। उन्होंने बताया, 'यह ऋण सुविधा पहले HDFC लिमिटेड द्वारा प्रदान की गई थी और विलय के बाद बैंक को प्राप्त हुई।' बैंक ने यह भी कहा कि संबंधित ऋण के लिए आवश्यक प्रावधान पहले ही किए जा चुके हैं, इसलिए तत्काल वित्तीय प्रभाव सीमित है।
लेनदारों का विरोध और NCLT का रुख
LIC हाउसिंग फाइनेंस के नेतृत्व में कई लेनदारों ने सुनवाई के दौरान इस योजना का कड़ा विरोध किया था। NCLT के आदेश में दर्ज LIC हाउसिंग फाइनेंस की दलील के अनुसार, उसका स्वीकृत दावा ₹1,322.39 करोड़ था, जबकि प्रस्तावित भुगतान मात्र ₹38.09 लाख — यानी कुल दावे का केवल 0.028 प्रतिशत। लेनदारों ने तर्क दिया कि इतनी नगण्य वसूली वाली योजना 'अव्यावहारिक और कानून के विपरीत' है।
इन आपत्तियों के बावजूद NCLT के न्यायिक सदस्य नीलेश शर्मा ने दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (IBC) की धारा 114 के तहत योजना को मंजूरी दे दी। गौरतलब है कि इससे पहले NCLT की दो सदस्यीय पीठ का फैसला विभाजित रहा था, जिसके बाद न्यायाधिकरण के अध्यक्ष ने नीलेश शर्मा को तीसरे सदस्य के रूप में नियुक्त किया।
यह मामला क्यों महत्वपूर्ण है
यह मामला भारत में व्यक्तिगत दिवाला समाधान प्रक्रिया की सीमाओं पर बड़े सवाल खड़े करता है। आलोचकों का कहना है कि यदि ऐसे फैसले बरकरार रहे, तो बड़े कर्जदारों के लिए IBC की व्यक्तिगत दिवाला प्रक्रिया को ऋण पुनर्गठन के एक सुविधाजनक रास्ते के रूप में इस्तेमाल करने का मार्ग खुल सकता है। यह ऐसे समय में आया है जब बैंकिंग क्षेत्र में NPA प्रबंधन और लेनदार संरक्षण पर नीतिगत बहस तेज है।
आगे क्या होगा
HDFC बैंक के NCLAT में अपील दायर करने की स्थिति में यह मामला व्यक्तिगत दिवाला समाधान की व्याख्या पर एक महत्वपूर्ण न्यायिक मिसाल बन सकता है। LIC हाउसिंग फाइनेंस सहित अन्य असंतुष्ट लेनदारों के भी इसी मार्ग पर चलने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। अपीलीय न्यायाधिकरण का निर्णय IBC के तहत हेयरकट की स्वीकार्य सीमा को परिभाषित करने में निर्णायक भूमिका निभाएगा।