क्या नेहरू के विशेष आग्रह पर राजनीति में आईं विजयाराजे सिंधिया और कांग्रेस के बीच संबंध कैसे बिगड़े?

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क्या नेहरू के विशेष आग्रह पर राजनीति में आईं विजयाराजे सिंधिया और कांग्रेस के बीच संबंध कैसे बिगड़े?

सारांश

क्या जवाहरलाल नेहरू के आग्रह से राजनीति में कदम रखने वाली विजयाराजे सिंधिया और कांग्रेस के बीच संबंध बिगड़ गए? जानें इस कहानी के पीछे के कारण और राजनीतिक संघर्षों के बारे में जो मध्य प्रदेश से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक प्रभाव डालते हैं।

Key Takeaways

  • नेहरू का विशेष आग्रह विजयाराजे सिंधिया के राजनीति में आने का कारण बना।
  • संबंधों में तनाव के पीछे व्यक्तिगत और राजनीतिक मतभेद थे।
  • विजयाराजे ने कांग्रेस को छोड़कर हिंदू महासभा
  • सिंधिया परिवार की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
  • राजमाता की जनसेवा ने उन्हें आम लोगों के बीच लोकप्रिय बनाया।

नई दिल्ली, 24 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। स्वतंत्र भारत की राजनीति में कई रिश्ते रणनीति से आरंभ होकर टकराव पर समाप्त होते हैं, जैसे कि राजघराने की राजमाता विजयाराजे सिंधिया का कांग्रेस के साथ संबंध। एक ओर कांग्रेस को ग्वालियर रियासत में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए सिंधिया परिवार का सहारा चाहिए था, वहीं दूसरी ओर राजमाता विजयाराजे सिंधिया राजनीति में कदम नहीं रखना चाहती थीं। जवाहरलाल नेहरू के विशेष आग्रह पर जिस रिश्ते की नींव मजबूरी और समझौते पर रखी गई, वही आगे चलकर वैचारिक मतभेद, सत्ता संघर्ष और व्यक्तिगत टकराव के कारण खुली राजनीतिक दुश्मनी में बदल गया। यही संबंध भारतीय राजनीति में कांग्रेस बनाम राजमाता की एक महत्वपूर्ण कहानी की नींव बना, जिसने मध्य प्रदेश से लेकर राष्ट्रीय राजनीति तक कई सत्ता समीकरणों को प्रभावित किया।

बुंदेलखंड के छोटे से शहर सागर में ठाकुर महेंद्र सिंह और चूड़ामणि देवी के घर 11 अक्टूबर 1919 को एक बालिका का जन्म हुआ। नामकरण हुआ लेखा देवेश्वरी। यही लेखा देवेश्वरी 21 फरवरी 1941 को ग्वालियर स्टेट के तत्कालीन महाराजा जीवाजी राव सिंधिया के साथ विवाह बंधन में बंधीं। उस समय राज परंपरा के अनुसार उन्हें नई पहचान मिली, महारानी विजयाराजे सिंधिया

शाही रियासतों को जोड़कर एक मध्य भारत नाम का राज्य बना था और इन रजवाड़ों के राज प्रमुख ग्वालियर के आखिरी महाराज जीवाजी राव सिंधिया थे। 31 अक्टूबर 1956 को शाही रियासतें मध्य प्रदेश में मिल गईं। 1957 में लोकसभा के चुनाव होने थे। उसी समय ग्वालियर और आसपास के इलाकों में हिंदू संगठनों का प्रभाव बढ़ रहा था। आजादी के पहले सबसे पहले सत्ता संभालने वाली कांग्रेस इन क्षेत्रों में हिंदू संगठनों के प्रभाव से चिंतित थी। अब तक राजनीति में सिंधिया परिवार की एंट्री नहीं हुई थी, लेकिन जीवाजी राव सिंधिया के हिंदू संगठनों के प्रति नरम रुख के कारण वोटों का सीधा प्रभाव शाही परिवार पर पड़ा, जिससे कांग्रेस भी वाकिफ थी।

चुनावी दौरे पर मध्य प्रदेश आए जवाहरलाल नेहरू चाहते थे कि किसी तरह सिंधिया परिवार का साथ उन्हें मिल जाए ताकि ग्वालियर रियासत की राजनीति में उनका दबदबा बन सके। उस समय ग्वालियर रियासत में लोकसभा की 8 और विधानसभा की 60 सीटें थीं। कांग्रेस महाराज जीवाजी राव सिंधिया का साथ चाहती थी। कहा जाता है कि महाराज सिंधिया कांग्रेस की नीतियों के प्रति असहमत थे।

हिंदू महासभा का प्रभाव भी बढ़ रहा था। कांग्रेस समझ चुकी थी कि अगर सिंधिया परिवार को साथ नहीं लिया, तो ग्वालियर रियासत में उनका हाथ कुछ नहीं लगेगा, क्योंकि जीवाजी राव हिंदू महासभा के पक्ष में थे। विजयाराजे सिंधिया के भाई ध्यानेंद्र सिंह ने एक इंटरव्यू में यह बताया था।

कांग्रेस पर इसका दबाव बढ़ रहा था। जीवाजी राव राजनीति से दूर रहना चाहते थे, लेकिन कांग्रेस के नेताओं की कोशिशें जारी थीं। उसी समय राजमाता विजयाराजे सिंधिया दिल्ली पहुंची थीं और जवाहरलाल नेहरू से स्पष्ट इनकार कर दिया कि उनके पति राजनीति में नहीं आना चाहते। आगे की जिम्मेदारी गोविंद वल्लभ पंत और लाल बहादुर शास्त्री के कंधों पर आ गई थी। उन्हें न सिर्फ विजयाराजे सिंधिया को मनाना था, बल्कि इस बात के लिए भी राजी करना था कि वे जीवाजी राव को कांग्रेस के साथ लेकर आएं। जब विजयाराजे सिंधिया नहीं मानीं, तो कांग्रेस ने एक और प्रस्ताव रख दिया, जिससे इनकार नहीं कर सकीं। जीवाजी राव को राजनीति में नहीं आना था, लेकिन नेहरू के विशेष आग्रह के कारण विजयाराजे सिंधिया को राजनीति में कदम रखना पड़ा।

विजयाराजे के मैदान में आने से कांग्रेस का पक्ष मजबूत हो गया। उन्होंने चुनाव में हिंदू महासभा के उम्मीदवार को हराया और पहली बार सिंधिया राजघराने से कोई सदस्य संसद में पहुंचा। आगे सिंधिया परिवार के लिए राजनीति भी एक विरासत बन गई, क्योंकि मां के बाद उनके बेटे माधव राव सिंधिया राजनीति के दिग्गज बनकर आए।

सब कुछ ठीक चल रहा था, तभी युवा कांग्रेस के नेता अर्जुन सिंह का पंचमढ़ी में आगमन हुआ। वहां उन्होंने राजे-रजवाड़ों को जमकर कोसा। यह बात राजमाता को स्वीकार नहीं हुई। यहीं से कांग्रेस से दूरी बन गई। समय के साथ विजयाराजे सिंधिया कांग्रेस के लिए चुनौती बनती चली गईं। यहां तक कि राजमाता ने कांग्रेस छोड़कर हिंदू महासभा में शामिल हो गईं।

कांग्रेस में गोविंद नारायण सिंह का भी प्रभाव था। उन्हें राजमाता के करीबी नेताओं में गिना जाता था। इससे स्पष्ट होता है कि वे विजयाराजे सिंधिया के इशारे पर कांग्रेस सरकार को गिराने के लिए तैयार थे। अंततः वह समय भी आया, जब 1967 में गोविंद नारायण सिंह ने कांग्रेस के 36 विधायकों को तोड़ लिया। इससे कांग्रेस की सरकार गिर गई।

यहां तक कहा जाता है कि उस समय के मुख्यमंत्री द्वारका प्रसाद मिश्र अपनी सरकार में मंत्री गोविंद नारायण सिंह को कम तवज्जो देते थे, जबकि उनकी तुलना में अर्जुन सिंह की हैसियत बढ़ रही थी। गोविंद नारायण सिंह को राजमाता का आशीर्वाद था और यही एक कारण बना कि वे मध्य प्रदेश के नए मुख्यमंत्री बन गए। कांग्रेस के साथ राजमाता का यह विवाद लंबे समय तक चला।

यहां तक कि जब इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लगाया, तो उनके निशाने पर ग्वालियर की महारानी थीं। विजयाराजे सिंधिया तब संसद में विपक्षी दल की नेता के साथ-साथ अपने क्षेत्र के आम लोगों के बीच लोकप्रिय थीं। राजमाता को गिरफ्तार किया गया और उन्हें दिल्ली की तिहाड़ जेल में डाल दिया गया।

राजमाता राजपरिवार से थीं, उनके पास सब कुछ था, लेकिन आगे उन्होंने अपना जीवन एक मां की तरह जनसेवा में खपा दिया। चार दशकों की राजनीति में उतार-चढ़ाव के बावजूद वे हमेशा सहज मातृत्व से दीप्त राजनीति बनी रहीं। 25 जनवरी 2001 को राजमाता के निधन के साथ ही सिंधिया राजमहल के एक युग का समापन हुआ।

Point of View

बल्कि यह दर्शाती है कि कैसे व्यक्तिगत और राजनीतिक मतभेद एक महत्वपूर्ण बदलाव का कारण बन सकते हैं।
NationPress
04/02/2026

Frequently Asked Questions

विजयाराजे सिंधिया का कांग्रेस से संबंध कैसे शुरू हुआ?
विजयाराजे सिंधिया का कांग्रेस से संबंध जवाहरलाल नेहरू के विशेष आग्रह पर शुरू हुआ, जब उन्होंने ग्वालियर रियासत में कांग्रेस की ताकत बढ़ाने का प्रयास किया।
क्यों बिगड़े विजयाराजे सिंधिया और कांग्रेस के संबंध?
संबंध बिगड़ने के पीछे वैचारिक मतभेद, सत्ता संघर्ष और व्यक्तिगत टकराव जैसे कारण थे।
क्या विजयाराजे सिंधिया ने कांग्रेस को छोड़ दिया?
हाँ, समय के साथ विजयाराजे सिंधिया ने कांग्रेस छोड़कर हिंदू महासभा में शामिल हो गईं।
कांग्रेस में विजयाराजे सिंधिया का क्या योगदान था?
उन्होंने चुनावी प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और सिंधिया परिवार का पहला सदस्य संसद तक पहुंचा।
विजयाराजे सिंधिया की राजनीतिक विरासत क्या है?
उनकी राजनीतिक विरासत उनके बेटे माधव राव सिंधिया द्वारा आगे बढ़ाई गई, जिन्होंने भी राजनीति में बड़ा नाम बनाया।
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