एनआईईपीएमडी में 120+ कर्मचारियों की बर्खास्तगी: कनिमोझी ने मंत्री वीरेंद्र कुमार से तत्काल दखल माँगा
सारांश
मुख्य बातें
द्रविड़ मुनेत्र कषगम (DMK) सांसद कनिमोझी करुणानिधि ने 9 जून 2026 को केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री डॉ. वीरेंद्र कुमार को पत्र लिखकर चेन्नई स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर एम्पावरमेंट ऑफ पर्सन्स विद मल्टीपल डिसेबिलिटीज (एनआईईपीएमडी) में 120 से अधिक कॉन्ट्रैक्ट फैकल्टी और स्टाफ की अचानक बर्खास्तगी के मामले में तत्काल हस्तक्षेप की माँग की है। तमिलनाडु के थूथुक्कुडी से सांसद कनिमोझी ने इस कदम को मनमाना और प्रक्रिया-विरुद्ध बताया है।
संस्थान की स्थिति और कर्मचारी संरचना
एनआईईपीएमडी, भारत सरकार के दिव्यांगजन सशक्तीकरण विभाग (DEPwD) के अंतर्गत एक स्वायत्त संस्थान है। कनिमोझी के पत्र के अनुसार, संस्थान में 588 छात्रों के लिए दिव्यांगता से जुड़े लगभग 13 प्रोग्राम संचालित किए जाते हैं। उल्लेखनीय है कि कुल फैकल्टी में से केवल 20 प्रतिशत स्थायी हैं, जबकि 80 प्रतिशत कॉन्ट्रैक्ट आधार पर कार्यरत हैं — यह अनुपात स्वयं संस्थान की संरचनात्मक कमज़ोरी को उजागर करता है।
नियुक्ति प्रक्रिया और बर्खास्तगी का विवरण
पत्र में कनिमोझी ने स्पष्ट किया कि जिन कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारियों को हटाया गया, उन्हें 2024 में एक अधिकृत चयन समिति द्वारा — जाँच-पड़ताल, परीक्षा, स्किल असेसमेंट और साक्षात्कार जैसी विधिवत प्रक्रियाओं के बाद — नियुक्त किया गया था। उनके नियुक्ति आदेश 2027 तक के स्वीकृत कार्यकाल के साथ जारी किए गए थे।
पत्र के अनुसार, एनआईईपीएमडी में हालिया प्रशासनिक बदलावों के बाद इन कर्मचारियों को बिना उचित नोटिस, बिना बातचीत और बिना अपना पक्ष रखने का अवसर दिए अचानक सेवामुक्त कर दिया गया। इससे संस्थान के दैनिक कामकाज में गंभीर बाधा उत्पन्न हुई है।
दिव्यांग लाभार्थियों पर असर
कनिमोझी ने चेताया कि इस अचानक बर्खास्तगी से संस्थान की चल रही ट्रेनिंग, थेरेपी, रिहैबिलिटेशन सेवाओं और सपोर्ट सिस्टम पर गंभीर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका है। यह ऐसे समय में आया है जब देशभर में दिव्यांगजन सेवाओं को सुदृढ़ करने की बात की जा रही है। 588 छात्रों और उनके परिजनों की आजीविका तथा शैक्षणिक स्थिरता सीधे तौर पर प्रभावित हो रही है।
सांसद की माँगें
कनिमोझी ने केंद्रीय मंत्री डॉ. वीरेंद्र कुमार से निम्नलिखित कदम उठाने का अनुरोध किया है:
पहली माँग — बर्खास्तगी की चल रही प्रक्रिया को तत्काल रोका जाए और मौजूदा कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारियों को उनके 2027 तक के स्वीकृत कार्यकाल तक काम जारी रखने दिया जाए। दूसरी माँग — बड़े पैमाने पर की गई इस बर्खास्तगी की स्वतंत्र जाँच का आदेश दिया जाए। तीसरी माँग — प्रशासनिक कार्यों में प्राकृतिक न्याय, निष्पक्षता और पारदर्शिता के सिद्धांतों का पालन सुनिश्चित किया जाए। चौथी माँग — एकेडमिक, रिहैबिलिटेशन, थेरेपी, हॉस्टल और क्लिनिकल सेवाएँ बिना किसी रुकावट के जारी रखी जाएँ।
आगे क्या होगा
अब नज़रें केंद्रीय मंत्रालय की प्रतिक्रिया पर टिकी हैं। यदि मंत्रालय ने शीघ्र हस्तक्षेप नहीं किया, तो यह मामला संसद में भी उठाया जा सकता है। गौरतलब है कि यह पहली बार नहीं है जब किसी केंद्रीय संस्थान में कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारियों की सामूहिक बर्खास्तगी पर विपक्षी सांसदों ने आवाज़ उठाई हो — लेकिन दिव्यांगजन सेवाओं से जुड़े संस्थान में इस तरह की कार्रवाई विशेष रूप से संवेदनशील मानी जाती है।