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पद्मश्री कृष्ण कन्हाई: सोने-रत्नों से सजे कैनवास पर कृष्ण भक्ति की अनूठी विरासत

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पद्मश्री कृष्ण कन्हाई: सोने-रत्नों से सजे कैनवास पर कृष्ण भक्ति की अनूठी विरासत

सारांश

वृंदावन के पद्मश्री कृष्ण कन्हाई के कैनवास पर सोने की दीप्ति और रत्नों की जड़ाई राधा-कृष्ण को दिव्य रूप देती है। 5,000 से अधिक कलाकृतियाँ, संसद के केंद्रीय कक्ष से स्टैच्यू ऑफ यूनिटी तक — उनकी कला ब्रज की आत्मा को समकालीन संसार से जोड़ती है।

मुख्य बातें

पद्मश्री कृष्ण कन्हाई का जन्म 21 अगस्त 1961 को वृंदावन, मथुरा में हुआ; कला विरासत में पिता पद्मश्री कन्हाई चित्रकार से मिली।
उन्होंने 5,000 से अधिक पेंटिंग्स रची हैं, जिनमें 3,500+ गोल्ड पेंटिंग्स , 800 पोर्ट्रेट और 700 समकालीन चित्र शामिल हैं।
अटल बिहारी वाजपेयी का आदमकद चित्र संसद के केंद्रीय कक्ष में; सरदार पटेल का चित्र स्टैच्यू ऑफ यूनिटी में स्थापित।
उत्तर प्रदेश सरकार के अनुरोध पर 22 मुख्यमंत्रियों सहित 59 पोर्ट्रेट बनाए।
वर्ष 2004 में राष्ट्रपति डॉ.
एपीजे अब्दुल कलाम द्वारा पद्मश्री से सम्मानित; पिता-पुत्र दोनों को पद्मश्री — भारतीय कला में दुर्लभ उपलब्धि।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बिल क्लिंटन , बराक ओबामा और हाउस ऑफ लॉर्ड्स सदस्य के पोर्ट्रेट भी बनाए।

वृंदावन के विख्यात चित्रकार पद्मश्री कृष्ण कन्हाई की कलाकृतियाँ केवल रंगों और रेखाओं तक सीमित नहीं हैं — उनके कैनवास पर शुद्ध सोने की दीप्ति और कीमती रत्नों की जड़ाई से राधा-कृष्ण की छवि जीवंत हो उठती है। ब्रज संस्कृति, कृष्ण भक्ति और समकालीन सौंदर्यबोध के इस अद्वितीय संगम ने उन्हें भारतीय कला जगत में एक विशिष्ट पहचान दिलाई है।

कला की विरासत और प्रारंभिक जीवन

कृष्ण कन्हाई का जन्म 21 अगस्त 1961 को वृंदावन, मथुरा (उत्तर प्रदेश) में हुआ। कला उन्हें पैतृक धरोहर के रूप में मिली — उनके पिता और गुरु पद्मश्री कन्हाई चित्रकार स्वयं राधा-कृष्ण चित्रण के लिए प्रसिद्ध थे। बचपन से ही तूलिका से लगाव रखने वाले कृष्ण कन्हाई ने पिता से कला की बारीकियाँ सीखीं और साथ ही अपनी मौलिक शैली गढ़ने की प्रेरणा भी पाई।

किशोरावस्था में उन्होंने लोक विषयों पर चित्रण आरंभ किया और धीरे-धीरे ऐसी शैली विकसित की जिसमें यमुना घाट की परंपरागत छवियों के साथ आधुनिक दृष्टि का सम्मिश्रण स्पष्ट दिखता है। यही कारण है कि उन्हें यमुना घाट पेंटिंग शैली को लोकप्रिय बनाने वाले अग्रणी कलाकारों में गिना जाता है।

स्वर्ण-रत्न चित्रण की अनूठी शैली

कृष्ण कन्हाई की पहचान का सबसे विशिष्ट पहलू उनकी गोल्ड पेंटिंग्स हैं। वे अपनी कलाकृतियों में शुद्ध सोने और कीमती रत्नों का उपयोग करते हैं, जिससे राधा-कृष्ण की प्रेम-छवियाँ और बाँसुरी बजाते कृष्ण की मुद्राएँ एक दिव्य आभा से आलोकित हो जाती हैं। पारंपरिक धार्मिक चित्रण को उन्होंने आधुनिक और दृश्यात्मक रूप से आकर्षक स्वरूप दिया।

अपने सुदीर्घ करियर में कृष्ण कन्हाई ने 5,000 से अधिक पेंटिंग्स रची हैं, जिनमें लगभग 800 पोर्ट्रेट, करीब 700 समकालीन चित्र और 3,500 से अधिक गोल्ड पेंटिंग्स शामिल हैं।

राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय हस्तियों के पोर्ट्रेट

कृष्ण कन्हाई ने अपने चित्रण को केवल धार्मिक विषयों तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने भारत रत्न से सम्मानित पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का आदमकद चित्र बनाया, जो संसद के केंद्रीय कक्ष में स्थापित है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आग्रह पर उन्होंने सरदार वल्लभभाई पटेल का आदमकद चित्र बनाया, जिसे स्टैच्यू ऑफ यूनिटी में स्थापित किया गया।

उत्तर प्रदेश सरकार के अनुरोध पर उन्होंने राज्य के प्रमुख नेताओं के 59 पोर्ट्रेट बनाए, जिनमें 22 मुख्यमंत्रियों और विधानसभा के 20 पूर्व एवं वर्तमान अध्यक्षों के चित्र शामिल हैं। इनके अतिरिक्त उन्होंने महात्मा गांधी, डॉ. राजेंद्र प्रसाद और डॉ. भीमराव आंबेडकर के भी चित्र बनाए।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उन्होंने अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन, हिलेरी क्लिंटन, पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा और उनके परिवार के पोर्ट्रेट बनाए। ब्रिटेन के हाउस ऑफ लॉर्ड्स के सदस्य जो जॉनसन और अभिनेत्री एवं सांसद हेमा मालिनी के चित्र भी उनकी कला का हिस्सा हैं।

सम्मान और पुरस्कार

कृष्ण कन्हाई को वर्ष 2004 में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने पद्मश्री से अलंकृत किया। इसके अतिरिक्त उन्हें राष्ट्रीय कालिदास सम्मान, यश भारती सम्मान, राजा चक्रधर सम्मान, ब्रज रत्न, ब्रज भूषण, ब्रज विभूति और डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम सम्मान सहित अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कार प्राप्त हुए हैं।

उल्लेखनीय है कि कृष्ण कन्हाई और उनके पिता कन्हाई चित्रकार — दोनों को पद्मश्री से सम्मानित किया जा चुका है, जो भारतीय कला जगत में पिता-पुत्र की एक दुर्लभ और गौरवशाली उपलब्धि मानी जाती है।

ब्रज कला की जीवित परंपरा

कृष्ण कन्हाई की यात्रा यह सिद्ध करती है कि परंपरा और नवाचार का सम्मिश्रण किस प्रकार एक कालजयी कला शैली को जन्म दे सकता है। वृंदावन की गलियों से उठकर संसद भवन और स्टैच्यू ऑफ यूनिटी तक पहुँचने वाली उनकी कला आने वाली पीढ़ियों के लिए भी प्रेरणास्रोत बनी रहेगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि उस सांस्कृतिक निरंतरता की है जो वृंदावन जैसे तीर्थस्थल को जीवित रखती है — जहाँ भक्ति और शिल्प एक-दूसरे के पर्याय हैं। यह उल्लेखनीय है कि उनकी कला को संसद भवन और स्टैच्यू ऑफ यूनिटी जैसे राष्ट्रीय प्रतीक-स्थलों ने आधिकारिक मान्यता दी, जो राज्य-प्रायोजित सांस्कृतिक स्मृति में ब्रज कला की बढ़ती स्वीकार्यता को रेखांकित करता है। पिता-पुत्र दोनों को पद्मश्री मिलना भारतीय गुरु-शिष्य परंपरा की उस ताकत को उजागर करता है जो औपचारिक संस्थाओं से परे, घर की देहरी पर ही पल्लवित होती है।
RashtraPress
20 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पद्मश्री कृष्ण कन्हाई कौन हैं?
कृष्ण कन्हाई वृंदावन, मथुरा के प्रसिद्ध चित्रकार हैं जो शुद्ध सोने और कीमती रत्नों से सजी राधा-कृष्ण पेंटिंग्स के लिए जाने जाते हैं। उन्हें वर्ष 2004 में राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने पद्मश्री से सम्मानित किया।
कृष्ण कन्हाई की पेंटिंग्स किस-किस स्थान पर स्थापित हैं?
उनका बनाया अटल बिहारी वाजपेयी का आदमकद चित्र संसद के केंद्रीय कक्ष में लगा है और सरदार वल्लभभाई पटेल का चित्र स्टैच्यू ऑफ यूनिटी में स्थापित है। इसके अलावा उत्तर प्रदेश विधानसभा में भी उनके बनाए 59 पोर्ट्रेट हैं।
कृष्ण कन्हाई ने अब तक कितनी पेंटिंग्स बनाई हैं?
उन्होंने अपने करियर में 5,000 से अधिक पेंटिंग्स रची हैं, जिनमें 3,500 से अधिक गोल्ड पेंटिंग्स, लगभग 800 पोर्ट्रेट और करीब 700 समकालीन पेंटिंग्स शामिल हैं।
यमुना घाट पेंटिंग शैली क्या है और कृष्ण कन्हाई का इसमें क्या योगदान है?
यमुना घाट पेंटिंग शैली ब्रज क्षेत्र की पारंपरिक लोक-चित्रण परंपरा है जो यमुना तट के धार्मिक और सांस्कृतिक दृश्यों को चित्रित करती है। कृष्ण कन्हाई को इस शैली में आधुनिक सौंदर्यबोध का समावेश कर इसे व्यापक पहचान दिलाने वाले प्रमुख कलाकारों में गिना जाता है।
पिता-पुत्र दोनों को पद्मश्री मिलना क्यों विशेष माना जाता है?
कृष्ण कन्हाई के पिता कन्हाई चित्रकार को भी पद्मश्री प्राप्त है, जिससे यह परिवार भारतीय कला जगत में पिता-पुत्र दोनों को इस राष्ट्रीय सम्मान से नवाज़े जाने की दुर्लभ उपलब्धि हासिल करने वाला बना। यह भारतीय गुरु-शिष्य और पारिवारिक कला-परंपरा की विशिष्ट मिसाल है।
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