पाकिस्तान में 100 साल पुराने मंदिर को तोड़ना असंवैधानिक: कांग्रेस नेताओं की कड़ी आपत्ति
सारांश
मुख्य बातें
पाकिस्तान में एक 100 साल पुराने मंदिर को गिराए जाने पर कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने 3 सितंबर को तीखी प्रतिक्रिया दी है। नेताओं ने एकमत से कहा कि धार्मिक स्थलों पर इस तरह की तोड़फोड़ न केवल दुखद है, बल्कि पूरी तरह असंवैधानिक भी है। यह घटना ऐसे समय में सामने आई है जब पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर पहले से ही गंभीर सवाल उठते रहे हैं।
मुख्य प्रतिक्रियाएँ
कांग्रेस नेता इमरान मसूद ने कहा कि धार्मिक स्थल चाहे किसी भी देश में हो, उसे तोड़ना गहरी पीड़ा देता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि ये स्थल देशों के बनने से भी पहले के हैं और इनका विध्वंस पूरी तरह असंवैधानिक है।
कांग्रेस सांसद मनोज कुमार ने कहा कि मंदिर, मस्जिद और चर्च — ये सभी करोड़ों लोगों की आस्था के केंद्र हैं। उन्होंने कहा, 'हिंदुओं की आस्था मंदिर से, मुसलमानों की मस्जिद से और ईसाइयों की आस्था चर्च से जुड़ी है — किसी भी धार्मिक स्थल पर कार्रवाई से पहले गहराई से विचार करना चाहिए।' उन्होंने पाकिस्तान सरकार से माँग की कि यदि कोई कारण है, तो उसे जनता के सामने पारदर्शी तरीके से रखा जाए।
पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की स्थिति
कांग्रेस नेता उदित राज ने इस मुद्दे को व्यापक संदर्भ में रखते हुए कहा कि पाकिस्तान एक 'नाकाम देश' है जहाँ लोकतंत्र की जड़ें कमज़ोर हैं। उनके अनुसार, इसी कारण वहाँ के धार्मिक अल्पसंख्यक — चाहे ईसाई हों, सिख हों या हिंदू — सुरक्षित महसूस नहीं करते। उन्होंने यह भी कहा कि विभाजन के बाद से हिंदू लगातार वहाँ से पलायन करते रहे हैं।
राम मंदिर सीईओ की नियुक्ति पर विवाद
इस बीच, इमरान मसूद ने राम मंदिर के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) के पद पर एयर मार्शल (सेवानिवृत्त) जितेंद्र मिश्रा की नियुक्ति पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि यह काम साधु-संतों का था और इसे उनसे छीन लिया गया। उन्होंने यह भी पूछा कि क्या ट्रस्ट को कोई योग्य साधु या संत नहीं मिला। गौरतलब है कि राम मंदिर ट्रस्ट में हुई कथित वित्तीय अनियमितताओं की चर्चा के बीच यह नियुक्ति हुई है।
आम जनता पर असर
पाकिस्तान में अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय पर इस घटना का गहरा भावनात्मक प्रभाव पड़ा है। भारत में भी हिंदू संगठनों और विपक्षी दलों ने इस कदम की निंदा की है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की घटनाएँ दोनों देशों के बीच पहले से तनावपूर्ण संबंधों को और जटिल बना सकती हैं।
आगे क्या
अभी तक पाकिस्तान सरकार की ओर से इस मंदिर विध्वंस पर कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है। भारतीय विपक्ष की माँग है कि केंद्र सरकार इस मुद्दे को राजनयिक स्तर पर उठाए और पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने का दबाव बनाए।