पांचना बांध विवाद: 20 साल से सिंचाई नहीं, किसान सड़कों पर; मंत्री किरोड़ी लाल मीणा ने इस्तीफे की चेतावनी दी
सारांश
मुख्य बातें
पांचना बांध विवाद एक बार फिर पूर्वी राजस्थान में राजनीतिक और सामाजिक संकट का रूप ले चुका है — एक तरफ करौली जिले का भरा जलाशय, दूसरी तरफ सवाई माधोपुर और गंगापुर सिटी के किसानों के सूखे खेत। 74 गांवों को प्रभावित करने वाला यह विवाद अब सिंचाई, पुनर्वास, मुआवजे और अदालती आदेशों की अनदेखी जैसे कई मोर्चों पर एक साथ लड़ा जा रहा है। राजस्थान सरकार के मंत्री किरोड़ी लाल मीणा ने सीधी चेतावनी दी है कि यदि न्यायालय के निर्देशों के अनुसार पानी नहीं छोड़ा गया, तो वे राज्य मंत्रिमंडल से इस्तीफा देने पर विचार करेंगे।
बांध का इतिहास और विवाद की जड़ें
पांचना बांध का निर्माण 1977 से 2004 के बीच किया गया था, जिसका उद्देश्य पूर्वी राजस्थान के बड़े हिस्सों में सिंचाई और पेयजल की आपूर्ति करना था। परियोजना के लिए हजारों परिवारों की जमीन और घर अधिग्रहित किए गए, लेकिन जिन किसानों को सिंचाई का लाभ देने का वादा किया गया था, उनका आरोप है कि 2006 के बाद से उनके खेतों तक नहर का पानी एक बार भी नहीं पहुंचा। इसके चलते लगभग 40,000 बीघा कृषि भूमि पूरी तरह वर्षा पर निर्भर हो गई है।
दो पक्ष, दो माँगें
इस विवाद में दो विरोधी गुट हैं। सवाई माधोपुर और गंगापुर सिटी के कमांड क्षेत्र के 35 गांवों के किसान नहर के गेट खोलकर तत्काल सिंचाई जल की माँग कर रहे हैं। वहीं करौली के जलमग्न क्षेत्र (सबमर्जेंस जोन) के 39 गांवों के निवासियों का कहना है कि जब तक मुआवजा, पुनर्वास, रोजगार और गुडला-पंचना लिफ्ट परियोजना से जुड़े लंबित मुद्दों का समाधान नहीं होता, तब तक गेट नहीं खुलने चाहिए। यह ऐसे समय में आया है जब दोनों तरफ से महापंचायतें हो चुकी हैं और राजनीतिक दबाव चरम पर है।
सड़कों पर किसान, रेलवे ट्रैक तक पहुँचा आंदोलन
ताजे तनाव में महिलाओं सहित सैकड़ों प्रदर्शनकारी ट्रैक्टर और भारी मशीनों के साथ दिल्ली-मुंबई रेलवे लाइन की ओर मार्च कर चुके हैं और तत्काल पानी छोड़े जाने की माँग की है। इन प्रदर्शनों के कारण पुलिस और रेलवे सुरक्षा बलों की भारी तैनाती करनी पड़ी। गौरतलब है कि यह आंदोलन लगभग दो दशकों की निराशा का परिणाम है।
मंत्री मीणा की चेतावनी और राजनीतिक प्रतिक्रिया
मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा से मुलाकात के बाद मंत्री किरोड़ी लाल मीणा ने दावा किया कि लगभग 20 वर्षों से सिंचाई जल न मिलने के कारण किसानों को करीब ₹4,000 करोड़ का नुकसान हुआ है और क्षेत्र से बड़े पैमाने पर पलायन हुआ है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि अदालत के निर्देशों के अनुसार पानी नहीं छोड़ा गया, तो वे मंत्रिमंडल से इस्तीफा देने पर विचार करेंगे। वरिष्ठ कांग्रेस नेता और पूर्व उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट ने भी प्रतिक्रिया देते हुए भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नेतृत्व वाली राज्य सरकार से सभी हितधारकों के साथ बातचीत शुरू करने और उच्च न्यायालय के निर्देशों का पालन करने का आग्रह किया। पायलट ने कहा, 'पानी सभी के लिए जरूरी है, और किसी भी स्थिति में ऐसा माहौल नहीं बनना चाहिए जिससे तनाव पैदा हो या भाईचारे की भावना कमजोर हो।'
प्रशासन की कोशिश और आगे की राह
सवाई माधोपुर के जिला कलेक्टर कानाराम ने बताया कि डिविजनल कमिश्नर की अध्यक्षता में एक बैठक हो चुकी है, जिसमें दोनों गुटों के प्रतिनिधियों के साथ बातचीत के जरिए सर्वमान्य समाधान निकालने का निर्णय लिया गया है। प्रशासन का कहना है कि तनाव कम करने और टकराव की बजाय संवाद से मुद्दा सुलझाने की कोशिशें जारी हैं। राजस्थान सरकार सिंचाई की जरूरतों और विस्थापित ग्रामीणों के पुनर्वास की चिंताओं के बीच संतुलन बनाने में कितनी सफल होती है, इसी पर राज्य के सबसे पुराने जल विवादों में से एक का भविष्य टिका है।