पेट्रोल-डीजल को जीएसटी में शामिल करने की मांग: सांसद सस्मित पात्रा ने वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को सौंपा विस्तृत प्रस्ताव
सारांश
मुख्य बातें
राज्यसभा सांसद डॉ. सस्मित पात्रा ने 20 मई 2025 को नई दिल्ली में केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण से मुलाकात कर पेट्रोल और डीजल को वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के दायरे में लाने पर एक विस्तृत प्रस्ताव सौंपा। उन्होंने इस विषय पर राष्ट्रीय स्तर पर संरचित और समावेशी चर्चा शुरू करने की औपचारिक मांग की।
संवैधानिक आधार और पुरानी चर्चाएँ
डॉ. पात्रा ने अपने प्रस्ताव में स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 279ए(5) के तहत पेट्रोलियम उत्पादों को भविष्य में जीएसटी के दायरे में लाने का प्रावधान पहले से ही मौजूद है। उन्होंने कहा कि इस मुद्दे पर जीएसटी परिषद में पूर्व में भी विचार-विमर्श हो चुका है, परंतु मौजूदा आर्थिक परिस्थितियों के मद्देनज़र अब इसे नए सिरे से व्यावहारिक और संतुलित दृष्टिकोण से देखे जाने की आवश्यकता है।
महंगाई और आम जनता पर असर
सांसद ने रेखांकित किया कि पेट्रोल और डीजल की कीमतें महंगाई, परिवहन लागत, लॉजिस्टिक्स खर्च, कृषि लागत, एमएसएमई क्षेत्र के परिचालन व्यय और आम नागरिकों के दैनिक जीवन को सीधे प्रभावित करती हैं। उन्होंने यह भी बताया कि विभिन्न राज्यों में वैट की अलग-अलग दरें लागू होने के कारण जीएसटी के मूल उद्देश्य — कर समानता और एकीकृत राष्ट्रीय बाज़ार — की परिकल्पना अभी तक पूरी तरह साकार नहीं हो सकी है।
ओडिशा का उदाहरण और उद्योगों पर प्रभाव
डॉ. पात्रा ने विशेष रूप से ओडिशा का उल्लेख करते हुए कहा कि यह राज्य खनन, उद्योग और लॉजिस्टिक्स गतिविधियों का एक प्रमुख केंद्र है। उनके अनुसार, यदि पेट्रोल-डीजल को चरणबद्ध रूप से जीएसटी में शामिल किया जाता है, तो माल ढुलाई और सप्लाई चेन की लागत में कमी आ सकती है। इससे उद्योगों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बढ़ेगी और किसानों, ट्रांसपोर्ट ऑपरेटरों तथा एमएसएमई क्षेत्र को ठोस राहत मिलेगी।
चरणबद्ध मॉडल का सुझाव
डॉ. पात्रा ने यह स्वीकार किया कि पेट्रोलियम उत्पादों पर लगने वाला कर राज्यों की आय का एक महत्वपूर्ण स्रोत है। इसीलिए उन्होंने तत्काल और बिना शर्त समावेश की बजाय एक संतुलित और चरणबद्ध मॉडल अपनाने का सुझाव दिया। उनके प्रस्ताव के अनुसार जीएसटी परिषद पेट्रोल-डीजल के लिए अलग जीएसटी स्लैब, राज्यों के लिए ट्रांजिशनल मुआवज़ा, सीमित अवधि का राजस्व सुरक्षा उपकर (सेस) और वित्तीय स्थिरता के लिए एक निर्धारित फॉर्मूला तैयार करने पर विचार कर सकती है।
विशेषज्ञ समूह और राष्ट्रीय सहमति की मांग
सांसद ने वित्त मंत्री से आग्रह किया कि सभी राज्यों के साथ व्यापक परामर्श प्रक्रिया शुरू की जाए और एक तकनीकी व वित्तीय विशेषज्ञ समूह का गठन किया जाए। यह समूह पेट्रोलियम उत्पादों को चरणबद्ध तरीके से जीएसटी व्यवस्था में शामिल करने के मॉडल का अध्ययन कर राष्ट्रीय सहमति निर्मित करने में सहायक भूमिका निभा सकता है। डॉ. पात्रा के अनुसार, यह निर्णय केवल एक कर सुधार नहीं होगा — बल्कि यह देश में आर्थिक संतुलन, औद्योगिक प्रतिस्पर्धा और आम जनता को राहत देने की दिशा में एक निर्णायक कदम साबित हो सकता है।