PM मोदी ने इंडोनेशिया के राष्ट्रपति को भेंट किया कश्मीरी पेपर-मैशे कटोरा, कारीगरों ने कहा — 'वैश्विक पहचान मिली'
सारांश
मुख्य बातें
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हालिया इंडोनेशिया दौरे में वहाँ के राष्ट्रपति को कश्मीरी पेपर-मैशे का एक पारंपरिक कटोरा उपहार में दिया — एक ऐसा कदम जिसने घाटी के हस्तशिल्प समुदाय में उत्साह की लहर दौड़ा दी है। श्रीनगर के कारीगरों ने इसे कश्मीर की सदियों पुरानी कलात्मक विरासत के लिए एक ऐतिहासिक अंतरराष्ट्रीय मंच करार दिया है।
कारीगरों की प्रतिक्रिया
पेपर-मैशे कलाकार बशारत हुसैन ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी का यह कदम कश्मीरी हस्तशिल्प के प्रति उनकी गहरी सराहना को दर्शाता है और इसने अंतरराष्ट्रीय मंच पर इस क्षेत्र की समृद्ध कलात्मक विरासत को प्रदर्शित करने में मदद की है। उन्होंने उम्मीद जताई कि इस पहचान से वैश्विक माँग बढ़ेगी और स्थानीय कारीगरों को बेहतर अवसर मिलेंगे।
हुसैन ने कहा, 'पेपर-मैशे एक बहुत पुरानी कला है जो यहाँ फारस से आई थी, और हमने इसे लगभग 500-600 साल पहले अपनाया था। मुझे व्यक्तिगत रूप से बहुत खुशी है कि प्रधानमंत्री ने इसे उपहार के तौर पर चुना। इससे इस कला को वैश्विक स्तर पर पहचान मिल सकती है।'
कला की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
पेपर-मैशे की जड़ें फारसी परंपरा में हैं और यह कला कश्मीर में लगभग छह शताब्दियों से फल-फूल रही है। कारीगर कागज़ की लुगदी को जटिल साँचों में ढालकर, फिर हाथ से रंग और वार्निश चढ़ाकर ये नायाब वस्तुएँ तैयार करते हैं। बशारत हुसैन के अनुसार, पेपर-मैशे अब एक अंतरराष्ट्रीय ब्रांड बन चुका है और इस तरह के राजनयिक उपहार इसे और बूस्ट करने में अहम भूमिका निभाते हैं।
उद्योग की मौजूदा चुनौतियाँ
हालाँकि, हुसैन ने यह भी स्वीकार किया कि कश्मीर के हस्तशिल्प क्षेत्र की मौजूदा स्थिति चिंताजनक है। उन्होंने कहा, 'एक समय था जब अर्थव्यवस्था में इसकी बहुत अहम भूमिका थी — सिर्फ पेपर-मैशे ही नहीं, बल्कि कई अन्य कलाएँ भी। कारपेट उद्योग को बड़ा झटका लगा है। इसे फिर से जीवित करने और संरक्षित करने की ज़रूरत है।' उन्होंने जोड़ा कि सरकार इस दिशा में पहल कर रही है, लेकिन कहीं और से भी दिक्कतें आ रही हैं।
गौरतलब है कि कश्मीर का हस्तशिल्प क्षेत्र वर्षों से बाज़ार तक पहुँच, नकली उत्पादों की प्रतिस्पर्धा और कुशल कारीगरों की घटती संख्या जैसी समस्याओं से जूझ रहा है। इस पृष्ठभूमि में प्रधानमंत्री स्तर पर मिली यह राजनयिक दृश्यता उद्योग के लिए एक सकारात्मक संकेत मानी जा रही है।
राजनयिक उपहार का महत्व
भारतीय प्रधानमंत्रियों द्वारा विदेशी राष्ट्राध्यक्षों को भारतीय हस्तशिल्प भेंट करने की परंपरा रही है, जो 'सॉफ्ट पावर डिप्लोमेसी' का हिस्सा मानी जाती है। कश्मीरी पेपर-मैशे का चुनाव इस बार विशेष रूप से उल्लेखनीय है क्योंकि यह घाटी की सांस्कृतिक पहचान को वैश्विक मंच पर रेखांकित करता है।
आगे की राह
कारीगर समुदाय अब उम्मीद कर रहा है कि इस तरह की अंतरराष्ट्रीय पहचान से निर्यात के नए द्वार खुलेंगे और सरकार हस्तशिल्प संरक्षण के लिए ठोस नीतिगत कदम उठाएगी। बशारत हुसैन का कहना है कि पेपर-मैशे के स्थानीय स्तर पर उपयोग से अभी इसकी पहचान बनी हुई है, लेकिन वैश्विक बाज़ार में इसकी संभावनाएँ कहीं अधिक हैं।