ओडिशा की तालपत्र कला को वैश्विक पहचान: कारीगर सौम्यरंजन दास ने PM मोदी को दिया श्रेय
सारांश
मुख्य बातें
पुरी के प्रसिद्ध तालपत्र कलाकार सौम्यरंजन दास ने कहा है कि ओडिशा की सदियों पुरानी ताड़ के पत्तों पर नक्काशी की कला को अब अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर वह सम्मान मिल रहा है, जिसकी वह वर्षों से हकदार थी। उनके अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश यात्राओं में भारतीय पारंपरिक शिल्प को उपहार के रूप में प्रस्तुत करने की पहल ने इस बदलाव में निर्णायक भूमिका निभाई है। 21 मई को पुरी से बात करते हुए दास ने कहा कि यह पहचान न केवल कलाकारों के लिए गर्व की बात है, बल्कि उनके लिए नए आर्थिक अवसरों का द्वार भी खोल रही है।
नॉर्वे यात्रा में ताला पट्टचित्र को मिली वैश्विक मंच
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया नॉर्वे यात्रा के दौरान नॉर्वे के प्रधानमंत्री जोनास गहर स्टोर, राजा हेराल्ड, रानी सोन्या और क्राउन प्रिंस हाकोन को विशेष रूप से चुने गए भारतीय उपहार भेंट किए गए। इन उपहारों में रानी सोन्या को ताड़ के पत्तों पर निर्मित एक 'पट्टचित्र' कलाकृति दी गई, जिसे स्थानीय भाषा में 'ताला पट्टचित्र' कहा जाता है। यह ओडिशा की सबसे प्राचीन और सूक्ष्म कलात्मक परंपराओं में से एक मानी जाती है।
इन उपहारों के माध्यम से भारत की समृद्ध कलात्मक विरासत, टिकाऊ कारीगरी और सांस्कृतिक गहराई को वैश्विक नेताओं के सामने प्रस्तुत किया गया। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की कूटनीतिक भेंटें भारत की 'सॉफ्ट पावर' को मजबूत करने का एक प्रभावी माध्यम बनती जा रही हैं।
ताला पट्टचित्र: एक अनूठी कला परंपरा
कपड़े पर बनाई जाने वाली सामान्य पेंटिंग्स से भिन्न, ताला पट्टचित्र में पामिरा (ताड़) के पेड़ से प्राप्त विशेष रूप से तैयार पत्तों पर बारीक चित्र उकेरे जाते हैं। यह कला अक्सर मोड़ने योग्य पैनलों या धागे से जुड़ी पट्टियों के रूप में तैयार की जाती है। इसमें कहानी कहने की शैली, सुलेख और पारंपरिक चित्रकला का अद्भुत संगम एक ही कृति में देखने को मिलता है।
इस कला की प्राकृतिक बनावट और सूक्ष्म कारीगरी पीढ़ियों से चली आ रही धैर्य और समर्पण की परंपरा को जीवंत रखती है। ओडिशा के कारीगर समुदायों की रचनात्मकता और कौशल इस माध्यम में अपनी पूर्ण अभिव्यक्ति पाते हैं।
कारीगरों का नज़रिया: रणनीति नहीं, अवसर
सौम्यरंजन दास ने स्पष्ट किया कि जहाँ कुछ लोग प्रधानमंत्री द्वारा पारंपरिक हस्तशिल्प को उपहार में देने को एक राजनीतिक रणनीति के रूप में देख सकते हैं, वहीं कारीगर इसे एक अलग दृष्टि से देखते हैं। उन्होंने कहा, "हम जैसे कारीगरों के लिए, यह हमारे काम और कला को बढ़ावा देने और उसका विस्तार करने का एक माध्यम है।"
दास ने यह भी जोड़ा, "मुझे नहीं लगता कि पीएम मोदी ने विदेशों के नेताओं को जो तोहफे दिए हैं, वे किसी एजेंडे का हिस्सा हैं। 'पीएम मोदी हैं तो मुमकिन है,' और इसीलिए हमारी कला को अब पूरी दुनिया में पहचान मिल रही है।" यह बयान उस व्यापक भावना को दर्शाता है जो ओडिशा के कारीगर समुदायों में देखी जा रही है।
नई पहचान से खुले आर्थिक अवसर
दास के अनुसार, हाल के वर्षों में ओडिशा की पारंपरिक ताड़पत्र कला को वैश्विक स्तर पर असाधारण सराहना मिली है। उन्होंने बताया कि पहले इस कला पर शायद ही कोई ध्यान देता था, लेकिन आज दुनिया भर से सकारात्मक प्रतिक्रियाएँ मिल रही हैं। इस बढ़ती पहचान ने उन कारीगरों के लिए नए द्वार खोले हैं, जिन्हें पहले अपनी कला को स्थापित करने में भारी संघर्ष करना पड़ता था।
उन्होंने कहा, "यह यकीनन हमारी संस्कृति और पारंपरिक कला को बढ़ावा देने जैसा है।" गौरतलब है कि यह ऐसे समय में आया है जब भारत सरकार 'एक जिला एक उत्पाद' और 'विश्वकर्मा योजना' जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से पारंपरिक कारीगरों को मुख्यधारा की अर्थव्यवस्था से जोड़ने की कोशिश कर रही है।
आगे की राह
सौम्यरंजन दास का मानना है कि पीएम मोदी एक ऐसे माध्यम बन गए हैं, जिनके जरिए ओडिशा की संस्कृति और पारंपरिक कलाएँ वैश्विक मंच तक पहुँच रही हैं। आलोचकों का कहना है कि इस अंतर्राष्ट्रीय पहचान को दीर्घकालिक बनाने के लिए घरेलू स्तर पर भी कारीगरों को संस्थागत समर्थन और बाज़ार तक पहुँच सुनिश्चित करना आवश्यक होगा। यदि यह गति बनी रही, तो ओडिशा की तालपत्र कला न केवल एक सांस्कृतिक धरोहर के रूप में, बल्कि एक वैश्विक ब्रांड के रूप में भी स्थापित हो सकती है।