पुणे: भिगवण में 66 महिलाओं से ₹5.69 लाख गबन के आरोपी वसूली अधिकारी को जमानत
सारांश
मुख्य बातें
पुणे जिले के इंदापुर तालुका के भिगवण में महिला बचत समूहों की 66 सदस्याओं से कर्ज की किस्तों के नाम पर कथित तौर पर ₹5 लाख 69 हजार 508 रुपये वसूल कर संस्था में जमा न करने के मामले में आरोपी वसूली अधिकारी सुरेंद्र चंद्रकांत घोलप को इंदापुर न्यायालय ने 29 सितंबर 2026 को जमानत दे दी है। न्यायालय ने ₹50 हजार के पर्सनल रिकग्निजेंस (पीआर) बॉन्ड और एक जमानतदार की शर्त पर यह राहत मंजूर की।
मामले की पृष्ठभूमि
सी कॉमर्स मार्केट सर्विसेस प्राइवेट लिमिटेड की भिगवण शाखा के प्रबंधक सोमनाथ भोंडवे की शिकायत पर भिगवण पुलिस स्टेशन में यह मामला दर्ज हुआ था। आरोप है कि 14 मई 2025 को वसूली अधिकारी के पद पर नियुक्त सुरेंद्र घोलप को महिला कर्जदारों से मूलधन और ब्याज की किस्तें एकत्र कर संस्था के खाते में जमा करने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई थी।
शिकायत के अनुसार, 14 मई से 30 अक्टूबर 2025 के बीच आरोपी ने नकद और ऑनलाइन माध्यम से 66 महिलाओं से कुल ₹5 लाख 69 हजार 508 रुपये वसूले, लेकिन वह रकम संस्था में जमा नहीं कराई गई। इस मामले में सुरेंद्र घोलप को 18 जून 2026 को गिरफ्तार किया गया था।
बचाव पक्ष की दलीलें
जमानत याचिका की सुनवाई में आरोपी के वकील ने तर्क दिया कि मामले की जांच पूरी हो चुकी है और आरोपत्र भी न्यायालय में दाखिल किया जा चुका है। बचाव पक्ष ने एफआईआर दर्ज करने में करीब आठ महीने की देरी का मुद्दा भी न्यायालय के समक्ष प्रमुखता से उठाया।
न्यायालय के अवलोकन
इंदापुर न्यायालय ने सुनवाई के दौरान इस तथ्य पर विशेष ध्यान दिया कि आरोपी के पास से आरोपित रकम की कोई बरामदगी नहीं हुई है। इसके अलावा मामले में 68 गवाह होने के कारण न्यायालय ने माना कि मुकदमे की सुनवाई पूरी होने में काफी समय लगने की संभावना है। इन परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए जमानत मंजूर की गई।
लागू धारा और शर्तें
इस मामले में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 316(4) लगाई गई है, जिसके तहत सात वर्ष तक के कारावास का प्रावधान है। न्यायालय ने जमानत देते हुए आरोपी को सख्त निर्देश दिए हैं कि वह साक्ष्यों से किसी प्रकार की छेड़छाड़ नहीं करेगा, गवाहों पर किसी तरह का दबाव नहीं डालेगा और सुनवाई की प्रत्येक तारीख पर न्यायालय में नियमित रूप से उपस्थित रहेगा।
आगे क्या होगा
मामले में 68 गवाहों की गवाही होनी है, जिससे मुकदमे की प्रक्रिया लंबी खिंच सकती है। यह मामला ग्रामीण क्षेत्रों में महिला स्वयं सहायता समूहों की कर्ज-वसूली प्रणाली की कमज़ोरियों को उजागर करता है, जहाँ नकद लेन-देन पर निगरानी अपेक्षाकृत कम होती है। गौरतलब है कि ऑनलाइन और नकद दोनों माध्यमों से वसूली के बावजूद रकम के गायब होने का यह मामला संस्थागत जवाबदेही के सवाल खड़े करता है।