10 अगस्त 2026
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राजस्थान में ₹306 करोड़ से बनेंगे जनजातीय और महाराणा प्रताप पर्यटन सर्किट, हजारों को मिलेगा रोजगार

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राजस्थान में ₹306 करोड़ से बनेंगे जनजातीय और महाराणा प्रताप पर्यटन सर्किट, हजारों को मिलेगा रोजगार

सारांश

राजस्थान सरकार ₹306 करोड़ से जनजातीय और महाराणा प्रताप पर्यटन सर्किट बना रही है — बेणेश्वर धाम से हल्दीघाटी तक। यह सिर्फ पर्यटन नहीं, बल्कि आदिवासी समुदायों के सामाजिक-आर्थिक सशक्तीकरण का बड़ा दांव है।

मुख्य बातें

राजस्थान सरकार ₹306 करोड़ से अधिक की पर्यटन परियोजनाओं के तहत जनजातीय पर्यटन सर्किट और महाराणा प्रताप पर्यटन सर्किट विकसित कर रही है।
डूंगरपुर के बेणेश्वर धाम पर ₹49.40 करोड़ और बांसवाड़ा के मानगढ़ धाम पर ₹13.41 करोड़ खर्च होंगे।
महाराणा प्रताप पर्यटन सर्किट पर ₹206 करोड़ से अधिक खर्च होंगे; हल्दीघाटी , कुंभलगढ़ , चावंड , गोगुंदा और दिवेर जुड़ेंगे।
'बनफूल ट्राइबल डिजाइन स्टूडियो' के जरिए जनजातीय कलाकारों को बाजार से जोड़ा जाएगा।
'सोंध माटी आदि धरोहर दस्तावेजीकरण योजना' के तहत लोक कला, संगीत और भित्ति चित्रों का संरक्षण होगा।
योजना का लक्ष्य स्थानीय निवासियों, कारीगरों और स्वयं सहायता समूहों के लिए रोजगार एवं स्वरोजगार के अवसर बढ़ाना है।

राजस्थान सरकार ने जनजातीय क्षेत्रों को वैश्विक पर्यटन मानचित्र पर स्थापित करने के लिए ₹306 करोड़ से अधिक की महत्वाकांक्षी पर्यटन परियोजनाओं को मंजूरी दी है। 10 अगस्त 2026 को जारी आधिकारिक जानकारी के अनुसार, इन परियोजनाओं के अंतर्गत जनजातीय पर्यटन सर्किट और महाराणा प्रताप पर्यटन सर्किट — दो प्रमुख पर्यटन गलियारे विकसित किए जाएंगे। अधिकारियों का कहना है कि यह पहल केवल पर्यटन तक सीमित नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने और जनजातीय समुदायों की आजीविका सुधारने पर भी केंद्रित है।

जनजातीय पर्यटन सर्किट: प्रमुख स्थल और बजट

प्रस्तावित जनजातीय पर्यटन सर्किट के तहत डूंगरपुर स्थित बेणेश्वर धाम — जिसे जनजातीय समुदाय का 'कुंभ' कहा जाता है — के विकास पर ₹49.40 करोड़ खर्च किए जाएंगे। बांसवाड़ा के मानगढ़ धाम के लिए ₹13.41 करोड़ आवंटित किए गए हैं।

इस सर्किट में चित्तौड़गढ़ का मातृकुंडिया (जिसे 'मेवाड़ का प्रयाग' कहा जाता है), प्रतापगढ़ का सीतामाता अभयारण्य, बांसवाड़ा का त्रिपुरा सुंदरी मंदिर, गौतमेश्वर महादेव मंदिर और उदयपुर का ऋषभदेव मंदिर भी शामिल होंगे। इसके अलावा बारां का सीताबाड़ी, झाड़ोल के कमलनाथ महादेव और रामकुंडा महादेव मंदिर, उदयपुर का जावर माता मंदिर, सलूम्बर का सोनार माता मंदिर और बांसवाड़ा का सलाकेश्वर महादेव मंदिर भी पर्यटन विकास योजना में शामिल हैं।

महाराणा प्रताप पर्यटन सर्किट: ₹206 करोड़ से ऐतिहासिक विरासत को नई पहचान

राजस्थान की गौरवशाली ऐतिहासिक विरासत को संरक्षित और प्रचारित करने के लिए ₹206 करोड़ से अधिक की लागत से महाराणा प्रताप पर्यटन सर्किट विकसित किया जाएगा। यह सर्किट चावंड, हल्दीघाटी, गोगुंदा, कुंभलगढ़, दिवेर और उदयपुर जैसे ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थलों को एक सूत्र में पिरोएगा।

गौरतलब है कि हल्दीघाटी और कुंभलगढ़ पहले से ही राजस्थान के प्रमुख पर्यटन स्थलों में गिने जाते हैं। इस सर्किट के माध्यम से इन स्थलों को बेहतर आधारभूत संरचना और कनेक्टिविटी मिलने की उम्मीद है। डूंगरपुर में शिल्पग्राम और चित्तौड़गढ़ में हेरिटेज वॉकवे का निर्माण भी इस योजना का हिस्सा है। गोगुंदा की बाईजी की बावड़ी, उदयपुर के करणी माता मंदिर और नीमच माता मंदिर के संरक्षण एवं विकास का कार्य भी प्रस्तावित है।

सांस्कृतिक संरक्षण और 'बनफूल' ब्रांडिंग पहल

जनजातीय संस्कृति के दस्तावेजीकरण के लिए 'सोंध माटी आदि धरोहर दस्तावेजीकरण योजना' चलाई जा रही है। इसके जरिए पारंपरिक वाद्य यंत्र, खानपान, चित्रकला, भित्ति चित्र, लकड़ी और पत्थर की कला, लोक नृत्य और संगीत को संरक्षित और प्रचारित किया जाएगा।

सरकार 'बनफूल ट्राइबल डिजाइन स्टूडियो' और 'बनफूल' ब्रांडिंग पहल के माध्यम से जनजातीय कलाकारों को बाजार से जोड़ने और उनके पारंपरिक उत्पादों को राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने का प्रयास कर रही है। यह ऐसे समय में आया है जब देश भर में आदिवासी हस्तशिल्प को बढ़ावा देने की माँग तेज हो रही है।

रोजगार और सामाजिक-आर्थिक सशक्तीकरण

अधिकारियों के अनुसार, 'टूरिज्म इन ट्राइब्स' पहल को केवल पर्यटन कार्यक्रम के रूप में नहीं, बल्कि सामाजिक-आर्थिक सशक्तीकरण और सांस्कृतिक गौरव से जुड़े अभियान के रूप में विकसित किया जा रहा है। इससे जनजातीय क्षेत्रों में पर्यटकों की संख्या बढ़ने, उनके ठहराव की अवधि लंबी होने और स्थानीय निवासियों, कारीगरों तथा स्वयं सहायता समूहों के लिए रोजगार एवं स्वरोजगार के नए अवसर पैदा होने की उम्मीद है।

सरकार जनजातीय संस्कृति, जनजातीय स्वतंत्रता सेनानियों के योगदान और जंगल एवं जल संसाधनों से उनके पारंपरिक संबंधों को दर्शाने वाली डॉक्यूमेंट्री फिल्में भी तैयार करेगी, जो ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण स्थानों पर प्रदर्शित की जाएंगी। आने वाले वर्षों में राजस्थान के जनजातीय क्षेत्र घरेलू और विदेशी पर्यटकों के लिए प्रमुख आकर्षण केंद्र बनने की दिशा में अग्रसर हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

न कि ठेकेदारों और बाहरी ऑपरेटरों के हाथ में जाए। 'बनफूल' जैसी ब्रांडिंग पहलें तब तक टिकाऊ नहीं होतीं जब तक कलाकारों को उचित मूल्य श्रृंखला में शामिल न किया जाए। हल्दीघाटी और कुंभलगढ़ जैसे स्थल पहले से लोकप्रिय हैं — सवाल यह है कि क्या नई फंडिंग दूरदराज के जनजातीय गाँवों तक पहुँचेगी या सिर्फ पहले से विकसित स्थलों को और चमकाएगी।
RashtraPress
10 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

राजस्थान का जनजातीय पर्यटन सर्किट क्या है और इसमें कौन-से स्थल शामिल हैं?
राजस्थान सरकार द्वारा प्रस्तावित जनजातीय पर्यटन सर्किट में डूंगरपुर का बेणेश्वर धाम, बांसवाड़ा का मानगढ़ धाम, चित्तौड़गढ़ का मातृकुंडिया, प्रतापगढ़ का सीतामाता अभयारण्य, बांसवाड़ा का त्रिपुरा सुंदरी मंदिर और उदयपुर का ऋषभदेव मंदिर शामिल हैं। इस सर्किट के विकास पर ₹306 करोड़ से अधिक की परियोजनाएं लागू की जा रही हैं।
महाराणा प्रताप पर्यटन सर्किट में कितना खर्च होगा और कौन-से स्थल जुड़ेंगे?
महाराणा प्रताप पर्यटन सर्किट पर ₹206 करोड़ से अधिक खर्च होंगे। यह सर्किट हल्दीघाटी, कुंभलगढ़, चावंड, गोगुंदा, दिवेर और उदयपुर को जोड़ेगा। डूंगरपुर में शिल्पग्राम और चित्तौड़गढ़ में हेरिटेज वॉकवे का निर्माण भी इसी योजना के तहत होगा।
'बनफूल ट्राइबल डिजाइन स्टूडियो' क्या है?
'बनफूल ट्राइबल डिजाइन स्टूडियो' राजस्थान सरकार की एक ब्रांडिंग पहल है, जिसका उद्देश्य जनजातीय कलाकारों को बाजार से जोड़ना और उनके पारंपरिक उत्पादों को राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाना है। यह पहल जनजातीय पर्यटन विकास योजना का हिस्सा है।
इन पर्यटन परियोजनाओं से स्थानीय लोगों को क्या फायदा होगा?
अधिकारियों के अनुसार, इन परियोजनाओं से स्थानीय निवासियों, कारीगरों और स्वयं सहायता समूहों के लिए रोजगार व स्वरोजगार के नए अवसर पैदा होंगे। पर्यटकों की संख्या और उनके ठहराव की अवधि बढ़ने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी लाभ मिलने की उम्मीद है।
'सोंध माटी आदि धरोहर दस्तावेजीकरण योजना' का उद्देश्य क्या है?
इस योजना के जरिए जनजातीय समुदायों की सांस्कृतिक विरासत — जिसमें पारंपरिक वाद्य यंत्र, खानपान, चित्रकला, भित्ति चित्र, लकड़ी और पत्थर की कला, लोक नृत्य और संगीत शामिल हैं — का दस्तावेजीकरण, संरक्षण और प्रचार किया जाएगा। सरकार इन विषयों पर डॉक्यूमेंट्री फिल्में भी बनाएगी जो ऐतिहासिक स्थलों पर प्रदर्शित होंगी।
राष्ट्र प्रेस
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