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राजेंद्र कृष्ण जयंती: वो गीतकार जिसने 'बापू की अमर कहानी' से रातों-रात जीता करोड़ों का दिल

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राजेंद्र कृष्ण जयंती: वो गीतकार जिसने 'बापू की अमर कहानी' से रातों-रात जीता करोड़ों का दिल

सारांश

राजेंद्र कृष्ण सिर्फ गीतकार नहीं थे — वे उस दौर की आत्मा थे। 1948 में गांधी जी की हत्या के दर्द को शब्द देने से लेकर 'पड़ोसन' की हँसी तक, उनकी कलम ने हर रंग को छुआ। 106वीं जयंती पर उनकी विरासत आज भी उतनी ही प्रासंगिक है।

मुख्य बातें

राजेंद्र कृष्ण दुग्गल का जन्म 6 जून 1919 को जलालपुर जट्टान (अब पाकिस्तान) में हुआ था।
1948 में लिखे गीत 'सुनो सुनो ऐ दुनिया वालों' ने उन्हें रातों-रात राष्ट्रीय पहचान दिलाई; इसे मोहम्मद रफी ने गाया था।
'अलबेला' (1951), 'पड़ोसन' (1968) और 'ब्लैक मेल' (1973) समेत दर्जनों फिल्मों के गीत उनकी कलम से निकले।
1965 में फिल्म 'खानदान' के गीत के लिए फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ गीतकार पुरस्कार मिला।
23 सितंबर 1987 को निधन; उनके गीत आज भी हर पीढ़ी में लोकप्रिय हैं।

हिंदी सिनेमा के अमर गीतकार राजेंद्र कृष्ण दुग्गल की 6 जून 2025 को 106वीं जयंती है — एक ऐसे फनकार की, जिन्होंने अपनी कलम से हँसाया भी, रुलाया भी और देश के दर्द को शब्द भी दिए। जलालपुर जट्टान (अब पाकिस्तान) में जन्मे इस शायर ने मुंबई की फिल्मी दुनिया में जो मुकाम हासिल किया, वह आज भी हर पीढ़ी की प्लेलिस्ट में जीवित है।

शुरुआती जीवन और मुंबई तक का सफर

राजेंद्र कृष्ण का जन्म 6 जून 1919 को जलालपुर जट्टान के एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था। बचपन से ही कविता और शेरो-शायरी उनकी रगों में दौड़ती थी। पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने कुछ समय शिमला में सरकारी सेवा भी की, लेकिन कलम की पुकार उन्हें 1940 के दशक के मध्य में मुंबई खींच लाई। फिल्म जगत में पैर जमाना आसान न था, मगर उनकी लगन ने उन्हें जल्द ही पहचान दिलाई।

वो गीत जिसने रातों-रात बनाया मशहूर

1948 में महात्मा गांधी की हत्या के बाद पूरा देश शोक में डूबा था। राजेंद्र कृष्ण ने उस सामूहिक वेदना को शब्द दिए — 'सुनो सुनो ऐ दुनिया वालों, बापू की ये अमर कहानी'मोहम्मद रफी की आवाज़ और हुस्नलाल-भगतराम के संगीत से सजे इस गैर-फिल्मी गीत ने हर हिंदुस्तानी की आँखें नम कर दीं। यह एक गीत उनकी पहचान बन गया और उन्हें देश के कोने-कोने में स्थापित कर दिया।

बहुमुखी प्रतिभा: रूमानी से चुलबुले तक

राजेंद्र कृष्ण की कलम की रेंज असाधारण थी। 'अलबेला' (1951) का 'शोला जो भड़के', 'पड़ोसन' (1968) का 'एक चतुर नार बड़ी होशियार' और 'ब्लैक मेल' (1973) का 'पल-पल दिल के पास' — ये सभी उन्हीं की कलम से निकले। उन्होंने सी. रामचंद्र, मदन मोहन और हेमंत कुमार जैसे दिग्गज संगीतकारों के साथ मिलकर दशकों तक सदाबहार गीतों की धारा बहाई।

पटकथा लेखन और फिल्मफेयर सम्मान

गीतकार के साथ-साथ राजेंद्र कृष्ण एक सिद्धहस्त पटकथा और संवाद लेखक भी थे। 'साधना', 'पड़ोसन' और 'बॉम्बे टू गोवा' जैसी फिल्मों की स्क्रिप्ट उनके दम पर जीवंत हुई। 'पड़ोसन' में महमूद और किशोर कुमार की कॉमिक टाइमिंग को अमर बनाने में उनके संवादों की निर्णायक भूमिका रही। 1965 में फिल्म 'खानदान' के गीत 'तुम्हीं मेरे मंदिर, तुम्हीं मेरी पूजा' के लिए उन्हें प्रतिष्ठित फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ गीतकार पुरस्कार से नवाज़ा गया।

विरासत जो आज भी गूँजती है

23 सितंबर 1987 को राजेंद्र कृष्ण ने इस दुनिया को अलविदा कहा, लेकिन उनके गीत आज भी हर पीढ़ी के दिल में और मोबाइल की प्लेलिस्ट में उतनी ही ताज़गी से बजते हैं। उनकी जयंती पर उनकी यह अमर विरासत याद दिलाती है कि सच्ची कला कभी पुरानी नहीं पड़ती।

संपादकीय दृष्टिकोण

महज़ एक फिल्मी नग्मा नहीं। उनकी विरासत यह भी याद दिलाती है कि हिंदी सिनेमा का स्वर्णकाल केवल संगीतकारों और गायकों का नहीं, बल्कि उन गुमनाम कलमकारों का भी था जिनके शब्दों पर वह इमारत खड़ी थी। आज जब गीत-लेखन की गहराई पर सवाल उठते हैं, तब राजेंद्र कृष्ण जैसे फनकारों को याद करना सिर्फ श्रद्धांजलि नहीं — एक मानक याद दिलाना है।
RashtraPress
21 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

राजेंद्र कृष्ण कौन थे?
राजेंद्र कृष्ण दुग्गल हिंदी सिनेमा के प्रमुख गीतकार, पटकथा और संवाद लेखक थे, जिन्होंने 1940 से 1980 के दशक तक सैकड़ों फिल्मों में अपनी कलम का जादू बिखेरा। 'पड़ोसन', 'अलबेला' और 'खानदान' जैसी फिल्मों के गीत और संवाद उनकी पहचान हैं।
राजेंद्र कृष्ण का सबसे प्रसिद्ध गीत कौन सा है?
1948 में महात्मा गांधी की हत्या के बाद लिखा गैर-फिल्मी गीत 'सुनो सुनो ऐ दुनिया वालों, बापू की ये अमर कहानी' उनकी पहचान बना। मोहम्मद रफी की आवाज़ और हुस्नलाल-भगतराम के संगीत से सजे इस गीत ने उन्हें रातों-रात राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित कर दिया।
राजेंद्र कृष्ण को फिल्मफेयर पुरस्कार कब और किस गीत के लिए मिला?
1965 में प्रदर्शित फिल्म 'खानदान' के गीत 'तुम्हीं मेरे मंदिर, तुम्हीं मेरी पूजा' के लिए उन्हें फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ गीतकार पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
राजेंद्र कृष्ण ने किन संगीतकारों के साथ काम किया?
उन्होंने सी. रामचंद्र, मदन मोहन और हेमंत कुमार जैसे दिग्गज संगीतकारों के साथ मिलकर काम किया। इसके अलावा हुस्नलाल-भगतराम के साथ भी उनकी उल्लेखनीय जोड़ी रही।
राजेंद्र कृष्ण का निधन कब हुआ?
राजेंद्र कृष्ण का निधन 23 सितंबर 1987 को हुआ। उनका जन्म 6 जून 1919 को हुआ था और उन्होंने लगभग चार दशकों तक हिंदी सिनेमा को अपनी कलम से समृद्ध किया।
राष्ट्र प्रेस
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