राजेंद्र कृष्ण जयंती: वो गीतकार जिसने 'बापू की अमर कहानी' से रातों-रात जीता करोड़ों का दिल
सारांश
मुख्य बातें
हिंदी सिनेमा के अमर गीतकार राजेंद्र कृष्ण दुग्गल की 6 जून 2025 को 106वीं जयंती है — एक ऐसे फनकार की, जिन्होंने अपनी कलम से हँसाया भी, रुलाया भी और देश के दर्द को शब्द भी दिए। जलालपुर जट्टान (अब पाकिस्तान) में जन्मे इस शायर ने मुंबई की फिल्मी दुनिया में जो मुकाम हासिल किया, वह आज भी हर पीढ़ी की प्लेलिस्ट में जीवित है।
शुरुआती जीवन और मुंबई तक का सफर
राजेंद्र कृष्ण का जन्म 6 जून 1919 को जलालपुर जट्टान के एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था। बचपन से ही कविता और शेरो-शायरी उनकी रगों में दौड़ती थी। पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने कुछ समय शिमला में सरकारी सेवा भी की, लेकिन कलम की पुकार उन्हें 1940 के दशक के मध्य में मुंबई खींच लाई। फिल्म जगत में पैर जमाना आसान न था, मगर उनकी लगन ने उन्हें जल्द ही पहचान दिलाई।
वो गीत जिसने रातों-रात बनाया मशहूर
1948 में महात्मा गांधी की हत्या के बाद पूरा देश शोक में डूबा था। राजेंद्र कृष्ण ने उस सामूहिक वेदना को शब्द दिए — 'सुनो सुनो ऐ दुनिया वालों, बापू की ये अमर कहानी'। मोहम्मद रफी की आवाज़ और हुस्नलाल-भगतराम के संगीत से सजे इस गैर-फिल्मी गीत ने हर हिंदुस्तानी की आँखें नम कर दीं। यह एक गीत उनकी पहचान बन गया और उन्हें देश के कोने-कोने में स्थापित कर दिया।
बहुमुखी प्रतिभा: रूमानी से चुलबुले तक
राजेंद्र कृष्ण की कलम की रेंज असाधारण थी। 'अलबेला' (1951) का 'शोला जो भड़के', 'पड़ोसन' (1968) का 'एक चतुर नार बड़ी होशियार' और 'ब्लैक मेल' (1973) का 'पल-पल दिल के पास' — ये सभी उन्हीं की कलम से निकले। उन्होंने सी. रामचंद्र, मदन मोहन और हेमंत कुमार जैसे दिग्गज संगीतकारों के साथ मिलकर दशकों तक सदाबहार गीतों की धारा बहाई।
पटकथा लेखन और फिल्मफेयर सम्मान
गीतकार के साथ-साथ राजेंद्र कृष्ण एक सिद्धहस्त पटकथा और संवाद लेखक भी थे। 'साधना', 'पड़ोसन' और 'बॉम्बे टू गोवा' जैसी फिल्मों की स्क्रिप्ट उनके दम पर जीवंत हुई। 'पड़ोसन' में महमूद और किशोर कुमार की कॉमिक टाइमिंग को अमर बनाने में उनके संवादों की निर्णायक भूमिका रही। 1965 में फिल्म 'खानदान' के गीत 'तुम्हीं मेरे मंदिर, तुम्हीं मेरी पूजा' के लिए उन्हें प्रतिष्ठित फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ गीतकार पुरस्कार से नवाज़ा गया।
विरासत जो आज भी गूँजती है
23 सितंबर 1987 को राजेंद्र कृष्ण ने इस दुनिया को अलविदा कहा, लेकिन उनके गीत आज भी हर पीढ़ी के दिल में और मोबाइल की प्लेलिस्ट में उतनी ही ताज़गी से बजते हैं। उनकी जयंती पर उनकी यह अमर विरासत याद दिलाती है कि सच्ची कला कभी पुरानी नहीं पड़ती।