राम मंदिर से समाज सेवा हो, नए सीईओ जितेंद्र मिश्रा से ईमानदारी की उम्मीद: अनिरुद्धाचार्य
सारांश
मुख्य बातें
कथावाचक अनिरुद्धाचार्य ने राम मंदिर के नवनियुक्त सीईओ जितेंद्र मिश्रा की नियुक्ति का स्वागत करते हुए कहा कि उनसे पूरी ईमानदारी और निष्ठा के साथ अपनी जिम्मेदारी निभाने की अपेक्षा है। मथुरा में शुक्रवार, 4 सितंबर को अपनी बात रखते हुए उन्होंने कहा कि ईश्वर से भी यही प्रार्थना है कि नए सीईओ अपने दायित्व को पूरी निष्पक्षता से निभाएं।
मंदिर का उद्देश्य: पूजा से परे समाज सेवा
अनिरुद्धाचार्य ने स्पष्ट किया कि सनातन धर्म की परंपरा में मंदिर केवल पूजा-अर्चना के स्थल नहीं रहे हैं। उनके अनुसार, मंदिरों की ऐतिहासिक भूमिका में गुरुकुलों का संचालन, वेदों का प्रचार-प्रसार, गौशालाओं का संरक्षण और सनातन संस्कृति को जीवंत रखना सदैव शामिल रहा है। उन्होंने कहा कि राम मंदिर जैसी विशाल संस्था के पास इन सभी कार्यों को व्यापक स्तर पर करने की क्षमता और संसाधन हैं।
गौरी गोपाल मंदिर का उदाहरण
अपनी बात को ठोस आधार देते हुए अनिरुद्धाचार्य ने अपने गौरी गोपाल मंदिर का उदाहरण प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि यह एक छोटा मंदिर है, फिर भी यहाँ से 175 बच्चे शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं, गौशाला में करीब 400 गायें और 150 से अधिक नंदी हैं। इसके अतिरिक्त, अखंड रसोई के माध्यम से प्रतिदिन हजारों लोगों को भोजन उपलब्ध कराया जाता है।
उन्होंने यह भी बताया कि मंदिर परिसर में कक्षा 1 से 12वीं तक का CBSE बोर्ड का एक विद्यालय निर्माणाधीन है, जिसमें बड़ी संख्या में बच्चों को निशुल्क शिक्षा देने की योजना है। उनका तर्क था कि यदि एक छोटा मंदिर इतना कर सकता है, तो राम मंदिर की क्षमता इससे कहीं अधिक है।
मंदिर के धन का सदुपयोग और सेना की मदद
अनिरुद्धाचार्य ने कहा कि राम मंदिर को मिलने वाले धन का उपयोग वेद प्रचार, गुरुकुल निर्माण, गौसेवा और राष्ट्रहित से जुड़े सामाजिक कार्यों में होना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि यदि मंदिर के संसाधनों से सेना को आर्थिक सहयोग दिया जाए या राष्ट्रहित में उसकी मदद की जाए, तो यह भी एक सराहनीय कदम हो सकता है। हालाँकि, उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि समय के साथ मंदिरों के उद्देश्यों में बदलाव आया है।
चंपत राय और ट्रस्ट में बदलाव पर प्रतिक्रिया
चंपत राय को ट्रस्ट से हटाए जाने और उनकी जगह गोविंद देव गिरी को नया महासचिव बनाए जाने पर अनिरुद्धाचार्य ने कहा कि वह उस बैठक में उपस्थित नहीं थे जिसमें यह निर्णय लिया गया। उनसे इस विषय में कोई राय नहीं माँगी गई थी। उन्होंने कहा कि यदि उनसे परामर्श लिया जाता, तो वह अवश्य बताते कि किसी को हटाने या रखने के पीछे क्या आधार होना चाहिए।
जन्माष्टमी और आरक्षण पर विचार
अनिरुद्धाचार्य ने जन्माष्टमी को भगवान श्रीकृष्ण के प्राकट्य का पवित्र उत्सव बताते हुए कहा कि इस दिन सुबह स्नान कर पूजा करनी चाहिए, शाम को अभिषेक करना चाहिए और कीर्तन व नाम-जप के साथ यह पर्व मनाना चाहिए। उन्होंने कहा कि त्योहार मनाने के तरीके बदल सकते हैं, लेकिन जन्माष्टमी का महत्व अपरिवर्तित है।
आरक्षण के प्रश्न पर उन्होंने कहा कि जिसे वास्तव में सहायता की आवश्यकता है, उसे मिलनी चाहिए। लेकिन जो व्यक्ति आर्थिक रूप से सक्षम हो चुका है और गरीबी रेखा से ऊपर आ गया है, उसका लाभ उन वास्तविक जरूरतमंदों तक पहुँचना चाहिए जो अभी भी वंचित हैं। यह टिप्पणी आरक्षण की समीक्षा पर चल रही व्यापक बहस के बीच आई है।