राम मंदिर दानपात्र घोटाला: जस्टिस सुधीर अग्रवाल बोले — हिंदुओं की आस्था पर गहरी चोट, कड़ी कार्रवाई ज़रूरी
सारांश
मुख्य बातें
नई दिल्ली — राम मंदिर के दानपात्र में कथित घपले के मामले में श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय और ट्रस्टी अनिल मिश्रा ने इस्तीफा दे दिया है। इस पर जस्टिस सुधीर अग्रवाल ने कहा कि यह उनका निजी फैसला है और वे इस पर कोई टिप्पणी करने की स्थिति में नहीं हैं। साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इस घटना ने करोड़ों हिंदुओं की आस्था पर गहरी और अपूरणीय चोट पहुँचाई है।
आस्था पर प्रहार
जस्टिस अग्रवाल ने शुक्रवार, 26 जून को बातचीत में कहा कि राम मंदिर न केवल हिंदुओं की आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह भारत की सांस्कृतिक पहचान का भी प्रतिनिधित्व करता है। उन्होंने कहा, 'जिस मंदिर में हिंदुओं ने दिल खोलकर दान किया, वहीं लूट-खसोट हुई — इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या हो सकता है।'
उनके अनुसार, यह केवल वित्तीय अनियमितता नहीं, बल्कि उन लाखों श्रद्धालुओं के विश्वास के साथ धोखा है जिन्होंने मंदिर निर्माण के लिए अपनी जमा-पूँजी से दान दिया था।
ऐतिहासिक संदर्भ से जोड़ा मामला
जस्टिस अग्रवाल ने इस प्रकरण को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में भी रखा। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार महमूद गज़नवी के हिंदू मंदिरों पर हमलों को आज तक माफ नहीं किया गया है, उसी प्रकार राम मंदिर दानपात्र घोटाले में संलिप्त आरोपियों को भी माफी नहीं मिलनी चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि वर्तमान कानून के अनुसार यह संज्ञेय अपराध की श्रेणी में आता है और इसमें कड़ी कार्रवाई अनिवार्य है।
ट्रस्ट की सीमाएँ और नई व्यवस्था की ज़रूरत
जस्टिस अग्रवाल ने यह भी रेखांकित किया कि मौजूदा तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का गठन मंदिर निर्माण के एकमात्र उद्देश्य से हुआ था, जो सफलतापूर्वक पूरा हो चुका है। अब मंदिर के दैनिक संचालन, चढ़ावे के प्रबंधन और भीड़ नियंत्रण जैसी ज़िम्मेदारियों के लिए यह ट्रस्ट सक्षम नहीं है।
उन्होंने सुझाव दिया कि इसके लिए एक अलग और विशेषज्ञ ट्रस्ट का गठन किया जाना चाहिए, जिसमें केवल उन्हीं लोगों को शामिल किया जाए जो मंदिर प्रशासन, वित्त प्रबंधन और तीर्थयात्री सेवाओं में पूरी तरह दक्ष हों।
चंपत राय और अनिल मिश्रा का इस्तीफा
इस घोटाले के बीच ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय और ट्रस्टी अनिल मिश्रा ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। जस्टिस अग्रवाल ने इसे उनका 'निजी निर्णय' बताते हुए इस पर आगे कोई टिप्पणी करने से परहेज किया। यह मामला अब न्यायिक और प्रशासनिक दोनों स्तरों पर जाँच का विषय बन चुका है।
आगे की राह
विशेषज्ञों का मानना है कि इस घटना के बाद देश भर के प्रमुख धार्मिक ट्रस्टों की वित्तीय पारदर्शिता और जवाबदेही पर नए सिरे से बहस छिड़ सकती है। यह देखना होगा कि सरकार और न्यायपालिका इस मामले में कितनी तत्परता से कार्रवाई करते हैं और क्या राम मंदिर के प्रशासन में सुधार के लिए कोई ठोस कदम उठाया जाता है।