राम मंदिर दानपात्र घोटाले पर अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन बोले — 'ऐसे आरोपों की कभी कल्पना नहीं थी'
सारांश
मुख्य बातें
अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने 26 जून 2026 को राम मंदिर के दानपात्र में कथित घपले के आरोपों पर गहरा दुख व्यक्त किया और कहा कि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए एक सुदृढ़ प्रशासनिक व्यवस्था खड़ी करनी होगी।
व्यक्तिगत पीड़ा और ट्रस्ट पर भरोसे का संकट
जैन ने कहा, 'मैंने जीवन में कभी नहीं सोचा था कि राम मंदिर ट्रस्ट पर इस तरह के आरोप लगेंगे।' उन्होंने याद दिलाया कि इस ट्रस्ट का गठन सर्वोच्च न्यायालय के दिशानिर्देशों पर हुआ था और इसमें कुशल एवं प्रशिक्षित लोगों को सम्मिलित किया गया था। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि वे स्वयं और उनके पिता इस आंदोलन का हिस्सा रहे हैं, इसलिए यह मामला उनके लिए व्यक्तिगत पीड़ा का विषय है।
इस्तीफों पर प्रतिक्रिया और एसआईटी जांच
दानपात्र घपले के बाद हुए इस्तीफों पर जैन ने कहा कि ये इस्तीफे नैतिक मूल्यों के आधार पर हुए हैं, किंतु इनसे जांच प्रक्रिया पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि एसआईटी (SIT) पूरे मामले की जांच कर रही है और हर पहलू की गहन पड़ताल की जा रही है। जांच पूरी होने के बाद आरोपपत्र अदालत में पेश किया जाएगा। जैन ने कहा कि वे चाहते हैं कि इस मामले की गंभीरता से जांच हो ताकि भविष्य में ऐसी घटनाएं न हों।
मंदिर प्रशासन में सुधार की मांग
जैन के अनुसार, उनकी यह माँग है कि मंदिर का नियंत्रण सरकारी दायरे के बाहर रहे। उन्होंने चिंता जताई कि इतने बुद्धिजीवियों को एक व्यवस्था में शामिल करने के बाद भी यदि इस तरह के मामले सामने आ रहे हैं, तो यह गंभीर आत्मचिंतन का विषय है। उन्होंने कहा कि एक नई, अधिक पारदर्शी और जवाबदेह व्यवस्था बनानी होगी।
विरोधियों पर सीधा निशाना
जैन ने आरोप लगाया कि जो लोग राम मंदिर के अस्तित्व पर सवाल उठाते रहे, जिन्होंने राम भक्तों पर गोली चलवाई और रामायण की चौपाइयों की गलत व्याख्या से लोगों को गुमराह किया, ऐसे लोग कभी नहीं चाहते कि स्थिति सामान्य हो। उन्होंने कहा कि इन लोगों को अब एक राजनीतिक मुद्दा मिल गया है।
कर्नाटक के मंदिरों का संदर्भ
जैन ने यह भी पूछा कि जो लोग अयोध्या के राम मंदिर दानपात्र घोटाले का मुद्दा उठा रहे हैं, वे कर्नाटक के मंदिरों में कथित कुप्रबंधन पर चुप क्यों हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे लोगों को सभी धार्मिक संस्थाओं के कुप्रबंधन पर समान रूप से बोलना चाहिए। आलोचकों का कहना है कि अयोध्या के राम मंदिर का जिक्र बार-बार इसलिए किया जा रहा है क्योंकि इससे राजनीतिक लाभ मिलता है। यह मामला आने वाले दिनों में धार्मिक ट्रस्टों की जवाबदेही और पारदर्शिता की बहस को और तेज कर सकता है।