राम मंदिर चढ़ावा विवाद: शिवसेना (यूबीटी) बोली — ट्रस्ट BJP ने बनाया, जवाब भी BJP दे
सारांश
मुख्य बातें
लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे द्वारा प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर राम मंदिर चढ़ावा मामले में जांच और जवाबदेही की मांग किए जाने को शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) ने पूरी तरह उचित करार दिया है। पार्टी प्रवक्ता आनंद दुबे ने 19 जुलाई को कहा कि श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का गठन सरकार के अधीन हुआ है, इसलिए चढ़ावे में कथित गड़बड़ी के आरोपों पर सरकार को ही पारदर्शी जवाब देना होगा।
शिवसेना (यूबीटी) का रुख
आनंद दुबे ने स्पष्ट किया कि उनकी पार्टी पहले ही इस मामले में सीबीआई जांच की मांग उठा चुकी है। उन्होंने कहा, 'सरकार से पूछे गए सवालों का जवाब विपक्ष नहीं देगा — सरकार को ही अपनी स्थिति पारदर्शिता के साथ स्पष्ट करनी चाहिए।' दुबे ने यह भी रेखांकित किया कि कुछ लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है और जांच जारी है, ऐसे में विपक्ष का दायित्व है कि वह सरकार से जवाबतलब करे।
दल-बदल मुद्दे पर भी निशाना
दुबे ने इसी बातचीत में दल-बदल के प्रश्न पर केंद्र सरकार और लोकसभा अध्यक्ष की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए। उनका आरोप है कि शिवसेना (यूबीटी) और तृणमूल कांग्रेस (TMC) के बागी सांसदों को संबंधित पक्ष की बात सुने बिना मान्यता दे दी गई। उन्होंने इसे 'कानूनी प्रक्रिया की आड़ में जनादेश की चोरी' बताते हुए कहा कि यह लोकतांत्रिक परंपराओं और लोकतंत्र की भावना के विरुद्ध है।
कांग्रेस सांसद का बयान
कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने भी इस मामले में सरकार को घेरा। उन्होंने कहा कि जनता के मन में सवाल उठ रहे हैं और सरकार को पूरे मामले को सार्वजनिक करना चाहिए। मसूद ने आरोप लगाया कि सरकार भगवान राम के नाम पर राजनीति करती है, लेकिन अब उसी नाम से जुड़े चंदे में कथित गड़बड़ी के आरोप सामने आ रहे हैं। उन्होंने कहा कि निष्पक्ष जांच और पारदर्शिता ही इस विवाद का एकमात्र समाधान है।
सरकार की चुप्पी पर सवाल
विपक्ष के कई नेताओं ने यह भी नोट किया कि सरकार अब तक इस विषय पर कोई स्पष्ट सार्वजनिक बयान देने से बचती रही है। आलोचकों का कहना है कि यह चुप्पी संदेह को और गहरा करती है। यह ऐसे समय में आया है जब राम मंदिर से जुड़े वित्तीय प्रबंधन को लेकर जनता में पहले से ही जिज्ञासा बनी हुई है।
आगे क्या
विपक्ष के दबाव और सीबीआई जांच की मांग के बीच अब सबकी निगाहें सरकार की आधिकारिक प्रतिक्रिया पर टिकी हैं। यदि सरकार ने शीघ्र स्पष्टीकरण नहीं दिया तो यह मुद्दा संसद के भीतर और बाहर दोनों जगह और तेज हो सकता है।