मोहन भागवत के न्यूयॉर्क दौरे पर संजय राउत बोले — लोकतंत्र में बोलने की आज़ादी ज़रूरी
सारांश
मुख्य बातें
शिवसेना (यूबीटी) सांसद संजय राउत ने 27 अगस्त को मुंबई में पत्रकारों से बातचीत में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के न्यूयॉर्क दौरे, मराठी भाषा विवाद और ऑटो-रिक्शा चालकों के मुद्दे पर अपनी राय रखी। राउत ने कहा कि लोकतंत्र में बात रखने की आज़ादी होनी चाहिए — चाहे वह अमेरिका हो या भारत।
भागवत के न्यूयॉर्क दौरे पर राउत की प्रतिक्रिया
राउत ने कहा, आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत को अमेरिका की ओर से न्यूयॉर्क जाने का आमंत्रण मिला है। उन्होंने कहा, 'भारत की तरह अमेरिका भी लोकतांत्रिक देश है। वहाँ बोलने की आज़ादी को मान्यता है, लेकिन हिंदुस्तान में इस पर टकराव देखने को मिल रहा है।' राउत ने यह भी जोड़ा कि युवाओं पर पैलेट गन चलाए जाने का मामला अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में है।
ऑटो-रिक्शा और भाषा विवाद पर राउत का तर्क
मराठी भाषा अनिवार्यता के मुद्दे पर राउत ने कहा कि यह भाषाओं के बीच का विवाद नहीं, बल्कि राज्यों की स्वायत्तता का सवाल है। उन्होंने तर्क दिया, 'उत्तर प्रदेश में ऑटो चलाने वाले को हिंदी आनी चाहिए, बंगाल में ऑटो चलाने वाले को बंगाली — यही सिद्धांत महाराष्ट्र पर भी लागू होता है।' उन्होंने आरोप लगाया कि महाराष्ट्र के परिवहन मंत्री दिल्ली से संदेश आने पर बार-बार अपने फ़ैसले से पीछे हट जाते हैं। गौरतलब है कि गृह मंत्री अमित शाह की पार्टी भारतीय जनता पार्टी (BJP) परिवहन मंत्रालय की साझेदार है और उत्तर प्रदेश में चुनाव आसन्न हैं।
शिवसेना नेता शाइना एनसी का बयान
शिवसेना नेता शाइना एनसी ने स्पष्ट किया कि मराठी स्वाभिमान और मराठी गौरव से कोई समझौता नहीं होगा। उन्होंने कहा कि यदि कोई सेवा प्रदाता है तो उसे यात्रियों से मराठी में संवाद करने में सक्षम होना चाहिए। शाइना एनसी ने यह भी बताया कि एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना ने 1.5 लाख टैक्सी चालकों को एक महीने तक मुफ़्त मराठी कक्षाएँ दीं और उन्हें प्रमाण-पत्र भी दिए।
BJP विधायक का पक्ष
BJP विधायक संजय उपाध्याय ने कहा कि ऑटो-रिक्शा चालक मुंबई की सड़कों पर कड़ी मेहनत से जीविका कमाते हैं। उन्होंने बताया कि जब सरकार ने मराठी का कामकाजी ज्ञान अनिवार्य किया, तब चालकों ने मराठी सीखी और परीक्षा उत्तीर्ण की — अब वे बिना किसी हिचकिचाहट के यात्रियों से संवाद कर सकते हैं। यह विवाद ऐसे समय में उभरा है जब महाराष्ट्र में भाषाई पहचान और प्रवासी श्रमिकों के अधिकारों को लेकर राजनीतिक तनाव बढ़ा हुआ है।
आगे क्या
मराठी भाषा अनिवार्यता का मुद्दा महाराष्ट्र की राजनीति में केंद्रीय बना हुआ है। विपक्षी दलों और सत्तारूढ़ गठबंधन के बीच इस पर बयानबाज़ी जारी रहने की संभावना है, विशेषकर जब राज्य और केंद्र दोनों स्तरों पर चुनावी माहौल गर्म है।