27 अगस्त 2026
LIVE
Get it on Google Play Download on the App Store

साहिबगंज की 'मेधा जलापूर्ति योजना' 14 साल बाद भी अधूरी, झारखंड हाईकोर्ट ने सरकार से माँगा जवाब

शेयर करें:
ऑडियो वॉइस लोड हो रही है…
साहिबगंज की 'मेधा जलापूर्ति योजना' 14 साल बाद भी अधूरी, झारखंड हाईकोर्ट ने सरकार से माँगा जवाब

सारांश

2012 में स्वीकृत 'मेधा जलापूर्ति योजना' 14 साल बाद भी साहिबगंज के ग्रामीणों तक नहीं पहुँची — जबकि भूजल में आर्सेनिक और फ्लोराइड की खतरनाक मात्रा बनी हुई है। झारखंड हाईकोर्ट ने अब सरकार से सख्त लहजे में जवाब माँगा है।

मुख्य बातें

झारखंड उच्च न्यायालय ने 27 अगस्त 2026 को मेधा पेय जलापूर्ति योजना पर राज्य सरकार से कड़ा जवाब माँगा।
योजना 2012 में स्वीकृत हुई थी, लेकिन 14 वर्षों बाद भी साहिबगंज के ग्रामीणों तक इसका लाभ नहीं पहुँचा।
झारखंड राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट के अनुसार भूजल में आर्सेनिक और फ्लोराइड की मात्रा खतरनाक स्तर पर है।
मुख्य न्यायाधीश एम.एस.
सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने पेयजल एवं स्वच्छता विभाग के प्रधान सचिव को जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया।
मामले की अगली सुनवाई 24 सितंबर को निर्धारित है।

झारखंड के साहिबगंज जिले के ग्रामीण इलाकों में शुद्ध पेयजल पहुँचाने के लिए वर्ष 2012 में स्वीकृत 'मेधा पेय जलापूर्ति योजना' आज भी ज़मीन पर नहीं उतर सकी है — और अब झारखंड उच्च न्यायालय ने इस मामले में राज्य सरकार से कड़े सवाल पूछे हैं। भूजल में आर्सेनिक और फ्लोराइड की खतरनाक मौजूदगी के बीच लाखों ग्रामीण प्रदूषित पानी पीने पर मजबूर हैं, जबकि उनकी सुरक्षा के लिए बनी योजना 14 वर्षों से लंबित है।

मुख्य घटनाक्रम

मुख्य न्यायाधीश एम.एस. सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने 27 अगस्त 2026 को एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए पेयजल एवं स्वच्छता विभाग के प्रधान सचिव को विस्तृत जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया। अदालत ने सरकार से यह स्पष्ट करने को कहा कि योजना की मौजूदा स्थिति क्या है और इसे कब तक लागू किया जाएगा। मामले की अगली सुनवाई 24 सितंबर को निर्धारित की गई है।

याचिका में क्या कहा गया

प्रार्थी सिद्धेश्वर मंडल की ओर से अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि साहिबगंज के ग्रामीण क्षेत्रों में स्वच्छ पेयजल की समस्या वर्षों से बनी हुई है। इसी समस्या के समाधान के लिए 2012 में मेधा पेय जलापूर्ति योजना को मंजूरी दी गई थी, जिसका उद्देश्य ग्रामीणों को सुरक्षित और शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराना था। हालाँकि, स्वीकृति के लगभग डेढ़ दशक बाद भी इस योजना का लाभ ग्रामीणों तक नहीं पहुँचा है।

याचिका में यह भी उजागर किया गया कि एक ओर ग्रामीण प्रदूषित भूजल पर निर्भर हैं, और दूसरी ओर उनकी सुरक्षा के लिए स्वीकृत योजना वर्षों से ठंडे बस्ते में पड़ी है। अदालत से माँग की गई कि सरकार योजना की प्रगति और क्रियान्वयन में आ रही बाधाओं का ब्यौरा सामने रखे।

भूजल प्रदूषण की गंभीर स्थिति

झारखंड राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की जाँच रिपोर्ट के अनुसार साहिबगंज के भूजल में आर्सेनिक और फ्लोराइड की मात्रा खतरनाक स्तर पर है। विशेषज्ञों के अनुसार इन तत्वों के लंबे समय तक सेवन से त्वचा रोग, हड्डियों की विकृति और कैंसर जैसी गंभीर बीमारियाँ हो सकती हैं। यह ऐसे समय में और भी चिंताजनक है जब राष्ट्रीय स्तर पर 'हर घर जल' अभियान के तहत स्वच्छ पेयजल की उपलब्धता को प्राथमिकता दी जा रही है।

आम जनता पर असर

गौरतलब है कि साहिबगंज झारखंड के उन जिलों में शामिल है जहाँ आदिवासी और ग्रामीण आबादी की बड़ी संख्या है, और ये समुदाय पेयजल के लिए मुख्यतः भूजल पर निर्भर हैं। प्रदूषित पानी के दीर्घकालिक सेवन से इन समुदायों में स्वास्थ्य संकट गहराता जा रहा है। योजना के लागू न होने से सबसे अधिक प्रभावित वे परिवार हैं जिनके पास वैकल्पिक जल स्रोत खरीदने की आर्थिक क्षमता नहीं है।

क्या होगा आगे

उच्च न्यायालय ने प्रधान सचिव से केवल स्थिति रिपोर्ट नहीं, बल्कि योजना की स्पष्ट कार्ययोजना और समय-सीमा भी माँगी है। 24 सितंबर की अगली सुनवाई में सरकार का जवाब यह तय करेगा कि अदालत आगे कितना कड़ा रुख अपनाती है। यदि सरकार संतोषजनक उत्तर नहीं दे पाई, तो न्यायालय द्वारा और सख्त निर्देश जारी किए जाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि एक सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट की अनदेखी है — जब भूजल में आर्सेनिक और फ्लोराइड की पुष्टि हो चुकी हो। यह ऐसे समय में और भी विरोधाभासी है जब केंद्र सरकार 'हर घर जल' के तहत शत-प्रतिशत कवरेज का दावा करती है। झारखंड में यह पहला मामला नहीं है जहाँ ग्रामीण जल योजनाएँ कागज़ों पर ही रह गई हों — असली सवाल यह है कि क्रियान्वयन में बाधा तकनीकी है, वित्तीय है, या केवल राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी। हाईकोर्ट का हस्तक्षेप ज़रूरी था, लेकिन यह भी एक संकेत है कि जवाबदेही के लिए न्यायपालिका का दरवाज़ा खटखटाना पड़ रहा है।
RashtraPress
27 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मेधा पेय जलापूर्ति योजना क्या है और इसे क्यों मंजूरी दी गई थी?
मेधा पेय जलापूर्ति योजना झारखंड के साहिबगंज जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने के लिए वर्ष 2012 में राज्य सरकार द्वारा स्वीकृत की गई थी। इसका उद्देश्य आर्सेनिक और फ्लोराइड से प्रदूषित भूजल पर निर्भर ग्रामीणों को सुरक्षित पानी देना था।
झारखंड हाईकोर्ट ने इस मामले में क्या निर्देश दिए हैं?
मुख्य न्यायाधीश एम.एस. सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने 27 अगस्त 2026 को पेयजल एवं स्वच्छता विभाग के प्रधान सचिव को योजना की वर्तमान स्थिति, क्रियान्वयन में आ रही बाधाओं और आगे की कार्ययोजना सहित विस्तृत जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया। अगली सुनवाई 24 सितंबर को होगी।
साहिबगंज के भूजल में प्रदूषण कितना गंभीर है?
झारखंड राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की जाँच रिपोर्ट के अनुसार साहिबगंज के भूजल में आर्सेनिक और फ्लोराइड खतरनाक स्तर पर मौजूद हैं। इन तत्वों के दीर्घकालिक सेवन से त्वचा रोग, हड्डियों की विकृति और कैंसर जैसी गंभीर बीमारियाँ हो सकती हैं।
यह जनहित याचिका किसने दायर की और इसमें क्या माँग की गई?
यह जनहित याचिका प्रार्थी सिद्धेश्वर मंडल की ओर से दायर की गई है। याचिका में माँग की गई है कि सरकार योजना की प्रगति, क्रियान्वयन में आ रही बाधाओं और इसे लागू करने की स्पष्ट समय-सीमा अदालत के समक्ष रखे।
इस मामले में अगली कार्रवाई कब होगी?
झारखंड उच्च न्यायालय ने मामले की अगली सुनवाई 24 सितंबर को निर्धारित की है। उस तारीख तक पेयजल एवं स्वच्छता विभाग के प्रधान सचिव को अपना जवाब और कार्ययोजना अदालत में प्रस्तुत करनी होगी।
राष्ट्र प्रेस
सिलसिला

जुड़े बिंदु

इस ख़बर के पीछे की कड़ियाँ — सबसे नई पहले।

8 बिंदु
  1. नवीनतम 2 सप्ताह पहले
  2. 1 महीना पहले
  3. 2 महीने पहले
  4. 2 महीने पहले
  5. 5 महीने पहले
  6. 5 महीने पहले
  7. 7 महीने पहले
  8. 9 महीने पहले