साहिबगंज की 'मेधा जलापूर्ति योजना' 14 साल बाद भी अधूरी, झारखंड हाईकोर्ट ने सरकार से माँगा जवाब
सारांश
मुख्य बातें
झारखंड के साहिबगंज जिले के ग्रामीण इलाकों में शुद्ध पेयजल पहुँचाने के लिए वर्ष 2012 में स्वीकृत 'मेधा पेय जलापूर्ति योजना' आज भी ज़मीन पर नहीं उतर सकी है — और अब झारखंड उच्च न्यायालय ने इस मामले में राज्य सरकार से कड़े सवाल पूछे हैं। भूजल में आर्सेनिक और फ्लोराइड की खतरनाक मौजूदगी के बीच लाखों ग्रामीण प्रदूषित पानी पीने पर मजबूर हैं, जबकि उनकी सुरक्षा के लिए बनी योजना 14 वर्षों से लंबित है।
मुख्य घटनाक्रम
मुख्य न्यायाधीश एम.एस. सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने 27 अगस्त 2026 को एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए पेयजल एवं स्वच्छता विभाग के प्रधान सचिव को विस्तृत जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया। अदालत ने सरकार से यह स्पष्ट करने को कहा कि योजना की मौजूदा स्थिति क्या है और इसे कब तक लागू किया जाएगा। मामले की अगली सुनवाई 24 सितंबर को निर्धारित की गई है।
याचिका में क्या कहा गया
प्रार्थी सिद्धेश्वर मंडल की ओर से अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि साहिबगंज के ग्रामीण क्षेत्रों में स्वच्छ पेयजल की समस्या वर्षों से बनी हुई है। इसी समस्या के समाधान के लिए 2012 में मेधा पेय जलापूर्ति योजना को मंजूरी दी गई थी, जिसका उद्देश्य ग्रामीणों को सुरक्षित और शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराना था। हालाँकि, स्वीकृति के लगभग डेढ़ दशक बाद भी इस योजना का लाभ ग्रामीणों तक नहीं पहुँचा है।
याचिका में यह भी उजागर किया गया कि एक ओर ग्रामीण प्रदूषित भूजल पर निर्भर हैं, और दूसरी ओर उनकी सुरक्षा के लिए स्वीकृत योजना वर्षों से ठंडे बस्ते में पड़ी है। अदालत से माँग की गई कि सरकार योजना की प्रगति और क्रियान्वयन में आ रही बाधाओं का ब्यौरा सामने रखे।
भूजल प्रदूषण की गंभीर स्थिति
झारखंड राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की जाँच रिपोर्ट के अनुसार साहिबगंज के भूजल में आर्सेनिक और फ्लोराइड की मात्रा खतरनाक स्तर पर है। विशेषज्ञों के अनुसार इन तत्वों के लंबे समय तक सेवन से त्वचा रोग, हड्डियों की विकृति और कैंसर जैसी गंभीर बीमारियाँ हो सकती हैं। यह ऐसे समय में और भी चिंताजनक है जब राष्ट्रीय स्तर पर 'हर घर जल' अभियान के तहत स्वच्छ पेयजल की उपलब्धता को प्राथमिकता दी जा रही है।
आम जनता पर असर
गौरतलब है कि साहिबगंज झारखंड के उन जिलों में शामिल है जहाँ आदिवासी और ग्रामीण आबादी की बड़ी संख्या है, और ये समुदाय पेयजल के लिए मुख्यतः भूजल पर निर्भर हैं। प्रदूषित पानी के दीर्घकालिक सेवन से इन समुदायों में स्वास्थ्य संकट गहराता जा रहा है। योजना के लागू न होने से सबसे अधिक प्रभावित वे परिवार हैं जिनके पास वैकल्पिक जल स्रोत खरीदने की आर्थिक क्षमता नहीं है।
क्या होगा आगे
उच्च न्यायालय ने प्रधान सचिव से केवल स्थिति रिपोर्ट नहीं, बल्कि योजना की स्पष्ट कार्ययोजना और समय-सीमा भी माँगी है। 24 सितंबर की अगली सुनवाई में सरकार का जवाब यह तय करेगा कि अदालत आगे कितना कड़ा रुख अपनाती है। यदि सरकार संतोषजनक उत्तर नहीं दे पाई, तो न्यायालय द्वारा और सख्त निर्देश जारी किए जाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।