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सारनाथ बना भारत का 45वाँ विश्व धरोहर स्थल, शेखावत बोले — वाराणसी और देश के लिए ऐतिहासिक गर्व

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सारनाथ बना भारत का 45वाँ विश्व धरोहर स्थल, शेखावत बोले — वाराणसी और देश के लिए ऐतिहासिक गर्व

सारांश

27 साल के इंतज़ार के बाद सारनाथ को यूनेस्को की मुहर मिली — भारत का 45वाँ विश्व धरोहर स्थल। बुसान में हुई 48वीं विश्व धरोहर समिति की बैठक में यह फैसला हुआ। बौद्ध धर्म के उद्गम स्थल की यह मान्यता वाराणसी के पर्यटन और भारत की सांस्कृतिक कूटनीति दोनों के लिए बड़ा अवसर है।

मुख्य बातें

यूनेस्को ने 25 जुलाई को सारनाथ को भारत का 45वाँ विश्व धरोहर स्थल घोषित किया।
दक्षिण कोरिया के बुसान में यूनेस्को विश्व धरोहर समिति की 48वीं बैठक में यह मान्यता दी गई।
सारनाथ 1998 से यूनेस्को की संभावित (टेंटेटिव) सूची में था — 27 वर्षों बाद अंतिम मान्यता मिली।
केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने इसे देश और वाराणसी के लिए गर्व का ऐतिहासिक क्षण बताया।
धरोहर परिसर में धमेख स्तूप , चौखंडी स्तूप , अशोक स्तंभ और मूलगंधकुटी विहार शामिल हैं।
विश्व धरोहर दर्जे से वाराणसी में अंतरराष्ट्रीय पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था को बड़ा प्रोत्साहन मिलने की उम्मीद।

बौद्ध धर्म की पवित्र नगरी सारनाथ को यूनेस्को (संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन) ने 25 जुलाई को भारत का 45वाँ विश्व धरोहर स्थल घोषित किया। दक्षिण कोरिया के बुसान में आयोजित यूनेस्को विश्व धरोहर समिति की 48वीं बैठक में यह मान्यता प्रदान की गई। इस ऐतिहासिक अवसर पर केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने इसे देश और वाराणसी वासियों के लिए अत्यंत गर्व का क्षण बताया।

मंत्री शेखावत की प्रतिक्रिया

केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने मंगलवार, 4 अगस्त को कहा, 'यह पल हम सबके लिए, देश के लिए, खासकर वाराणसी वासियों के लिए बहुत गर्व और सौभाग्य की बात है।' उन्होंने यह भी कहा कि प्रधानमंत्री के मार्गदर्शन और नेतृत्व में सारनाथ की इस पुरातात्विक और धार्मिक धरोहर को यूनेस्को की सूची में स्थान मिला है।

शेखावत ने बताया कि सारनाथ को 1998 में ही यूनेस्को की संभावित सूची (टेंटेटिव लिस्ट) में सम्मिलित किया गया था। लगभग 27 वर्षों के इंतज़ार के बाद अब इसे अंतिम और आधिकारिक मान्यता प्राप्त हुई है।

सारनाथ का ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व

सारनाथ वह पवित्र स्थान है जहाँ भगवान गौतम बुद्ध ने ज्ञान प्राप्ति के पश्चात अपना प्रथम उपदेश दिया था — इसे 'धर्मचक्र प्रवर्तन' कहा जाता है। बौद्ध धर्म के उद्गम स्थल के रूप में इसकी वैश्विक महत्ता असाधारण है।

इस धरोहर स्थल में चौखंडी स्तूप — जहाँ बुद्ध अपने प्रथम शिष्यों से मिले थे — के अतिरिक्त धमेख स्तूप, धर्मराजिका स्तूप, मूलगंधकुटी विहार और अशोक स्तंभ जैसे अमूल्य पुरातात्विक अवशेष शामिल हैं। यह समूचा परिसर भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत का जीवंत प्रमाण है।

पर्यटन और अर्थव्यवस्था पर असर

विश्व धरोहर का दर्जा मिलने के बाद वाराणसी में पर्यटकों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि की संभावना जताई जा रही है। मंत्री शेखावत के अनुसार इससे न केवल वाराणसी की स्थानीय अर्थव्यवस्था को लाभ होगा, बल्कि वैश्विक मंच पर भारत की सांस्कृतिक पहचान और सुदृढ़ होगी।

यह ऐसे समय में आया है जब उत्तर प्रदेश सरकार काशी-अयोध्या-मथुरा धार्मिक पर्यटन गलियारे को सक्रिय रूप से विकसित कर रही है। सारनाथ का यूनेस्को दर्जा इस पूरे क्षेत्र को अंतरराष्ट्रीय पर्यटन मानचित्र पर और प्रमुखता से स्थापित करेगा।

स्थानीय जनता और बौद्ध समुदाय में उत्साह

सारनाथ के विश्व धरोहर स्थल बनने की घोषणा के बाद स्थानीय निवासियों और दुनियाभर के बौद्ध अनुयायियों में विशेष उत्साह देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि अब जापान, थाईलैंड, श्रीलंका, म्यांमार सहित अनेक बौद्ध-बहुल देशों से तीर्थयात्रियों और पर्यटकों का आगमन बढ़ेगा।

गौरतलब है कि भारत में अब कुल 45 यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल हो गए हैं, जो देश को वैश्विक सांस्कृतिक धरोहर के मानचित्र पर और ऊँचाई पर ले जाता है। सारनाथ की यह उपलब्धि आने वाली पीढ़ियों के लिए इस अमूल्य विरासत के संरक्षण की दिशा में एक निर्णायक कदम है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली परीक्षा अब शुरू होती है — संरक्षण बनाम व्यावसायीकरण का संतुलन। ताजमहल और अजंता-एलोरा जैसे स्थलों पर अत्यधिक पर्यटन दबाव के अनुभव बताते हैं कि यूनेस्को की मान्यता अकेले पर्याप्त नहीं है; उसके साथ सुदृढ़ प्रबंधन योजना और सामुदायिक भागीदारी अनिवार्य है। 1998 से टेंटेटिव सूची में होने के बावजूद 27 वर्षों तक अंतिम नामांकन में देरी यह भी रेखांकित करती है कि प्रशासनिक प्राथमिकताएँ कब और कैसे बदलती हैं। अब देखना यह होगा कि सरकार धमेख स्तूप परिसर के संरक्षण और स्थानीय आजीविका के बीच टिकाऊ ढाँचा कितनी तेज़ी से खड़ा करती है।
RashtraPress
4 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सारनाथ को यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल का दर्जा कब और कहाँ मिला?
सारनाथ को 25 जुलाई को यूनेस्को विश्व धरोहर का दर्जा मिला, जब दक्षिण कोरिया के बुसान में यूनेस्को विश्व धरोहर समिति की 48वीं बैठक आयोजित हुई। इसके साथ भारत में यूनेस्को विश्व धरोहर स्थलों की कुल संख्या 45 हो गई।
सारनाथ बौद्ध धर्म के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?
सारनाथ वह स्थान है जहाँ भगवान गौतम बुद्ध ने ज्ञान प्राप्ति के बाद अपना पहला उपदेश दिया था, जिसे 'धर्मचक्र प्रवर्तन' कहते हैं। बौद्ध धर्म की उत्पत्ति इसी स्थान से मानी जाती है, इसलिए यह विश्वभर के बौद्ध अनुयायियों के लिए अत्यंत पवित्र तीर्थस्थल है।
सारनाथ के विश्व धरोहर परिसर में कौन-से प्रमुख स्मारक शामिल हैं?
सारनाथ के धरोहर परिसर में धमेख स्तूप, चौखंडी स्तूप, धर्मराजिका स्तूप, मूलगंधकुटी विहार और ऐतिहासिक अशोक स्तंभ शामिल हैं। चौखंडी स्तूप वह स्थान है जहाँ बुद्ध अपने प्रथम पाँच शिष्यों से मिले थे।
सारनाथ को यूनेस्को की सूची में आने में इतना समय क्यों लगा?
सारनाथ को 1998 में ही यूनेस्को की टेंटेटिव (संभावित) सूची में शामिल किया गया था, लेकिन अंतिम नामांकन और मान्यता में 27 वर्ष लग गए। केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत के अनुसार, प्रधानमंत्री के नेतृत्व में इस प्रक्रिया को अंततः पूरा किया गया।
सारनाथ के विश्व धरोहर बनने से वाराणसी को क्या फायदा होगा?
यूनेस्को की मान्यता से वाराणसी में अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों और बौद्ध तीर्थयात्रियों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि की उम्मीद है। इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था, रोज़गार और भारत की वैश्विक सांस्कृतिक पहचान को मज़बूती मिलेगी।
राष्ट्र प्रेस
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