सुप्रीम कोर्ट का आदेश: हाथी 'रमन' की अभिरक्षा केरल सरकार को, केयरटेकर कृष्णनकुट्टी अवमानना के दोषी
सारांश
मुख्य बातें
सर्वोच्च न्यायालय ने 10 जून 2026 को बंदी हाथी 'रमन' के केयरटेकर कृष्णनकुट्टी को अदालत की अवमानना का दोषी ठहराते हुए केरल सरकार को निर्देश दिया कि वह हाथी की अस्थायी अभिरक्षा तत्काल अपने हाथ में ले और उसे किसी उपयुक्त रेस्क्यू या पुनर्वास केंद्र में रखे। अदालत ने कृष्णनकुट्टी पर ₹2,000 का जुर्माना भी लगाया है।
मुख्य घटनाक्रम
न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति एस.सी. शर्मा की पीठ ने पाया कि कृष्णनकुट्टी ने अगस्त 2025 में सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष दिए गए उस आश्वासन का जानबूझकर उल्लंघन किया, जिसमें स्पष्ट रूप से कहा गया था कि स्वामित्व विवाद के अंतिम निर्णय तक हाथी 'रमन' का उपयोग किसी भी व्यावसायिक या मंदिर-संबंधी गतिविधि में नहीं किया जाएगा।
याचिकाकर्ता जयकृष्ण मेनन का दावा है कि 'रमन' माता अमृतानंदमयी मठ का हाथी है और उसे केवल देखभाल के लिए अस्थायी रूप से कृष्णनकुट्टी को सौंपा गया था। याचिका में आरोप लगाया गया था कि अदालती आदेश के बावजूद 'रमन' को मंदिर उत्सवों, धार्मिक जुलूसों और व्यावसायिक आयोजनों में इस्तेमाल किया गया।
साक्ष्य और स्वीकारोक्ति
अदालत के समक्ष तस्वीरें, पोस्टर, सोशल मीडिया पोस्ट और प्रचार सामग्री प्रस्तुत की गई। केरल सरकार की रिपोर्ट में सामने आया कि 3 फरवरी 2026 को 'रमन' को चावक्काड स्थित एक मंदिर उत्सव में ले जाया गया था, जहाँ बाद में उसका पशु चिकित्सा परीक्षण भी किया गया।
कृष्णनकुट्टी ने आरोपों से इनकार किया, परंतु अपने लिखित बयान में स्वीकार किया कि एक अवसर पर दूसरे हाथी की अनुपस्थिति के कारण 'रमन' को मंदिर समारोह में ले जाया गया था और 'मस्त' अवधि समाप्त होने के बाद उसने एक मंदिर अनुष्ठान में भाग लिया था। उन्होंने अदालत से बिना शर्त माफी भी माँगी।
अदालत की टिप्पणी
पीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि केरल के सबसे ऊँचे हाथियों में गिने जाने वाले 'रमन' का इस प्रकार व्यावसायिक उपयोग किया जाना दुर्भाग्यपूर्ण है। पीठ ने कहा, "यदि हम ऐसे उल्लंघन पर आँखें मूँद लें तो यह मूक जीवों के प्रति अपने कर्तव्य से विमुख होना होगा। विशेषकर उन जानवरों के मामले में, जिनकी भलाई भी सर्वोपरि है।"
सरकार और अधिकारियों पर निर्णय
अदालत ने राज्य सरकार के अधिकारियों को अवमानना मामले से मुक्त कर दिया, यह कहते हुए कि उनकी ओर से आदेश की जानबूझकर अवहेलना का कोई प्रमाण नहीं मिला। हालाँकि, केरल सरकार को निर्देशित किया गया है कि वह वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के प्रावधानों के तहत 'रमन' की देखभाल अपने खर्च पर करे।
आगे क्या होगा
अदालत ने स्पष्ट किया कि केरल सरकार द्वारा 'रमन' की अभिरक्षा अस्थायी है और स्वामित्व विवाद के अंतिम निर्णय के अधीन रहेगी। गौरतलब है कि यह मामला बंदी हाथियों के अधिकार और उनके व्यावसायिक दोहन पर देशभर में बढ़ती न्यायिक सक्रियता के व्यापक संदर्भ में आया है।