6 नवंबर 2026
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सोमनाथ मंदिर के पास मांसाहार प्रतिबंध: सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप से इनकार किया, हाईकोर्ट को 2 माह में फैसले का निर्देश

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सोमनाथ मंदिर के पास मांसाहार प्रतिबंध: सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप से इनकार किया, हाईकोर्ट को 2 माह में फैसले का निर्देश

सारांश

सर्वोच्च न्यायालय ने सोमनाथ मंदिर के पास मांसाहार प्रतिबंध में हस्तक्षेप से इनकार कर गुजरात हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश को बरकरार रखा। पीठ ने 'बीच का रास्ता' अपनाने की जरूरत का संकेत देते हुए हाईकोर्ट को दो महीने में अपील का निपटारा करने को कहा — छह प्रभावित रेस्तरां और राज्य सरकार के बीच यह कानूनी जंग अब 25 नवंबर की सुनवाई तक जारी रहेगी।

मुख्य बातें

सर्वोच्च न्यायालय ने 6 नवंबर 2026 को गुजरात हाईकोर्ट के उस अंतरिम आदेश में हस्तक्षेप से इनकार किया, जो सोमनाथ मंदिर के आसपास मांसाहार प्रतिबंध को बहाल रखता है।
पीठ ने गुजरात हाईकोर्ट से लंबित अपील का दो महीने के भीतर निपटारा करने का प्रयास करने का अनुरोध किया।
प्रतिबंध गिर सोमनाथ के जिला मजिस्ट्रेट जे.एन.
वाघेला द्वारा 10 अगस्त 2026 को गुजरात पुलिस अधिनियम, 1951 की धारा 33(1)(डब्ल्यू) के तहत जारी किया गया था।
ताज रेस्तरां, जे.एम.
रेस्तरां, होटल न्यू गुलबानी, किस्मत रेस्तरां, गुलाबी रेस्तरां और ख्वाजा हिंदुस्तानी रेस्तरां सहित छह प्रतिष्ठान इस विवाद में पक्षकार हैं।
मामले की अगली सुनवाई गुजरात हाईकोर्ट में 25 नवंबर 2026 को निर्धारित है।

सर्वोच्च न्यायालय ने 6 नवंबर 2026 को गुजरात हाईकोर्ट के उस अंतरिम आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया, जिसके तहत सोमनाथ मंदिर के आसपास के निर्धारित क्षेत्रों में मांस और मांसाहारी खाद्य पदार्थों की बिक्री, पाक-कला और भंडारण पर रोक जारी है। शीर्ष अदालत ने साथ ही हाईकोर्ट से इस मामले में लंबित अपील का दो महीने के भीतर निपटारा करने का प्रयास करने का अनुरोध किया।

मुख्य घटनाक्रम

न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने छह खानपान प्रतिष्ठानों द्वारा दायर विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) पर सुनवाई की। इन प्रतिष्ठानों ने गुजरात हाईकोर्ट के 30 अक्टूबर 2026 के अंतरिम आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें प्रतिबंध को बहाल रखा गया था। पीठ ने हाईकोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप से इनकार करते हुए मौखिक टिप्पणी में कहा, 'संभवतः अधिकारियों को बीच का रास्ता अपनाने की जरूरत है, न इधर और न उधर। हम इस पर कुछ नहीं कहना चाहते।'

प्रतिबंध की पृष्ठभूमि

यह विवाद गिर सोमनाथ के जिला मजिस्ट्रेट जे.एन. वाघेला द्वारा 10 अगस्त 2026 को जारी अधिसूचना से उपजा है। गुजरात पुलिस अधिनियम, 1951 की धारा 33(1)(डब्ल्यू) के तहत जारी इस अधिसूचना में सोमनाथ मंदिर के 500 मीटर के दायरे और सात निर्धारित मार्गों पर मांस, मछली तथा अन्य मांसाहारी व्यंजनों की बिक्री, पाक-कला व भंडारण पर रोक लगाई गई थी। गौरतलब है कि इससे पहले 10 जुलाई 2026 को प्रारंभिक अधिसूचना जारी कर जनता से 30 दिनों के भीतर आपत्तियाँ मांगी गई थीं।

प्रतिबंधित मार्गों में बालका मंदिर से भिड़िया सर्कल, भिड़िया सर्कल से शंख सर्कल, शंख सर्कल से सफारी सर्कल और सफारी सर्कल से प्रजापति धर्मशाला तक के इलाके शामिल हैं।

सरकार और रेस्तरां संचालकों की दलीलें

गुजरात सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने प्रतिबंध का बचाव करते हुए स्पष्ट किया कि निर्धारित क्षेत्रों के बाहर मांसाहारी भोजन परोसने पर कोई रोक नहीं है। राज्य के महाधिवक्ता कमल त्रिवेदी ने तर्क दिया था कि दिवाली और गुजराती नववर्ष के दौरान श्रद्धालुओं की भारी उपस्थिति को देखते हुए यह प्रतिबंध आवश्यक है और मांसाहारी भोजन की अनुमति देने से धार्मिक भावनाएँ आहत होने के साथ-साथ सार्वजनिक सुरक्षा के खतरे भी उत्पन्न हो सकते हैं।

दूसरी ओर, ताज रेस्तरां, जे.एम. रेस्तरां, होटल न्यू गुलबानी, किस्मत रेस्तरां, गुलाबी रेस्तरां और ख्वाजा हिंदुस्तानी रेस्तरां के संचालकों ने दलील दी कि गुजरात पुलिस अधिनियम की धारा 33(1)(डब्ल्यू) अधिकारियों को इस प्रकार का प्रतिबंध लगाने का अधिकार नहीं देती, क्योंकि यह प्रावधान सार्वजनिक मनोरंजन, आमोद-प्रमोद या सभा स्थलों के नियमन से संबंधित है।

हाईकोर्ट की भूमिका और आगे की सुनवाई

30 अक्टूबर 2026 को गुजरात हाईकोर्ट के एकल न्यायाधीश ने रेस्तरां संचालकों की याचिका स्वीकार करते हुए प्रतिबंध अधिसूचना रद्द कर दी थी। किंतु राज्य सरकार ने उसी दिन कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश मनाश रंजन पाठक और न्यायमूर्ति निरजार एस. देसाई की खंडपीठ के समक्ष अपील दायर की। खंडपीठ ने एकल न्यायाधीश के आदेश पर रोक लगाते हुए अगले आदेश तक प्रतिबंध बहाल रखा। गुजरात हाईकोर्ट ने इस मामले में राज्य सरकार की अपील पर नोटिस जारी किया है और अगली सुनवाई 25 नवंबर 2026 को निर्धारित है, जिसमें रेस्तरां संचालकों की एक अन्य लंबित याचिका पर भी विचार होगा।

क्या होगा आगे

सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश के बाद अब सभी की निगाहें गुजरात हाईकोर्ट पर टिकी हैं, जिसे दो महीनों के भीतर मुख्य अपील का निपटारा करना होगा। यह मामला धार्मिक संवेदनशीलता, आजीविका के अधिकार और पुलिस अधिनियम के तहत प्रशासनिक शक्तियों की सीमाओं से जुड़े व्यापक संवैधानिक प्रश्नों को भी उठाता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

जो मूलतः आमोद-प्रमोद स्थलों के नियमन के लिए बनी थी, खाद्य प्रतिबंध लगाने का वैध आधार बन सकती है — यह संवैधानिक प्रश्न गुजरात हाईकोर्ट के सामने अभी भी अनुत्तरित है। इस मामले का निर्णय केवल सोमनाथ तक सीमित नहीं रहेगा — यह देश भर के धार्मिक नगरों में इस प्रकार के खाद्य प्रतिबंधों के लिए नज़ीर बन सकता है।
RashtraPress
6 नवंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सोमनाथ मंदिर के पास मांसाहार प्रतिबंध क्या है?
गिर सोमनाथ के जिला मजिस्ट्रेट जे.एन. वाघेला ने 10 अगस्त 2026 को गुजरात पुलिस अधिनियम, 1951 की धारा 33(1)(डब्ल्यू) के तहत सोमनाथ मंदिर के 500 मीटर के दायरे और सात निर्धारित मार्गों पर मांस, मछली व अन्य मांसाहारी व्यंजनों की बिक्री, पाक-कला और भंडारण पर प्रतिबंध लगाया था। निर्धारित क्षेत्रों के बाहर मांसाहारी भोजन परोसने पर कोई रोक नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में क्या आदेश दिया?
न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने 6 नवंबर 2026 को गुजरात हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश — जो प्रतिबंध को बहाल रखता है — में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। साथ ही हाईकोर्ट से दो महीने के भीतर लंबित अपील का निपटारा करने का प्रयास करने का अनुरोध किया।
इस विवाद में गुजरात हाईकोर्ट की क्या भूमिका रही?
30 अक्टूबर 2026 को हाईकोर्ट के एकल न्यायाधीश ने प्रतिबंध अधिसूचना रद्द कर दी थी, लेकिन उसी दिन राज्य सरकार की अपील पर कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश मनाश रंजन पाठक और न्यायमूर्ति निरजार एस. देसाई की खंडपीठ ने एकल न्यायाधीश के आदेश पर रोक लगाते हुए प्रतिबंध को अगले आदेश तक बहाल रखा। अगली सुनवाई 25 नवंबर 2026 को होगी।
प्रतिबंध को किन रेस्तरां संचालकों ने चुनौती दी और उनकी दलील क्या है?
ताज रेस्तरां, जे.एम. रेस्तरां, होटल न्यू गुलबानी, किस्मत रेस्तरां, गुलाबी रेस्तरां और ख्वाजा हिंदुस्तानी रेस्तरां के संचालकों ने चुनौती दी है। उनकी दलील है कि गुजरात पुलिस अधिनियम की धारा 33(1)(डब्ल्यू) खाद्य प्रतिबंध लगाने का अधिकार नहीं देती, क्योंकि यह प्रावधान सार्वजनिक मनोरंजन और सभा स्थलों के नियमन से संबंधित है।
इस मामले में आगे क्या होगा?
गुजरात हाईकोर्ट में इस मामले की अगली सुनवाई 25 नवंबर 2026 को निर्धारित है, जिसमें रेस्तरां संचालकों की एक अन्य लंबित याचिका पर भी विचार होगा। सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश के अनुसार हाईकोर्ट को दो महीने के भीतर अपील का निपटारा करने का प्रयास करना है।
राष्ट्र प्रेस
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