सोमनाथ मंदिर के पास मांसाहार प्रतिबंध: सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप से इनकार किया, हाईकोर्ट को 2 माह में फैसले का निर्देश
सारांश
मुख्य बातें
सर्वोच्च न्यायालय ने 6 नवंबर 2026 को गुजरात हाईकोर्ट के उस अंतरिम आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया, जिसके तहत सोमनाथ मंदिर के आसपास के निर्धारित क्षेत्रों में मांस और मांसाहारी खाद्य पदार्थों की बिक्री, पाक-कला और भंडारण पर रोक जारी है। शीर्ष अदालत ने साथ ही हाईकोर्ट से इस मामले में लंबित अपील का दो महीने के भीतर निपटारा करने का प्रयास करने का अनुरोध किया।
मुख्य घटनाक्रम
न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने छह खानपान प्रतिष्ठानों द्वारा दायर विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) पर सुनवाई की। इन प्रतिष्ठानों ने गुजरात हाईकोर्ट के 30 अक्टूबर 2026 के अंतरिम आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें प्रतिबंध को बहाल रखा गया था। पीठ ने हाईकोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप से इनकार करते हुए मौखिक टिप्पणी में कहा, 'संभवतः अधिकारियों को बीच का रास्ता अपनाने की जरूरत है, न इधर और न उधर। हम इस पर कुछ नहीं कहना चाहते।'
प्रतिबंध की पृष्ठभूमि
यह विवाद गिर सोमनाथ के जिला मजिस्ट्रेट जे.एन. वाघेला द्वारा 10 अगस्त 2026 को जारी अधिसूचना से उपजा है। गुजरात पुलिस अधिनियम, 1951 की धारा 33(1)(डब्ल्यू) के तहत जारी इस अधिसूचना में सोमनाथ मंदिर के 500 मीटर के दायरे और सात निर्धारित मार्गों पर मांस, मछली तथा अन्य मांसाहारी व्यंजनों की बिक्री, पाक-कला व भंडारण पर रोक लगाई गई थी। गौरतलब है कि इससे पहले 10 जुलाई 2026 को प्रारंभिक अधिसूचना जारी कर जनता से 30 दिनों के भीतर आपत्तियाँ मांगी गई थीं।
प्रतिबंधित मार्गों में बालका मंदिर से भिड़िया सर्कल, भिड़िया सर्कल से शंख सर्कल, शंख सर्कल से सफारी सर्कल और सफारी सर्कल से प्रजापति धर्मशाला तक के इलाके शामिल हैं।
सरकार और रेस्तरां संचालकों की दलीलें
गुजरात सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने प्रतिबंध का बचाव करते हुए स्पष्ट किया कि निर्धारित क्षेत्रों के बाहर मांसाहारी भोजन परोसने पर कोई रोक नहीं है। राज्य के महाधिवक्ता कमल त्रिवेदी ने तर्क दिया था कि दिवाली और गुजराती नववर्ष के दौरान श्रद्धालुओं की भारी उपस्थिति को देखते हुए यह प्रतिबंध आवश्यक है और मांसाहारी भोजन की अनुमति देने से धार्मिक भावनाएँ आहत होने के साथ-साथ सार्वजनिक सुरक्षा के खतरे भी उत्पन्न हो सकते हैं।
दूसरी ओर, ताज रेस्तरां, जे.एम. रेस्तरां, होटल न्यू गुलबानी, किस्मत रेस्तरां, गुलाबी रेस्तरां और ख्वाजा हिंदुस्तानी रेस्तरां के संचालकों ने दलील दी कि गुजरात पुलिस अधिनियम की धारा 33(1)(डब्ल्यू) अधिकारियों को इस प्रकार का प्रतिबंध लगाने का अधिकार नहीं देती, क्योंकि यह प्रावधान सार्वजनिक मनोरंजन, आमोद-प्रमोद या सभा स्थलों के नियमन से संबंधित है।
हाईकोर्ट की भूमिका और आगे की सुनवाई
30 अक्टूबर 2026 को गुजरात हाईकोर्ट के एकल न्यायाधीश ने रेस्तरां संचालकों की याचिका स्वीकार करते हुए प्रतिबंध अधिसूचना रद्द कर दी थी। किंतु राज्य सरकार ने उसी दिन कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश मनाश रंजन पाठक और न्यायमूर्ति निरजार एस. देसाई की खंडपीठ के समक्ष अपील दायर की। खंडपीठ ने एकल न्यायाधीश के आदेश पर रोक लगाते हुए अगले आदेश तक प्रतिबंध बहाल रखा। गुजरात हाईकोर्ट ने इस मामले में राज्य सरकार की अपील पर नोटिस जारी किया है और अगली सुनवाई 25 नवंबर 2026 को निर्धारित है, जिसमें रेस्तरां संचालकों की एक अन्य लंबित याचिका पर भी विचार होगा।
क्या होगा आगे
सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश के बाद अब सभी की निगाहें गुजरात हाईकोर्ट पर टिकी हैं, जिसे दो महीनों के भीतर मुख्य अपील का निपटारा करना होगा। यह मामला धार्मिक संवेदनशीलता, आजीविका के अधिकार और पुलिस अधिनियम के तहत प्रशासनिक शक्तियों की सीमाओं से जुड़े व्यापक संवैधानिक प्रश्नों को भी उठाता है।