गोकुल मिल्क यूनियन विवाद: शिवसेना (यूबीटी) का आरोप — महायुति ने 'विशेषज्ञ' निदेशकों से पलटा जनादेश
सारांश
मुख्य बातें
शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) ने 7 नवंबर 2026 को महायुति सरकार पर सीधा आरोप लगाया कि उसने गोकुल मिल्क यूनियन (कोल्हापुर जिला सहकारी दुग्ध उत्पादक संघ) के हालिया चुनावी जनादेश को पलटने के लिए सहकारी नियमों में जल्दबाजी में बदलाव किए। पार्टी के मुखपत्र 'सामना' में प्रकाशित संपादकीय में ठाकरे गुट ने इस कदम को 'सहकारी लोकतंत्र पर हमला' करार दिया।
मुख्य घटनाक्रम
कोल्हापुर के लगभग 5.5 लाख डेयरी किसानों की आजीविका से जुड़ी इस यूनियन के हालिया चुनावों में सतेज पाटिल के नेतृत्व वाले गठबंधन ने 13 सीटें जीतीं, जबकि हसन मुश्रीफ के नेतृत्व वाले महायुति समर्थित गुट को 12 सीटें मिलीं। बहुमत स्पष्ट था — फिर भी कहानी यहीं नहीं रुकी।
चुनावी हार के बाद राज्य सरकार ने सहकारी नियमों में संशोधन कर यूनियन में गैर-निर्वाचित 'विशेषज्ञ' निदेशकों की नियुक्ति का प्रावधान जोड़ दिया। इसके परिणामस्वरूप 12 सीटों वाला अल्पसंख्यक गुट अतिरिक्त नियुक्तियों के बल पर 16 सदस्यों का बहुमती गुट बन गया, और 13 सीटें जीतने वाले गठबंधन को प्रभावी रूप से हाशिये पर धकेल दिया गया।
सामना संपादकीय में तीखी टिप्पणी
'सामना' के संपादकीय में ठाकरे गुट ने पौराणिक संदर्भ का सहारा लेते हुए लिखा, 'गोकुल में भगवान कृष्ण माखन-चोर के रूप में प्रसिद्ध थे — वे केवल माखन चुराते थे; लेकिन आज के भाजपाई चालबाजों ने तो पूरा गोकुल ही लूट लिया है।' संपादकीय में आगे कहा गया कि यूनियन पर नियंत्रण पाने के लिए 'विशेषज्ञ' निदेशकों की नियुक्ति की 'गुंडागर्दी' शुरू की गई है।
आलोचकों का कहना है कि यह पुनर्गठन विशेष रूप से उन हाई-प्रोफाइल व्यक्तियों — जिनमें शौमिका महाडिक और नावेद मुशरीफ शामिल हैं — को वापस लाने के लिए तैयार किया गया है, जिन्हें कोल्हापुर के दुग्ध उत्पादकों ने चुनावों में स्पष्ट रूप से नकार दिया था।
सरकार पर चयनात्मक हस्तक्षेप का आरोप
शिवसेना (यूबीटी) के अनुसार, यह हस्तक्षेप चयनात्मक है। संपादकीय में उल्लेख किया गया कि जिले के प्रमुख सहकारी बैंकों और सहकारी चीनी मिलों को इस प्रकार के सरकारी हस्तक्षेप से दूर रखा गया — केवल गोकुल मिल्क यूनियन को इस प्रयोग का शिकार बनाया गया। यह ऐसे समय में आया है जब महाराष्ट्र में सहकारी संस्थाओं की स्वायत्तता पहले से ही बहस के केंद्र में है।
विपक्ष की प्रतिक्रिया और व्यापक असर
विपक्ष के नेताओं ने कैबिनेट के इस फैसले की कड़ी आलोचना की है और इसे सत्ताधारी खेमे में मची घबराहट का संकेत बताया है। ठाकरे गुट ने साफ कहा, 'जो सरकार लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए बहुमत को अपना नेतृत्व खुद चुनने का अधिकार नहीं देती, वह लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों के साथ विश्वासघात करती है।' गौरतलब है कि ऐतिहासिक रूप से महाराष्ट्र की सहकारी संस्थाएं सरकारी सूक्ष्म प्रबंधन से स्वतंत्र मानी जाती रही हैं।
आगे क्या
फिलहाल मामले में कानूनी चुनौतियां सामने आने की संभावना है, और कोल्हापुर के डेयरी किसान तथा सहकारी सदस्य पूरे घटनाक्रम पर पैनी नजर रखे हुए हैं। उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना का तर्क है कि जो मामला कभी एक क्षेत्रीय दुग्ध संघ का सामान्य चुनाव था, वह अब संस्थागत स्वायत्तता और महाराष्ट्र में जमीनी लोकतंत्र के भविष्य की बड़ी लड़ाई बन चुका है।