सीएजी रिपोर्ट पर शिवसेना यूबीटी का हमला: राज्यों का कर्ज ₹90 लाख करोड़ पार, विकास खतरे में
सारांश
मुख्य बातें
शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) ने गुरुवार, 18 जून को भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की 'फाइनेंस 2024-25' रिपोर्ट का हवाला देते हुए केंद्र सरकार पर तीखा प्रहार किया। पार्टी के मुखपत्र 'सामना' में प्रकाशित संपादकीय में कहा गया कि देश के सभी 28 राज्य कर्ज के गहरे दलदल में धँसते जा रहे हैं, और महाराष्ट्र भी इस संकट से अछूता नहीं है।
कर्ज का बढ़ता बोझ
सामना के संपादकीय में सीएजी के आँकड़ों के हवाले से बताया गया कि पिछले दस वर्षों में राज्यों का संयुक्त कर्ज ₹31 लाख करोड़ से उछलकर ₹90 लाख करोड़ तक पहुँच गया है। सीएजी की रिपोर्ट के अनुसार, सभी राज्यों का कुल बजटीय खर्च ₹51.20 लाख करोड़ है, जबकि कुल कर्ज लगभग ₹100 लाख करोड़ के करीब पहुँच चुका है। संपादकीय में इसे 'कर्ज लेकर त्योहार मनाना' की पुरानी कहावत से जोड़ा गया।
केंद्र सरकार भी कर्ज में डूबी
शिवसेना (यूबीटी) ने संपादकीय में यह भी रेखांकित किया कि केंद्र सरकार स्वयं लगभग ₹200 लाख करोड़ के कर्ज में है। पार्टी ने सवाल उठाया कि जब करदाताओं की गाढ़ी कमाई केवल ब्याज चुकाने में खर्च हो जाएगी, तो सड़क, अस्पताल और स्कूल जैसे विकास कार्यों के लिए धन कहाँ से आएगा।
15 राज्यों में गंभीर राजस्व घाटा
संपादकीय में बताया गया कि महाराष्ट्र, कर्नाटक, बिहार, असम, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, तेलंगाना और छत्तीसगढ़ सहित 15 राज्यों का संयुक्त राजस्व घाटा ₹3.46 लाख करोड़ तक पहुँच गया है। घटती आय, बढ़ते खर्च, मुफ्त योजनाओं पर भारी व्यय, धीमी आर्थिक वृद्धि और पुराने कर्ज चुकाने के लिए नए कर्ज लेने की विवशता — इन सभी कारणों से अधिकांश राज्यों की वित्तीय व्यवस्था चरमराती दिख रही है।
वित्तीय अनुशासनहीनता पर सीधा आरोप
सामना के संपादकीय में कहा गया, 'सीएजी ने भले ही सीधे तौर पर न कहा हो, लेकिन सच्चाई यह है कि वित्तीय अनुशासनहीनता और चुनाव जीतने के लिए लोकलुभावन योजनाओं पर खर्च ने राज्य सरकारों को लगातार कर्ज के जाल में धकेल दिया है।' साथ ही यह भी स्वीकार किया गया कि सीएजी की रिपोर्ट ने राज्यों की वित्तीय स्थिति की वास्तविक तस्वीर देश के सामने रखकर सराहनीय काम किया है।
आगे की राह
शिवसेना (यूबीटी) ने स्पष्ट किया कि यदि यही रुझान जारी रहा, तो राज्यों के पास विकास कार्यों के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं बचेंगे। यह बहस अब केवल विपक्षी आलोचना तक सीमित नहीं है — सीएजी के आधिकारिक आँकड़े खुद इस चेतावनी को पुष्ट करते हैं। आने वाले महीनों में संसद और राज्य विधानसभाओं में यह मुद्दा और तीखा रूप ले सकता है।