3 अगस्त 2026
LIVE
Get it on Google Play Download on the App Store

सीएजी रिपोर्ट पर शिवसेना यूबीटी का हमला: राज्यों का कर्ज ₹90 लाख करोड़ पार, विकास खतरे में

शेयर करें:
ऑडियो वॉइस लोड हो रही है…
सीएजी रिपोर्ट पर शिवसेना यूबीटी का हमला: राज्यों का कर्ज ₹90 लाख करोड़ पार, विकास खतरे में

सारांश

सीएजी की 'फाइनेंस 2024-25' रिपोर्ट के आँकड़े चौंकाने वाले हैं — राज्यों का कर्ज एक दशक में तीन गुना बढ़कर ₹90 लाख करोड़ पार कर गया। शिवसेना यूबीटी ने 'सामना' में सीधा सवाल दागा: जब टैक्स का पैसा ब्याज में जाएगा, तो विकास कहाँ से होगा?

मुख्य बातें

शिवसेना (यूबीटी) ने 18 जून को 'सामना' संपादकीय के ज़रिए सीएजी रिपोर्ट का हवाला देते हुए केंद्र सरकार पर निशाना साधा।
पिछले 10 वर्षों में राज्यों का कुल कर्ज ₹31 लाख करोड़ से बढ़कर ₹90 लाख करोड़ हो गया है।
सभी राज्यों का कुल बजटीय खर्च ₹51.20 लाख करोड़ ; कुल कर्ज लगभग ₹100 लाख करोड़ के करीब।
महाराष्ट्र, कर्नाटक, बिहार सहित 15 राज्यों का राजस्व घाटा ₹3.46 लाख करोड़ तक पहुँचा।
केंद्र सरकार पर भी लगभग ₹200 लाख करोड़ का कर्ज — करदाताओं का पैसा ब्याज में खर्च होने की चिंता।
पार्टी ने वित्तीय अनुशासनहीनता और लोकलुभावन योजनाओं को इस संकट का मुख्य कारण बताया।

शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) ने गुरुवार, 18 जून को भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की 'फाइनेंस 2024-25' रिपोर्ट का हवाला देते हुए केंद्र सरकार पर तीखा प्रहार किया। पार्टी के मुखपत्र 'सामना' में प्रकाशित संपादकीय में कहा गया कि देश के सभी 28 राज्य कर्ज के गहरे दलदल में धँसते जा रहे हैं, और महाराष्ट्र भी इस संकट से अछूता नहीं है।

कर्ज का बढ़ता बोझ

सामना के संपादकीय में सीएजी के आँकड़ों के हवाले से बताया गया कि पिछले दस वर्षों में राज्यों का संयुक्त कर्ज ₹31 लाख करोड़ से उछलकर ₹90 लाख करोड़ तक पहुँच गया है। सीएजी की रिपोर्ट के अनुसार, सभी राज्यों का कुल बजटीय खर्च ₹51.20 लाख करोड़ है, जबकि कुल कर्ज लगभग ₹100 लाख करोड़ के करीब पहुँच चुका है। संपादकीय में इसे 'कर्ज लेकर त्योहार मनाना' की पुरानी कहावत से जोड़ा गया।

केंद्र सरकार भी कर्ज में डूबी

शिवसेना (यूबीटी) ने संपादकीय में यह भी रेखांकित किया कि केंद्र सरकार स्वयं लगभग ₹200 लाख करोड़ के कर्ज में है। पार्टी ने सवाल उठाया कि जब करदाताओं की गाढ़ी कमाई केवल ब्याज चुकाने में खर्च हो जाएगी, तो सड़क, अस्पताल और स्कूल जैसे विकास कार्यों के लिए धन कहाँ से आएगा।

15 राज्यों में गंभीर राजस्व घाटा

संपादकीय में बताया गया कि महाराष्ट्र, कर्नाटक, बिहार, असम, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, तेलंगाना और छत्तीसगढ़ सहित 15 राज्यों का संयुक्त राजस्व घाटा ₹3.46 लाख करोड़ तक पहुँच गया है। घटती आय, बढ़ते खर्च, मुफ्त योजनाओं पर भारी व्यय, धीमी आर्थिक वृद्धि और पुराने कर्ज चुकाने के लिए नए कर्ज लेने की विवशता — इन सभी कारणों से अधिकांश राज्यों की वित्तीय व्यवस्था चरमराती दिख रही है।

वित्तीय अनुशासनहीनता पर सीधा आरोप

सामना के संपादकीय में कहा गया, 'सीएजी ने भले ही सीधे तौर पर न कहा हो, लेकिन सच्चाई यह है कि वित्तीय अनुशासनहीनता और चुनाव जीतने के लिए लोकलुभावन योजनाओं पर खर्च ने राज्य सरकारों को लगातार कर्ज के जाल में धकेल दिया है।' साथ ही यह भी स्वीकार किया गया कि सीएजी की रिपोर्ट ने राज्यों की वित्तीय स्थिति की वास्तविक तस्वीर देश के सामने रखकर सराहनीय काम किया है।

आगे की राह

शिवसेना (यूबीटी) ने स्पष्ट किया कि यदि यही रुझान जारी रहा, तो राज्यों के पास विकास कार्यों के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं बचेंगे। यह बहस अब केवल विपक्षी आलोचना तक सीमित नहीं है — सीएजी के आधिकारिक आँकड़े खुद इस चेतावनी को पुष्ट करते हैं। आने वाले महीनों में संसद और राज्य विधानसभाओं में यह मुद्दा और तीखा रूप ले सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली सवाल यह है कि यह संकट किसी एक सरकार की देन नहीं — लगभग सभी दलों ने सत्ता में रहते हुए मुफ्त योजनाओं और कर्ज-वित्तपोषित खर्च का रास्ता अपनाया है। शिवसेना यूबीटी जिस 'वित्तीय अनुशासनहीनता' की बात करती है, वह महाराष्ट्र में उसके अपने शासनकाल में भी दिखी थी। असली परीक्षा यह है कि क्या कोई भी दल राजकोषीय सुधार का राजनीतिक जोखिम उठाने को तैयार है — क्योंकि मुफ्त योजनाएँ वोट दिलाती हैं, और कर्ज की कीमत अगली पीढ़ी चुकाती है।
RashtraPress
3 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सीएजी की 'फाइनेंस 2024-25' रिपोर्ट में राज्यों के कर्ज को लेकर क्या खुलासा हुआ?
सीएजी की रिपोर्ट के अनुसार, देश के सभी 28 राज्यों का कुल कर्ज पिछले 10 वर्षों में ₹31 लाख करोड़ से बढ़कर ₹90 लाख करोड़ तक पहुँच गया है। राज्यों का कुल बजटीय खर्च ₹51.20 लाख करोड़ है, जबकि कुल कर्ज लगभग ₹100 लाख करोड़ के करीब है।
शिवसेना यूबीटी ने 'सामना' में केंद्र सरकार पर क्या आरोप लगाए?
शिवसेना (यूबीटी) ने सामना संपादकीय में कहा कि वित्तीय अनुशासनहीनता और चुनाव जीतने के लिए लोकलुभावन योजनाओं पर भारी खर्च ने राज्य सरकारों को कर्ज के जाल में धकेल दिया है। पार्टी ने यह भी कहा कि केंद्र सरकार खुद ₹200 लाख करोड़ के कर्ज में डूबी है।
किन राज्यों में राजस्व घाटा सबसे गंभीर है?
सामना संपादकीय के अनुसार, महाराष्ट्र, कर्नाटक, बिहार, असम, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, तेलंगाना और छत्तीसगढ़ सहित 15 राज्यों का संयुक्त राजस्व घाटा ₹3.46 लाख करोड़ तक पहुँच गया है।
बढ़ते कर्ज का आम नागरिकों और विकास पर क्या असर पड़ेगा?
शिवसेना (यूबीटी) के अनुसार, लगातार बढ़ते कर्ज और ब्याज भुगतान के कारण राज्यों के पास सड़क, अस्पताल और शिक्षा जैसे विकास कार्यों के लिए पर्याप्त धन नहीं बच रहा। करदाताओं का पैसा केवल ब्याज चुकाने में खर्च हो रहा है, जिससे सार्वजनिक सेवाओं की गुणवत्ता पर असर पड़ने की आशंका है।
सीएजी रिपोर्ट को लेकर शिवसेना यूबीटी का रुख क्या है?
शिवसेना (यूबीटी) ने सीएजी रिपोर्ट की सराहना करते हुए कहा कि इसने राज्यों की वित्तीय स्थिति की वास्तविक तस्वीर देश के सामने रखी है। हालाँकि, पार्टी ने यह भी कहा कि सीएजी ने सीधे तौर पर वित्तीय अनुशासनहीनता को दोष नहीं दिया, लेकिन आँकड़े खुद इसकी गवाही देते हैं।
राष्ट्र प्रेस
सिलसिला

जुड़े बिंदु

इस ख़बर के पीछे की कड़ियाँ — सबसे नई पहले।

8 बिंदु
  1. नवीनतम 3 दिन पहले
  2. 4 दिन पहले
  3. 1 सप्ताह पहले
  4. 1 महीना पहले
  5. 1 महीना पहले
  6. 1 महीना पहले
  7. 1 महीना पहले
  8. 6 महीने पहले