₹7.75 लाख करोड़ के कॉर्पोरेट लोन राइट ऑफ पर शिवसेना (यूबीटी) का हमला, बड़े डिफॉल्टरों के नाम छिपाने पर सवाल
सारांश
मुख्य बातें
शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) ने 23 जुलाई को केंद्र सरकार पर आरोप लगाया कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने वित्त वर्ष 2014-15 से 2025-26 के बीच ₹7.75 लाख करोड़ के बैड लोन बट्टे खाते में डाले, जिनमें प्रत्येक खाते पर ₹100 करोड़ या उससे अधिक का बकाया था — और इसके बावजूद बड़े कर्जदारों के नाम सार्वजनिक नहीं किए गए। पार्टी के मुखपत्र 'सामना' के संपादकीय में यह हमला बोला गया, जो केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी के लोकसभा में दिए गए लिखित जवाब पर आधारित था।
मुख्य आँकड़े और तथ्य
संसद में दी गई जानकारी के अनुसार, इन 1,249 बड़े खातों में से बैंक अब तक केवल ₹3.10 लाख करोड़ ही वसूल कर पाए हैं — यानी कुल राइट ऑफ राशि का 40% से भी कम। शेष ₹4.65 लाख करोड़ की वसूली अब भी लंबित है। 'सामना' के संपादकीय में इस आँकड़े को सरकार की वित्तीय अनुशासन की दावेदारी के विरुद्ध एक बड़ा विरोधाभास बताया गया।
सरकार का तर्क और विपक्ष की आपत्ति
केंद्र सरकार ने संसद में स्पष्ट किया कि लोन को बट्टे खाते में डालना एक सामान्य तकनीकी लेखा प्रक्रिया है और इसका अर्थ लोन माफी नहीं है। सरकार के अनुसार, भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) अधिनियम की धारा 45ई के तहत कर्ज से जुड़ी जानकारी गोपनीय रखी जाती है, इसलिए बड़े डिफॉल्टरों के नाम सार्वजनिक नहीं किए जा सकते।
'सामना' के संपादकीय में इस तर्क को चौंकाने वाला और पाखंडपूर्ण करार दिया गया। पार्टी ने सवाल उठाया कि जब छोटे लोन डिफॉल्टरों के नाम सार्वजनिक किए जाते हैं, तो बड़े उद्योगपतियों के नाम गोपनीयता की आड़ में क्यों छिपाए जाते हैं।
आम जनता पर असर और दोहरे मानदंड का आरोप
शिवसेना (यूबीटी) ने दोहरे मानदंड का सीधा आरोप लगाया। पार्टी का कहना है कि मध्यम वर्ग के लोगों, छोटे कारोबारियों और किसानों की मामूली चूक पर उनकी संपत्तियाँ, गाड़ियाँ और घर जब्त या सील कर दिए जाते हैं, जबकि बड़े कॉर्पोरेट डिफॉल्टरों के खिलाफ ऐसी कोई कार्रवाई नहीं होती।
संपादकीय में मौजूदा दौर को 'लोन डिफॉल्ट का अमृत काल' की संज्ञा दी गई — एक तीखा राजनीतिक व्यंग्य। पार्टी ने कहा, 'बड़ा लोन लेना, उसका थोड़ा सा हिस्सा चुकाना और बाकी रकम नहीं लौटाना मानो सरकारी मंजूरी के साथ हो रहा है।'
राजनीतिक चंदे और मिलीभगत का आरोप
उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाले ठाकरे गुट ने यह भी सवाल उठाया कि क्या बड़े लोन डिफॉल्टर सत्ताधारी पार्टी को भारी चंदा देते हैं। पार्टी ने आरोप लगाया कि इसके पीछे एक अघोषित नीति काम कर रही है — 'चंदा दो, लोन माफ कराओ।' पार्टी ने कहा कि उद्योग जगत के धोखेबाज़ों और सरकार में बैठे लोगों की कथित मिलीभगत से सार्वजनिक बैंकों को नुकसान पहुँचाया जा रहा है।
आगे क्या होगा
यह ऐसे समय में आया है जब संसद का मानसून सत्र जारी है और विपक्ष बैंकिंग पारदर्शिता को एक प्रमुख मुद्दा बनाने की कोशिश कर रहा है। शिवसेना (यूबीटी) ने माँग की है कि सरकार बड़े डिफॉल्टरों के नाम सार्वजनिक करे और वसूली की समयसीमा तय करे, अन्यथा जनता का पैसा खतरे में पड़ता रहेगा।