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₹7.75 लाख करोड़ के कॉर्पोरेट लोन राइट ऑफ पर शिवसेना (यूबीटी) का हमला, बड़े डिफॉल्टरों के नाम छिपाने पर सवाल

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₹7.75 लाख करोड़ के कॉर्पोरेट लोन राइट ऑफ पर शिवसेना (यूबीटी) का हमला, बड़े डिफॉल्टरों के नाम छिपाने पर सवाल

सारांश

₹7.75 लाख करोड़ के कॉर्पोरेट लोन राइट ऑफ और वसूली में ₹4.65 लाख करोड़ की खाई — शिवसेना (यूबीटी) ने इसे 'लोन डिफॉल्ट का अमृत काल' कहा। बड़े डिफॉल्टरों के नाम छिपाने और छोटे कर्जदारों पर सख्ती का दोहरा मानदंड इस विवाद का केंद्र है।

मुख्य बातें

सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने वित्त वर्ष 2014-15 से 2025-26 के बीच 1,249 बड़े खातों के ₹7.75 लाख करोड़ के बैड लोन बट्टे खाते में डाले।
इनमें से अब तक केवल ₹3.10 लाख करोड़ की वसूली हो पाई है; ₹4.65 लाख करोड़ अब भी लंबित।
शिवसेना (यूबीटी) ने इस जानकारी का स्रोत केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी का लोकसभा में दिया गया लिखित जवाब बताया।
सरकार ने RBI अधिनियम की धारा 45ई का हवाला देते हुए बड़े डिफॉल्टरों के नाम सार्वजनिक करने से इनकार किया।
पार्टी ने आरोप लगाया कि छोटे कर्जदारों पर सख्ती और बड़े कॉर्पोरेट डिफॉल्टरों को राहत देना दोहरे मानदंड की नीति है।

शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) ने 23 जुलाई को केंद्र सरकार पर आरोप लगाया कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने वित्त वर्ष 2014-15 से 2025-26 के बीच ₹7.75 लाख करोड़ के बैड लोन बट्टे खाते में डाले, जिनमें प्रत्येक खाते पर ₹100 करोड़ या उससे अधिक का बकाया था — और इसके बावजूद बड़े कर्जदारों के नाम सार्वजनिक नहीं किए गए। पार्टी के मुखपत्र 'सामना' के संपादकीय में यह हमला बोला गया, जो केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी के लोकसभा में दिए गए लिखित जवाब पर आधारित था।

मुख्य आँकड़े और तथ्य

संसद में दी गई जानकारी के अनुसार, इन 1,249 बड़े खातों में से बैंक अब तक केवल ₹3.10 लाख करोड़ ही वसूल कर पाए हैं — यानी कुल राइट ऑफ राशि का 40% से भी कम। शेष ₹4.65 लाख करोड़ की वसूली अब भी लंबित है। 'सामना' के संपादकीय में इस आँकड़े को सरकार की वित्तीय अनुशासन की दावेदारी के विरुद्ध एक बड़ा विरोधाभास बताया गया।

सरकार का तर्क और विपक्ष की आपत्ति

केंद्र सरकार ने संसद में स्पष्ट किया कि लोन को बट्टे खाते में डालना एक सामान्य तकनीकी लेखा प्रक्रिया है और इसका अर्थ लोन माफी नहीं है। सरकार के अनुसार, भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) अधिनियम की धारा 45ई के तहत कर्ज से जुड़ी जानकारी गोपनीय रखी जाती है, इसलिए बड़े डिफॉल्टरों के नाम सार्वजनिक नहीं किए जा सकते।

'सामना' के संपादकीय में इस तर्क को चौंकाने वाला और पाखंडपूर्ण करार दिया गया। पार्टी ने सवाल उठाया कि जब छोटे लोन डिफॉल्टरों के नाम सार्वजनिक किए जाते हैं, तो बड़े उद्योगपतियों के नाम गोपनीयता की आड़ में क्यों छिपाए जाते हैं।

आम जनता पर असर और दोहरे मानदंड का आरोप

शिवसेना (यूबीटी) ने दोहरे मानदंड का सीधा आरोप लगाया। पार्टी का कहना है कि मध्यम वर्ग के लोगों, छोटे कारोबारियों और किसानों की मामूली चूक पर उनकी संपत्तियाँ, गाड़ियाँ और घर जब्त या सील कर दिए जाते हैं, जबकि बड़े कॉर्पोरेट डिफॉल्टरों के खिलाफ ऐसी कोई कार्रवाई नहीं होती।

संपादकीय में मौजूदा दौर को 'लोन डिफॉल्ट का अमृत काल' की संज्ञा दी गई — एक तीखा राजनीतिक व्यंग्य। पार्टी ने कहा, 'बड़ा लोन लेना, उसका थोड़ा सा हिस्सा चुकाना और बाकी रकम नहीं लौटाना मानो सरकारी मंजूरी के साथ हो रहा है।'

राजनीतिक चंदे और मिलीभगत का आरोप

उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाले ठाकरे गुट ने यह भी सवाल उठाया कि क्या बड़े लोन डिफॉल्टर सत्ताधारी पार्टी को भारी चंदा देते हैं। पार्टी ने आरोप लगाया कि इसके पीछे एक अघोषित नीति काम कर रही है — 'चंदा दो, लोन माफ कराओ।' पार्टी ने कहा कि उद्योग जगत के धोखेबाज़ों और सरकार में बैठे लोगों की कथित मिलीभगत से सार्वजनिक बैंकों को नुकसान पहुँचाया जा रहा है।

आगे क्या होगा

यह ऐसे समय में आया है जब संसद का मानसून सत्र जारी है और विपक्ष बैंकिंग पारदर्शिता को एक प्रमुख मुद्दा बनाने की कोशिश कर रहा है। शिवसेना (यूबीटी) ने माँग की है कि सरकार बड़े डिफॉल्टरों के नाम सार्वजनिक करे और वसूली की समयसीमा तय करे, अन्यथा जनता का पैसा खतरे में पड़ता रहेगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

चुनावी अर्थशास्त्र की झलक देता है। जब तक वसूली को सत्यापन-योग्य सार्वजनिक रिपोर्टिंग से नहीं जोड़ा जाता, तब तक 'तकनीकी राइट ऑफ' और 'वास्तविक माफी' के बीच की रेखा आम नागरिक के लिए अदृश्य ही रहेगी।
RashtraPress
23 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

कॉर्पोरेट लोन राइट ऑफ क्या होता है और क्या यह लोन माफी है?
लोन राइट ऑफ एक तकनीकी लेखा प्रक्रिया है जिसमें बैंक अपनी बैलेंस शीट से बैड लोन हटा देते हैं, लेकिन वसूली का कानूनी अधिकार बना रहता है। केंद्र सरकार ने संसद में स्पष्ट किया है कि इसका अर्थ लोन माफी नहीं है, हालाँकि आलोचकों का कहना है कि कम वसूली दर इस तर्क को कमज़ोर करती है।
सार्वजनिक बैंकों ने कितने बड़े लोन बट्टे खाते में डाले हैं?
केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी के लोकसभा में दिए गए लिखित जवाब के अनुसार, वित्त वर्ष 2014-15 से 2025-26 के बीच 1,249 ऐसे खातों के ₹7.75 लाख करोड़ बट्टे खाते में डाले गए जिनमें प्रत्येक पर ₹100 करोड़ या उससे अधिक बकाया था। इनमें से अब तक केवल ₹3.10 लाख करोड़ की वसूली हो पाई है।
बड़े लोन डिफॉल्टरों के नाम सार्वजनिक क्यों नहीं किए जाते?
सरकार का कहना है कि भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) अधिनियम की धारा 45ई के तहत कर्ज से जुड़ी जानकारी गोपनीय रखी जाती है। शिवसेना (यूबीटी) ने इस तर्क पर सवाल उठाते हुए कहा कि छोटे डिफॉल्टरों के नाम सार्वजनिक होते हैं, तो बड़े उद्योगपतियों के लिए यह छूट क्यों।
शिवसेना (यूबीटी) ने केंद्र सरकार पर क्या आरोप लगाए हैं?
पार्टी ने आरोप लगाया है कि बड़े कॉर्पोरेट डिफॉल्टरों को संरक्षण दिया जा रहा है जबकि मध्यम वर्ग, छोटे कारोबारियों और किसानों पर सख्त वसूली की जाती है। पार्टी ने 'चंदा दो, लोन माफ कराओ' जैसी अघोषित नीति का भी आरोप लगाया है।
इस मुद्दे का आम जनता पर क्या असर पड़ता है?
सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में जमा आम नागरिकों का पैसा इन्हीं बैंकों से दिए गए कॉर्पोरेट लोन में लगा होता है। वसूली में कमी से बैंकों की वित्तीय सेहत प्रभावित होती है, जिसका अंततः असर ब्याज दरों, लोन की उपलब्धता और सरकारी पूंजी निवेश पर पड़ सकता है।
राष्ट्र प्रेस
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