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महायुति सरकार की ₹97,706 करोड़ पूरक मांग पर शिवसेना (यूबीटी) का हमला, महाराष्ट्र की अर्थव्यवस्था 'ध्वस्त' बताई

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महायुति सरकार की ₹97,706 करोड़ पूरक मांग पर शिवसेना (यूबीटी) का हमला, महाराष्ट्र की अर्थव्यवस्था 'ध्वस्त' बताई

सारांश

बजट के महज तीन महीने बाद ₹97,706 करोड़ की पूरक मांग — शिवसेना (यूबीटी) ने इसे महाराष्ट्र की वित्तीय विरासत का अपमान बताया। ₹11 लाख करोड़ के ऋण और चार साल में ₹5 लाख करोड़ की पूरक मांगों के साथ, एक बार वित्तीय अनुशासन का प्रतीक रहा राज्य अब गंभीर आर्थिक दबाव में है।

मुख्य बातें

शिवसेना (यूबीटी) ने 25 जून 2026 को आरोप लगाया कि महायुति सरकार ने बजट के तीन महीने बाद ₹97,706.40 करोड़ की पूरक मांगें पेश कीं।
महाराष्ट्र का सार्वजनिक ऋण लगभग ₹11 लाख करोड़ और वार्षिक ब्याज बोझ ₹60,000 करोड़ तक पहुँचने का दावा।
पिछले चार वर्षों में महायुति सरकार ने कथित तौर पर ₹5 लाख करोड़ से अधिक की पूरक मांगें लाई हैं।
पार्टी के मुखपत्र 'सामना' ने इसे 'बजट से अधिक खर्च का विश्व रिकॉर्ड' करार दिया।
शिवसेना (यूबीटी) ने आरोप लगाया कि MVA शासनकाल में कम पूरक मांगों की आलोचना करने वाले नेता अब सत्ता में हैं और दोहरे मापदंड अपना रहे हैं।

शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) ने गुरुवार, 25 जून 2026 को आरोप लगाया कि महायुति सरकार द्वारा 2026-27 के वार्षिक बजट के मात्र तीन महीने बाद ₹97,706.40 करोड़ की पूरक मांगें पेश करना महाराष्ट्र के वित्तीय अनुशासन के खोखलेपन को उजागर करता है। पार्टी ने दावा किया कि राज्य का सार्वजनिक ऋण लगभग ₹11 लाख करोड़ तक पहुँच चुका है और वार्षिक ब्याज बोझ ₹60,000 करोड़ को पार कर गया है।

पूरक मांगों पर शिवसेना (यूबीटी) का रुख

पार्टी के मुखपत्र 'सामना' के संपादकीय में महायुति सरकार की तुलना उस परीक्षार्थी से की गई जो परीक्षा के दौरान एक के बाद एक अनुपूरक उत्तर पुस्तिकाएँ माँगता है और मुश्किल से उत्तीर्ण हो पाता है। संपादकीय में कहा गया, 'महाराष्ट्र की अनुपूरक प्रश्न मांगने वाली सरकार अनुपूरक मांगों में रिकॉर्ड बनाकर राज्य की तबाह अर्थव्यवस्था का सार्वजनिक रूप से मज़ाक उड़ा रही है।'

पार्टी के अनुसार, बजट के तुरंत बाद पूरक मांग पेश करना किसी भी सरकार के लिए अत्यंत शर्मनाक है। संपादकीय में यह भी तर्क दिया गया कि अनुत्पादक गतिविधियों पर अंधाधुंध खर्च के कारण राज्य सरकार की वित्तीय योजना पूरी तरह पटरी से उतर गई है।

चार वर्षों में ₹5 लाख करोड़ से अधिक पूरक मांगें

शिवसेना (यूबीटी) के अनुसार, पिछले चार वर्षों में महायुति सरकार लगभग ₹5 लाख करोड़ की पूरक मांगें ला चुकी है। पार्टी ने इसे 'बजट से अधिक खर्च का विश्व रिकॉर्ड' करार दिया। पार्टी का कहना है कि इस बार तो सारी हदें पार हो गईं — अगले बजट में पूरे नौ महीने शेष रहते हुए राजस्व और व्यय अनुमान पहले तीन महीनों में ही चरमरा गए।

पार्टी ने स्पष्ट किया कि पूरक मांगों का उपयोग आदर्श रूप से तब किया जाना चाहिए जब वित्तीय वर्ष के अंत में आवंटन कम पड़ जाए या कोई अप्रत्याशित योजना शुरू हो। लेकिन आलोचकों का कहना है कि वर्तमान सरकार जानबूझकर आवंटन मुख्य बजट में छिपाती है और राजनीतिक उद्देश्यों के लिए पूरक मार्ग से हज़ारों करोड़ की मांग करती है।

विपक्ष से सत्ता तक — दोहरे मापदंड का आरोप

शिवसेना (यूबीटी) ने याद दिलाया कि जब महा विकास अघाड़ी (MVA) सत्ता में थी और उसने अपेक्षाकृत कम पूरक मांगें रखी थीं, तब मौजूदा सत्तारूढ़ गठबंधन के नेता — जो उस समय विपक्ष में थे — ने वित्तीय अनुशासन के पतन का आरोप लगाते हुए कड़ी आलोचना की थी।

'सामना' के संपादकीय में व्यंग्यात्मक लहजे में कहा गया, 'आज वही विपक्षी नेता राज्य के मुख्यमंत्री और वित्त मंत्री के रूप में कार्यरत हैं। उनके कार्यकाल के चार वर्षों में पूरक मांगें ₹5 लाख करोड़ से अधिक हो जाने के बावजूद वे अब इसे वित्तीय अनुशासनहीनता नहीं मानते।'

महाराष्ट्र की वित्तीय विरासत पर खतरा

शिवसेना (यूबीटी) ने आरोप लगाया कि महाराष्ट्र — जो कभी अपने वित्तीय अनुशासन और ईमानदारी के लिए देशभर में सम्मानित था — उसकी आर्थिक विरासत को खुलेआम नष्ट किया जा रहा है। पार्टी के अनुसार, पिछले चार वर्षों में यह प्रतिष्ठा पूरी तरह धूमिल हो चुकी है। यह देखना होगा कि विधानसभा में इन पूरक मांगों पर बहस किस दिशा में जाती है और सरकार वित्तीय पारदर्शिता के सवालों का जवाब कैसे देती है।

संपादकीय दृष्टिकोण

706 करोड़ की पूरक मांग महज एक बजटीय तकनीकी मसला नहीं है — यह राज्य की वित्तीय योजना की बुनियादी विफलता का संकेत है। जब बजट पेश होने के तीन महीने के भीतर ही अनुमान ध्वस्त हो जाएँ, तो सवाल उठता है कि मूल बजट कितना वास्तविक था। शिवसेना (यूबीटी) का 'दोहरे मापदंड' वाला आरोप राजनीतिक है, लेकिन ₹11 लाख करोड़ के ऋण और ₹60,000 करोड़ के ब्याज बोझ के आँकड़े यदि सही हैं, तो ये महाराष्ट्र की दीर्घकालिक राजकोषीय सेहत के लिए गंभीर चेतावनी हैं। मुख्यधारा की कवरेज राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सिमटी रहती है — असली सवाल यह है कि इन पूरक मांगों में किन मदों पर खर्च हो रहा है और उसका जनता को क्या लाभ मिल रहा है।
RashtraPress
11 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

महायुति सरकार की ₹97,706 करोड़ की पूरक मांग क्या है?
यह 2026-27 के वार्षिक बजट के तीन महीने बाद महायुति सरकार द्वारा विधानसभा में पेश की गई अतिरिक्त खर्च की माँग है, जिसकी राशि ₹97,706.40 करोड़ है। शिवसेना (यूबीटी) के अनुसार, यह राज्य के वित्तीय अनुशासन की विफलता को दर्शाता है।
महाराष्ट्र पर कुल कितना सार्वजनिक ऋण है?
शिवसेना (यूबीटी) के दावे के अनुसार, महाराष्ट्र का सार्वजनिक ऋण लगभग ₹11 लाख करोड़ तक पहुँच गया है और वार्षिक ब्याज बोझ ₹60,000 करोड़ है। ये आँकड़े पार्टी के मुखपत्र 'सामना' के संपादकीय में प्रस्तुत किए गए हैं।
शिवसेना (यूबीटी) ने महायुति पर दोहरे मापदंड का आरोप क्यों लगाया?
जब महा विकास अघाड़ी (MVA) सत्ता में थी, तब मौजूदा महायुति नेताओं ने विपक्ष में रहते हुए कम पूरक मांगों पर भी वित्तीय अनुशासनहीनता का आरोप लगाया था। अब वही नेता मुख्यमंत्री और वित्त मंत्री के पद पर हैं और चार वर्षों में ₹5 लाख करोड़ से अधिक की पूरक मांगें ला चुके हैं।
पूरक मांगें क्या होती हैं और इनका उपयोग कब होना चाहिए?
पूरक मांगें वे अतिरिक्त बजटीय माँगें होती हैं जो तब पेश की जाती हैं जब मुख्य बजट में आवंटित राशि कम पड़ जाए या कोई अप्रत्याशित योजना शुरू हो। शिवसेना (यूबीटी) का कहना है कि आदर्श रूप से इनका उपयोग वित्त वर्ष के अंत में होना चाहिए, न कि बजट पेश होने के तीन महीने बाद।
इस विवाद का महाराष्ट्र की जनता पर क्या असर पड़ सकता है?
आलोचकों का कहना है कि अनुत्पादक मदों पर अंधाधुंध खर्च और बढ़ते ऋण से राज्य की विकास परियोजनाओं और कल्याणकारी योजनाओं के लिए संसाधन सीमित हो सकते हैं। ₹60,000 करोड़ का वार्षिक ब्याज बोझ वह राशि है जो शिक्षा, स्वास्थ्य या बुनियादी ढाँचे पर खर्च नहीं हो पाती।
राष्ट्र प्रेस
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