जीडीपी वृद्धि से नहीं छुपेगी हकीकत: शिवसेना (यूबीटी) ने मोदी सरकार पर साधा निशाना, 85 करोड़ को मुफ्त अनाज का सवाल उठाया
सारांश
मुख्य बातें
शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) ने बुधवार, 2 सितंबर को मोदी सरकार पर तीखा हमला बोलते हुए आरोप लगाया कि 7.8 प्रतिशत की तिमाही जीडीपी वृद्धि दर का जश्न मनाना जमीनी आर्थिक संकट को ढकने की कोशिश है। पार्टी के मुखपत्र 'सामना' में प्रकाशित संपादकीय में सरकार के रुख को आम नागरिकों के संघर्षों से कटा हुआ और दिखावटी करार दिया गया।
जीडीपी के आँकड़े और ज़मीनी सच्चाई
संपादकीय में कहा गया कि जीडीपी के उतार-चढ़ाव वाले या बढ़ा-चढ़ाकर बताए गए आँकड़े आम जनता के लिए कोई विशेष मायने नहीं रखते। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा कथित तौर पर सोशल मीडिया पर की गई बधाई पोस्ट को निशाना बनाते हुए पार्टी ने सवाल उठाया कि यदि देश अभूतपूर्व प्रगति की ऊँचाइयाँ छू रहा है, तो 85 करोड़ नागरिकों को जीवन यापन के लिए 10 किलो मुफ्त अनाज पर क्यों निर्भर रहना पड़ता है।
ठाकरे खेमे ने यह भी रेखांकित किया कि एक ही वर्ष में 7,000 से अधिक किसानों की आत्महत्या की दुखद घटनाएँ देश की आर्थिक स्थिति की एक बिल्कुल अलग तस्वीर पेश करती हैं।
महाराष्ट्र में वित्तीय संकट
संपादकीय के अनुसार, आर्थिक संकट राज्य प्रशासन में गहराई तक व्याप्त है। महाराष्ट्र में ठेकेदारों के बकाया सरकारी बिल ₹90,000 करोड़ से अधिक हो चुके हैं, जिसके चलते आर्थिक तंगी से 17 ठेकेदारों ने आत्महत्या कर ली। पार्टी ने यह भी उठाया कि राज्यों के खजाने रिक्त होते जा रहे हैं, जबकि प्रधानमंत्री देखभाल कोष में ₹10,000 करोड़ की राशि अप्रयुक्त पड़ी है।
महंगाई की मार: आम नागरिक पर सीधा असर
संपादकीय में 1 सितंबर से लागू व्यापक मूल्य वृद्धि का विस्तृत ब्यौरा दिया गया। मुंबई में दूध की कीमत में 9-10 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी हुई। गुड़ की कीमतें 25 प्रतिशत बढ़ी हैं, जबकि प्याज ₹50 प्रति किलो से ऊपर पहुँच गया है। घरेलू पीएनजी गैस (₹1 प्रति यूनिट) और सीएनजी की कीमतें भी बढ़ी हैं, जिससे देशभर में ऑटो-रिक्शा और टैक्सी किराए प्रभावित हो रहे हैं। चीनी और दूध की महंगाई के कारण एक साधारण चाय अब ₹13 की हो गई है, जिसका सीधा असर कम आय वाले दिहाड़ी मजदूरों पर पड़ रहा है।
कृषि क्षेत्र पर संकट के बादल
संपादकीय में बताया गया कि कृषि क्षेत्र की विकास दर 4.4 प्रतिशत से घटकर 3.6 प्रतिशत रह गई है। मानसून में एक महीने से चले आ रहे सूखे ने खरीफ फसल के मौसम पर गंभीर अनिश्चितता पैदा कर दी है, जिससे ग्रामीण आजीविका सीधे खतरे में है।
रुपये की गिरावट और बेरोजगारी पर सवाल
शिवसेना (यूबीटी) ने जोर देकर कहा कि लगातार गिरता भारतीय रुपया और बढ़ती बेरोजगारी दर गहरी व्यवस्थागत कमज़ोरियों को उजागर करते हैं। आलोचकों का कहना है कि जीडीपी वृद्धि के आँकड़ों का बखान उन लाखों लोगों को राहत नहीं देता जो रोज़ाना महंगाई की मार झेल रहे हैं। पार्टी ने यह भी रेखांकित किया कि जहाँ एक ओर औद्योगिक अभिजात वर्ग की संपत्ति में लगातार वृद्धि हो रही है, वहीं लाखों परिवार मुद्रास्फीति और आर्थिक अस्थिरता के बढ़ते बोझ तले दबे हैं। आने वाले दिनों में यह राजनीतिक बहस और तेज़ होने की संभावना है।