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शिवसेना (UBT) का केंद्र पर हमला: ‘वैश्विक मंच पर अकेला पड़ा भारत, RBI ने 83 टन सोना बेचा’

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शिवसेना (UBT) का केंद्र पर हमला: ‘वैश्विक मंच पर अकेला पड़ा भारत, RBI ने 83 टन सोना बेचा’

सारांश

‘सामना’ के संपादकीय में शिवसेना (UBT) ने मोदी सरकार पर तीखा हमला बोला — पहलगाम हमले के बाद भारत वैश्विक मंच पर अकेला, RBI ने कथित तौर पर 83 टन सोना बेचा, चीन की निंदा करने का साहस नहीं, और नेपाल जैसे पड़ोसी भी अब बीजिंग के पाले में। पार्टी ने ‘पंचशील’ और ‘गुटनिरपेक्षता’ छोड़ने का आरोप लगाया।

मुख्य बातें

शिवसेना (UBT) ने 4 जून को मुखपत्र ‘सामना’ के संपादकीय में केंद्र की विदेश नीति पर हमला बोला।
आरोप: पहलगाम हमले के बाद भारत वैश्विक मंच पर अलग-थलग, कोई बिना शर्त मज़बूत सहयोगी नहीं।
दावा: RBI ने कथित तौर पर अर्थव्यवस्था स्थिर करने के लिए 83 टन सोना बेचा।
गलवान और पहलगाम के बावजूद चीन से व्यापारिक संबंध न तोड़ पाने को विफलता बताया।
नेपाल के बीजिंग की ओर झुकाव और भारत से दूरी पर भी जताई गहरी चिंता।
पार्टी का आरोप: भारत ने ‘पंचशील’ और ‘गुटनिरपेक्षता’ की पारंपरिक नीति त्याग दी।

शिवसेना (UBT) ने 4 जून को केंद्र सरकार की विदेश नीति पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि पहलगाम हमले जैसी गंभीर घटनाओं के बाद भारत वैश्विक मंच पर ‘अलग-थलग’ पड़ गया है और किसी भी बड़ी शक्ति से उसे बिना शर्त मज़बूत समर्थन नहीं मिल रहा। पार्टी के मुखपत्र ‘सामना’ के संपादकीय में आरोप लगाया गया कि 1.4 अरब की आबादी वाला देश आज वैश्विक मानचित्र पर ‘लगभग नगण्य’ दिखाई दे रहा है, जो गहरे आंतरिक आर्थिक और सुरक्षा संकट का संकेत है।

‘सामना’ संपादकीय की मुख्य बातें

संपादकीय के अनुसार, घरेलू अर्थव्यवस्था गंभीर मंदी से जूझ रही है और भारतीय रुपया काफी कमज़ोर हो चुका है। ठाकरे गुट ने दावा किया कि भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने कथित तौर पर ढहती अर्थव्यवस्था को स्थिर करने के लिए राष्ट्रीय कोष से 83 टन सोना बेच दिया — एक ऐसा कदम जो जनता की नज़रों से छिपाकर रखा गया और जिससे भविष्य में राष्ट्रीय संपत्तियों की बिक्री को लेकर आशंकाएँ पैदा हो गई हैं।

चीन पर चुप्पी का आरोप

संपादकीय में कहा गया कि प्रशासन आतंकियों के मोबाइल फोन का चीन से जुड़ा होना जैसे छोटे ब्यौरों के आधार पर अपनी बहादुरी का बखान करता है, परंतु स्पष्ट सबूतों के बावजूद बीजिंग की आधिकारिक तौर पर निंदा करने का राजनीतिक साहस नहीं दिखा पाता। ठाकरे गुट ने लिखा, ‘यदि चीन भारतीय धरती पर पाकिस्तानी आतंकवाद को सक्रिय रूप से बढ़ावा देता है, तो चीनी अर्थव्यवस्था के ख़िलाफ़ आर्थिक जवाबी हमला शुरू करना भारत का प्राथमिक कर्तव्य होना चाहिए, लेकिन मौजूदा प्रशासन ने इस कदम से स्पष्ट रूप से किनारा कर लिया है।’ गलवान घाटी संघर्ष और पहलगाम घटना के बावजूद बीजिंग से व्यापारिक संबंध न तोड़ पाने को पार्टी ने बड़ी विफलता बताया।

‘कोई भरोसेमंद वैश्विक सहयोगी नहीं’

संपादकीय में तुलना करते हुए लिखा गया, ‘जहाँ चीन, रूस, यमन और तुर्की ने ईरान को, और चीन ने पाकिस्तान को खुलकर समर्थन दिया, वहीं भारत के पास कोई ऐसा निश्चित और शक्तिशाली वैश्विक सहयोगी नहीं है जो मज़बूती से उसके साथ खड़ा हो।’ आलोचकों का तर्क है कि भारत ने व्यवस्थित रूप से ‘पंचशील’ (शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के पाँच सिद्धांत) और अपनी पारंपरिक ‘गुटनिरपेक्ष’ नीति को त्याग दिया है। पार्टी ने यह भी कहा कि भले ही घरेलू स्तर पर पाकिस्तान को ‘दिवालिया’ बताया जाता हो, पर अमेरिका और चीन जैसी महाशक्तियाँ अपने रणनीतिक हितों के लिए इस्लामाबाद को लगातार मज़बूत कर रही हैं।

पड़ोस में बढ़ती दूरियाँ

संपादकीय में दावा किया गया कि पड़ोसी देशों के साथ कूटनीतिक संबंध ऐतिहासिक रूप से अपने सबसे निचले स्तर पर हैं। ‘नेपाल के प्रधानमंत्री ने हाल ही में सार्वजनिक रूप से घोषणा की कि भारतीय क्षेत्र का एक बड़ा हिस्सा नेपाली नियंत्रण में है,’ संपादकीय ने लिखा — यह संकेत कि काठमांडू अब नई दिल्ली के सामने झुकने के बजाय बीजिंग के साथ मज़बूती से खड़ा है। कभी ‘एकमात्र हिंदू राष्ट्र’ कहा जाने वाला नेपाल अब सांस्कृतिक और रणनीतिक रूप से भारत से दूर हो चुका है।

नेहरू युग से तुलना

ठाकरे गुट ने याद दिलाया कि जवाहरलाल नेहरू के दौर में भारत ने सभी सीमावर्ती पड़ोसी राज्यों के साथ मज़बूत दोस्ती और बातचीत के खुले रास्ते बनाए रखे थे। पार्टी ने तंज़ कसा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इटली जैसे पश्चिमी देशों के दौरे तो लगातार करते हैं, परंतु छोटे और निकटतम पड़ोसी राज्यों के प्रति सक्रिय कूटनीतिक जुड़ाव और सहानुभूति की स्पष्ट कमी दिखाई देती है। आने वाले हफ्तों में यह संपादकीय महाराष्ट्र की राजनीति और विपक्षी गठबंधन की विदेश-नीति पर रणनीति का अहम विमर्श-बिंदु बन सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

पर कई बिंदु पूरी तरह ख़ारिज करने लायक़ नहीं हैं — भारत के पास इज़राइल-अमेरिका या चीन-पाकिस्तान जैसी ‘ऑल-वेदर’ धुरी वाक़ई नहीं है, और पहलगाम के बाद बहुपक्षीय मंचों पर समर्थन सीमित ही रहा। हालाँकि RBI के ‘83 टन सोना बेचने’ का दावा संदर्भ से बाहर है — केंद्रीय बैंक ने हाल के वर्षों में सोने का भंडार बढ़ाया है, बेचा नहीं; इस आरोप को बिना स्वतंत्र सत्यापन के स्वीकार करना जोखिम भरा है। असली सवाल कूटनीतिक है: पड़ोस-प्रथम नीति बार-बार दोहराने के बावजूद नेपाल, मालदीव, बांग्लादेश से दूरियाँ क्यों बढ़ीं? यही जवाबदेही का बिंदु है, जिसे विपक्ष और सरकार दोनों को आँकड़ों पर लड़ना चाहिए, नारों पर नहीं।
RashtraPress
20 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

‘सामना’ संपादकीय में शिवसेना (UBT) ने क्या मुख्य आरोप लगाए हैं?
पार्टी ने आरोप लगाया कि पहलगाम हमले के बाद भारत वैश्विक मंच पर अलग-थलग पड़ गया है और किसी बड़ी शक्ति से बिना शर्त समर्थन नहीं मिल रहा। संपादकीय में घरेलू मंदी, कमज़ोर रुपये और RBI द्वारा कथित 83 टन सोना बेचे जाने का भी ज़िक्र किया गया है।
RBI के 83 टन सोना बेचने का दावा क्या है?
संपादकीय के अनुसार, RBI ने कथित तौर पर ढहती अर्थव्यवस्था को स्थिर करने के लिए राष्ट्रीय कोष से 83 टन सोना बेच दिया और इस कदम को जनता की नज़रों से छिपाकर रखा गया। यह दावा शिवसेना (UBT) का है और इसे स्वतंत्र रूप से सत्यापित नहीं किया गया है।
पार्टी ने चीन को लेकर सरकार पर क्या टिप्पणी की?
शिवसेना (UBT) ने कहा कि स्पष्ट सबूतों के बावजूद सरकार बीजिंग की आधिकारिक तौर पर निंदा करने का राजनीतिक साहस नहीं दिखा पा रही। गलवान घाटी संघर्ष और पहलगाम घटना के बाद भी भारत चीन के साथ व्यापारिक संबंध तोड़ने में विफल रहा है।
नेपाल को लेकर संपादकीय में क्या कहा गया है?
संपादकीय में दावा किया गया कि नेपाल के प्रधानमंत्री ने सार्वजनिक रूप से कहा कि भारतीय क्षेत्र का एक बड़ा हिस्सा नेपाली नियंत्रण में है। पार्टी का तर्क है कि काठमांडू अब नई दिल्ली के सामने झुकने के बजाय बीजिंग के साथ मज़बूती से जुड़ चुका है।
शिवसेना (UBT) ने नेहरू युग की तुलना क्यों की?
पार्टी ने कहा कि नेहरू के दौर में भारत ने सभी सीमावर्ती पड़ोसी देशों के साथ मज़बूत दोस्ती और संवाद के रास्ते खुले रखे थे। इसके विपरीत मोदी सरकार पश्चिमी देशों के दौरों पर ज़ोर देती है, जबकि नज़दीकी पड़ोसियों के प्रति सक्रिय कूटनीतिक जुड़ाव की कमी है।
राष्ट्र प्रेस
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