ब्रिक्स समिट के शाकाहारी मेन्यू पर शिवसेना (यूबीटी) का केंद्र पर हमला, 'खाने की पसंद थोपना गलत'
सारांश
मुख्य बातें
शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) ने गुरुवार, 17 सितंबर 2026 को केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला, यह आरोप लगाते हुए कि नई दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स समिट के गाला डिनर में विदेशी नेताओं को केवल शाकाहारी मेन्यू परोसकर उन पर खाने की पसंद थोपी गई। पार्टी ने अपने मुखपत्र सामना के संपादकीय में यह आपत्ति दर्ज कराई, जो 12 सितंबर 2026 को भारत मंडपम में आयोजित उस डिनर से जुड़ी है, जिसमें 11 सदस्यीय ब्रिक्स समूह के राष्ट्राध्यक्षों को शाकाहारी व्यंजन ही परोसे गए थे।
सामना संपादकीय में क्या कहा गया
सामना के संपादकीय में कहा गया कि खाने की पसंद व्यक्तिगत स्वतंत्रता का विषय है और इसे किसी सरकार या राजनीतिक संगठन को तय नहीं करना चाहिए। संपादकीय ने उस मेन्यू पर कड़ी आपत्ति जताई, जिसमें खांडवी, मशरूम कबाब, पनीर लबाबदार, मिलेट पुलाव, गुजराती स्टाइल ढोकली बेले सारू, जलेबी और फिरनी जैसे व्यंजन शामिल थे।
संपादकीय में व्यंग्यात्मक लहजे में लिखा गया कि इस खाने को परोसना 'मेहमानों को घास और जंगली साग खिलाने' जैसा था। इसमें यह भी कहा गया: 'दुनिया की 80 प्रतिशत आबादी, जिसमें आने वाले ज़्यादातर प्रतिनिधि भी शामिल हैं, मांसाहारी खाना खाती है। मोदी सरकार ने उन पर शाकाहार थोपकर क्या हासिल किया? इसने वैश्विक मंच पर भारत को हंसी का पात्र बना दिया।'
ऐतिहासिक उदाहरणों का हवाला
शिवसेना (यूबीटी) ने अपनी बात पुष्ट करने के लिए कई ऐतिहासिक प्रसंगों का उल्लेख किया। संपादकीय में कहा गया कि जब खान अब्दुल गफ्फार खान और उनका परिवार वर्धा के सेवाग्राम आश्रम में आए थे, तो उनके लिए मुख्य परिसर के बाहर अलग रसोई बनाई गई थी, जहाँ मांसाहारी खाना पकाया जाता था।
इसके अलावा, संपादकीय ने पूर्व प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई का उदाहरण दिया, जो सख्त शराबबंदी के समर्थक थे, लेकिन रूस की राजकीय यात्रा के दौरान उन्होंने स्थानीय परंपरा का सम्मान करते हुए अपने गिलास में वोदका डलवाई थी — भले ही उन्होंने उसे पिया नहीं। साथ ही यह भी उल्लेख किया गया कि चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की महाबलीपुरम यात्रा के दौरान मेन्यू में कई तरह के मांसाहारी व्यंजन शामिल थे और देशभर से विशेष शेफ बुलाए गए थे।
गांधी और विविधता का तर्क
पार्टी ने इस दावे को खारिज किया कि शाकाहारी मेन्यू महात्मा गांधी की जन्मभूमि की भावना को दर्शाता है। संपादकीय में कहा गया कि गांधीजी ने कभी अपनी व्यक्तिगत शाकाहारी पसंद दूसरों पर नहीं थोपी। शिवसेना (यूबीटी) ने यह भी सुझाया कि यदि दिल्ली के करीम के नॉनवेज व्यंजन, तंदूरी चिकन, बिरयानी, बटर चिकन, गोअन फिश करी, कोल्हापुरी पांढरा-तांबड़ा रस्सा और मालवणी फिश परोसे जाते, तो विदेशी मेहमान सच में प्रसन्न होते।
व्यापक सामाजिक संदर्भ और आरोप
संपादकीय ने मामले को केवल डिनर मेन्यू तक सीमित नहीं रखा। इसमें सत्तारूढ़ सरकार और उससे जुड़े संगठनों पर भारत की विविध खान-पान संस्कृति को बदलने का अभियान चलाने का आरोप लगाया गया। विशेष रूप से स्कूलों में मिड-डे मील का ठेका इस्कॉन जैसी संस्थाओं को दिए जाने और बच्चों के खाने से अंडे हटाने के दावों का उल्लेख किया गया। साथ ही, मुंबई जैसे शहरों में मांसाहारी खाने वालों के साथ घर किराये पर लेने में भेदभाव को भी अपराध की श्रेणी में रखा गया।
यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब भारत में खान-पान और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर राजनीतिक बहस लगातार तेज होती जा रही है। ब्रिक्स समिट के मेन्यू को लेकर उठे इस सवाल का जवाब केंद्र सरकार की ओर से अभी तक नहीं आया है।