महाराष्ट्र अकाल पर शिवसेना-यूबीटी का हमला: 'किसान चीख रहा, मंत्री काजू-बादाम उड़ा रहे'
सारांश
मुख्य बातें
शिवसेना (यूबीटी) ने 21 सितंबर 2026 को महाराष्ट्र सरकार पर तीखा हमला बोला और आरोप लगाया कि मराठवाड़ा, उत्तर महाराष्ट्र और विदर्भ के किसान सूखे अकाल से बेहाल हैं, जबकि राज्य के मंत्री और जनप्रतिनिधि अकाल दौरे पर काजू-बादाम उड़ा रहे हैं। पार्टी के मुखपत्र 'सामना' के संपादकीय में यह तल्ख टिप्पणी की गई, जो अब राजनीतिक बहस का केंद्र बन गई है।
नांदेड़ बैठक का विवाद — अकाल में काजू-बादाम
'सामना' के संपादकीय में नांदेड़ की एक बैठक का हवाला देते हुए कहा गया कि राज्य के कृषि मंत्री दत्तामामा भरणे मराठवाड़ा के अकालग्रस्त क्षेत्रों के दौरे पर गए थे। दौरे से पहले विश्राम गृह में हुई प्रशासनिक बैठक में मंत्री, विधायक और सांसदों की मंडली द्वारा काजू-बादाम और सूखे मेवे खाने की तस्वीरें सामने आईं।
संपादकीय में इस पर कड़े शब्दों में लिखा गया: 'किसान सूखे अकाल के कारण चीख-पुकार कर रहा है और सरकार सूखा मेवा खाकर डकार ले रही है। किसानों के जख्मों पर नमक छिड़कने का काम है।'
सांसद बंडू जाधव और '50-50 करोड़' वाला तंज
शिवसेना-यूबीटी के मुखपत्र ने सांसद बंडू जाधव पर भी निशाना साधा, जिन्होंने कथित तौर पर अकाल बैठक में काजू-बादाम खाने का खुलेआम समर्थन किया था। संपादकीय में तंज कसा गया: '50-50 करोड़ रुपए खाकर डकार लेने वालों की भूख मिटी नहीं है। और फिर अकाल की बैठक में भूख लगी इसलिए काजू-बादाम खाने हैं — यह कैसी रीति है?'
यह टिप्पणी न केवल इस एक घटना पर, बल्कि सत्तारूढ़ गठबंधन की व्यापक कार्यसंस्कृति पर भी सवाल उठाती है।
फडणवीस की सफाई और यूबीटी की प्रतिक्रिया
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने इस विवाद पर कहा कि ऐसे काजू-बादाम खाना ठीक नहीं है और प्रशासन को संवेदनशील रहना चाहिए। उन्होंने विपक्ष पर हर चीज की राजनीति करने का आरोप भी लगाया।
हालाँकि, 'सामना' ने इस सफाई को नाकाफी बताया और लिखा कि मुख्यमंत्री फडणवीस ने काजू-बादाम का ठीकरा प्रशासन पर फोड़ दिया, जबकि जिम्मेदारी राजनीतिक नेतृत्व की है। फडणवीस ने यह भी कहा कि मंत्रिमंडल की बैठक में इस गंभीर स्थिति पर चर्चा हुई है और सभी जिलों की समीक्षा के बाद फसलों के आधिकारिक पंचनामे कराकर किसानों को आर्थिक मदद दी जाएगी।
खेत पर तबाही — सोयाबीन से चूल्हे तक
संपादकीय में महाराष्ट्र के ग्रामीण संकट की गहरी तस्वीर पेश की गई। कहा गया कि राज्य में खड़ी फसलों का भारी नुकसान हुआ है और सोयाबीन जैसी फसलें जल चुकी हैं। किसान खेत की मेड़ पर बैठकर रो रहा है। मवेशियों का चारा, पीने का पानी, बच्चों की शिक्षा, बेटियों की शादियाँ और बुझते हुए चूल्हे — यह भयानक तस्वीर महाराष्ट्र देख रहा है।
यह ऐसे समय में आया है जब मानसून की वापसी का सफर शुरू हो चुका है और मराठवाड़ा, उत्तर महाराष्ट्र व विदर्भ में अकाल के हालात गहरे होते जा रहे हैं। 'सामना' ने यह भी लिखा कि प्रधानमंत्री के जन्मदिन पर हजारों दिए जलाए गए, लेकिन अकाल का साया उससे दूर नहीं होगा।
शिवसेना-यूबीटी की माँगें
उद्धव ठाकरे की पार्टी ने सरकार से पाँच प्रमुख माँगें रखी हैं। पहली — अकाल के मुद्दे पर विधानसभा का विशेष सत्र बुलाकर चर्चा हो। दूसरी — सर्वदलीय 'टास्क फोर्स' का गठन किया जाए। तीसरी — शरद पवार के सुझाव के अनुसार, बिना किसी औपचारिक मानदंड का इंतजार किए राज्य में अकाल घोषित किया जाए। चौथी — किसानों को प्रति हेक्टेयर ₹50,000 की सहायता और पूर्ण एकमुश्त कर्जमाफी। पाँचवीं — विद्यार्थियों की शैक्षणिक फीस माफी और चारा छावनियाँ शुरू की जाएँ।
गौरतलब है कि यह पहली बार नहीं है जब महाराष्ट्र में किसान संकट को लेकर विपक्ष सड़क से विधानसभा तक आवाज उठा रहा है। आने वाले दिनों में सरकार की आधिकारिक प्रतिक्रिया और पंचनामे की प्रक्रिया ही यह तय करेगी कि राहत कितनी तेज़ी से ज़मीन पर पहुँचती है।