स्नान पूर्णिमा पर पद्मश्री सुदर्शन पटनायक ने पुरी बीच पर बनाई जगन्नाथ की भव्य रेत कलाकृति
सारांश
मुख्य बातें
पद्मश्री पुरस्कार विजेता और अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त सैंड आर्टिस्ट सुदर्शन पटनायक ने 29 जून 2025 को पुरी बीच, ओडिशा पर स्नान पूर्णिमा के पावन अवसर पर एक भव्य रेत कलाकृति का निर्माण किया, जिसमें 'जय जगन्नाथ' और 'स्नान पूर्णिमा' का संदेश उकेरा गया। यह कलाकृति महाप्रभु जगन्नाथ के दिव्य प्राकट्य दिवस और पवित्र स्नान उत्सव को समर्पित है।
कलाकृति का विवरण
सुदर्शन पटनायक द्वारा निर्मित यह रेत कलाकृति 8 फुट ऊँची और 18 फुट चौड़ी है। इसमें स्नान पूर्णिमा की उस पावन रस्म को जीवंत रूप दिया गया है, जिसमें भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र, देवी सुभद्रा और सुदर्शन चक्र को 108 घड़े पवित्र जल से स्नान कराया जाता है। यह कलाकृति सुदर्शन सैंड आर्ट इंस्टीट्यूट के छात्रों के सहयोग से तैयार की गई।
स्नान पूर्णिमा का महत्व
स्नान पूर्णिमा जगन्नाथ परंपरा के सर्वाधिक पवित्र पर्वों में से एक है, जो ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा को मनाई जाती है। इसे महाप्रभु जगन्नाथ के दिव्य प्राकट्य दिवस के रूप में भी जाना जाता है। गौरतलब है कि यह उत्सव वार्षिक रथ यात्रा की शुरुआत का प्रतीक माना जाता है, जो ओडिशा की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहचान का केंद्र है।
कलाकार का संदेश
इस अवसर पर सुदर्शन पटनायक ने कहा, 'स्नान पूर्णिमा का बहुत बड़ा आध्यात्मिक महत्व है। इस रेत की कलाकृति के ज़रिए, मैं महाप्रभु जगन्नाथ से प्रार्थना करता हूँ और सभी की शांति, समृद्धि और भलाई के लिए आशीर्वाद माँगता हूँ।' इस कलात्मक श्रद्धांजलि के माध्यम से उन्होंने ओडिशा की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के प्रति सम्मान और भक्ति का भाव व्यक्त किया।
श्रद्धालुओं और पर्यटकों की प्रतिक्रिया
मुंबई से आए पर्यटक प्रीतम पटनायक ने कहा, 'मैं स्नान पूर्णिमा देखने पुरी आया हूँ। समुद्र तट पर टहलते हुए अचानक सुदर्शन पटनायक की यह रेत कलाकृति देखी — यह सचमुच बहुत सुंदर और प्रभावशाली थी। ऐसा अनुभव किस्मत वालों को ही मिलता है।' उन्होंने सभी से अपील की कि वे जीवन में एक बार अवश्य पुरी आकर महाप्रभु जगन्नाथ का आशीर्वाद लें।
सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण
सुदर्शन पटनायक वर्षों से अपनी रेत कलाकृतियों के ज़रिए भारतीय पर्वों, सामाजिक संदेशों और आध्यात्मिक परंपराओं को वैश्विक मंच पर प्रस्तुत करते आए हैं। यह कलाकृति न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि ओडिशा की जीवंत सांस्कृतिक विरासत को भी रेखांकित करती है। आने वाले दिनों में रथ यात्रा के साथ यह उत्सव और भव्य रूप धारण करेगा।