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RSS प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर: 1947 में संघ की शक्ति होती तो देश का विभाजन न होता

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RSS प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर: 1947 में संघ की शक्ति होती तो देश का विभाजन न होता

सारांश

RSS के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने दावा किया कि 1947 में संघ की शक्ति पर्याप्त होती तो देश का विभाजन न होता। 'दिल्ली में संघ यात्रा' डॉक्यूमेंट्री के प्रदर्शन पर यह बयान आया — जो 60 से अधिक साक्षात्कारों और 100 घंटे की फुटेज पर आधारित है।

मुख्य बातें

RSS के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने 22 मई को कहा कि 1947 में संघ की पर्याप्त शक्ति होती तो देश का विभाजन नहीं होता।
1942 से 1947 के बीच दिल्ली और पंजाब में संघ का तेज़ विस्तार हुआ, बड़ी संख्या में लोग जुड़े।
विभाजन के दौरान स्वयंसेवकों ने पाकिस्तान से हिंदुओं को सुरक्षित लाने में भूमिका निभाई; विस्थापित कैंपों में कई लाख लोग रहे।
डॉक्यूमेंट्री निर्माण में 60 से अधिक वरिष्ठ कार्यकर्ताओं के साक्षात्कार, 85 से अधिक पुस्तकें और 100 घंटे से अधिक की वीडियो फुटेज का अध्ययन किया गया।
संघ शताब्दी वर्ष पर विशेषांक 'राष्ट्र सेवा के 100 वर्ष' का भी विमोचन हुआ।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने 22 मई 2026 को नई दिल्ली में कहा कि 1942 से 1947 के बीच दिल्ली और संपूर्ण पंजाब में संघ का तेज़ी से विस्तार हुआ, किंतु विभाजन के समय संघ की शक्ति पर्याप्त नहीं थी — उनके अनुसार यदि वह शक्ति होती, तो देश का विभाजन नहीं होता। वह इंद्रप्रस्थ विश्व संवाद केंद्र द्वारा प्रस्तुत डॉक्यूमेंट्री 'दिल्ली में संघ यात्रा' के प्रदर्शन अवसर पर बोल रहे थे।

विभाजन के दौर में संघ की भूमिका

आंबेकर ने कहा कि डॉक्यूमेंट्री में भी दर्शाया गया है कि तत्कालीन सरसंघचालक गुरुजी (माधव सदाशिव गोलवलकर) का स्पष्ट निर्देश था कि नवगठित पाकिस्तान में रह गए हिंदुओं की पूरी तरह रक्षा होनी चाहिए और अंतिम व्यक्ति के सुरक्षित भारत पहुँचने तक स्वयंसेवक अपने स्थान पर डटे रहें।

उन्होंने बताया कि अगस्त 1947 के पहले पखवाड़े में, जब दिल्ली में उथल-पुथल चरम पर थी, गुरुजी स्वयं कराची में थे और वहाँ से स्वयंसेवकों को हिंदू समाज की सुरक्षा के लिए मार्गदर्शन दे रहे थे। इस कार्य में अनगिनत स्वयंसेवकों का बलिदान हुआ और विस्थापितों के लिए लगाए गए कैंपों में कई लाख लोग आश्रय पाने पहुँचे।

डॉ. हेडगेवार के उद्देश्य और संघ की स्थापना

आंबेकर ने संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के दृष्टिकोण को रेखांकित करते हुए कहा कि यदि उन्हें राजनीति करनी होती, तो वे एक नया राजनीतिक दल स्थापित कर सकते थे। परंतु उनका लक्ष्य समाज में सांस्कृतिक जागरण लाना, उसे संगठित करना और राष्ट्र को आत्मविश्वास के साथ खड़ा करना था — इसी उद्देश्य से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की नींव रखी गई।

गौरतलब है कि दिल्ली में संघ कार्य का शुभारंभ डॉ. हेडगेवार के कार्यकाल में ही हो गया था, जो संघ के 100 वर्षों के इतिहास से दिल्ली के गहरे जुड़ाव को दर्शाता है।

डॉक्यूमेंट्री का निर्माण और शोध प्रक्रिया

दिल्ली प्रांत प्रचार प्रमुख रीतेश अग्रवाल ने बताया कि इस डॉक्यूमेंट्री के निर्माण के लिए दिल्ली के 60 से अधिक वरिष्ठ कार्यकर्ताओं के साक्षात्कार लिए गए, 85 से अधिक पुस्तकों का अध्ययन किया गया और विभिन्न अभिलेखागारों से सामग्री एकत्र की गई। इस प्रक्रिया में 100 घंटे से अधिक की वीडियो फुटेज देखी गई।

उन्होंने बताया कि यह डॉक्यूमेंट्री दिल्ली में संघ की पहली शाखा से लेकर आज के व्यापक विस्तार तक की यात्रा को साक्ष्यों, स्मृतियों और ऐतिहासिक घटनाओं के माध्यम से प्रस्तुत करती है। संघ शताब्दी वर्ष पर 'अपनी दिल्ली अपनी बात' द्वारा प्रकाशित विशेषांक 'राष्ट्र सेवा के 100 वर्ष' की भी इस अवसर पर चर्चा की गई।

अन्य वक्ताओं के विचार

दिल्ली प्रांत संघचालक डॉ. अनिल अग्रवाल ने कहा कि निरंतरता और अनुकूलनशीलता संघ कार्य की प्रमुख विशेषताएँ हैं। इस अवसर पर संघ के केंद्रीय कार्यालय सचिव अशोक पोरवाल, दिल्ली प्रांत प्रचारक विशाल, दिल्ली प्रांत सह कार्यवाह राजेश, केंद्रीय कार्यालय व्यवस्था टोली सदस्य दिलीप, उत्तर क्षेत्र कार्यालय सचिव राजवीर तथा इंद्रप्रस्थ विश्व संवाद केंद्र के अध्यक्ष अशोक सचदेवा भी उपस्थित रहे।

यह आयोजन संघ की शताब्दी यात्रा के परिप्रेक्ष्य में हुआ — एक ऐसे दौर में जब संगठन अपने इतिहास का पुनर्मूल्यांकन कर रहा है और आने वाली पीढ़ियों तक उसे दस्तावेज़ीकृत रूप में पहुँचाने का प्रयास कर रहा है।

संपादकीय दृष्टिकोण

एक राजनीतिक रूप से संवेदनशील दावा है जो ऐतिहासिक तथ्यों के बजाय एक वैकल्पिक इतिहास की कल्पना पर टिका है। यह बयान संघ शताब्दी वर्ष के संदर्भ में आया है, जब संगठन अपनी ऐतिहासिक भूमिका को व्यापक जनमानस में स्थापित करने का प्रयास कर रहा है। विभाजन एक बहु-कारणीय त्रासदी थी — सत्ता हस्तांतरण की राजनीति, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और औपनिवेशिक प्रशासन की विफलताएँ इसके केंद्र में थीं — जिसे किसी एक संगठन की उपस्थिति या अनुपस्थिति से नहीं आँका जा सकता। मुख्यधारा की कवरेज इस बयान की ऐतिहासिक जाँच से प्रायः चूक जाती है।
RashtraPress
8 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सुनील आंबेकर ने विभाजन के बारे में क्या कहा?
RSS के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने कहा कि 1947 में देश के विभाजन के समय संघ की शक्ति पर्याप्त नहीं थी — उनके अनुसार यदि वह शक्ति होती, तो देश का विभाजन नहीं होता। यह बयान 22 मई को नई दिल्ली में 'दिल्ली में संघ यात्रा' डॉक्यूमेंट्री के प्रदर्शन अवसर पर दिया गया।
'दिल्ली में संघ यात्रा' डॉक्यूमेंट्री क्या है?
यह इंद्रप्रस्थ विश्व संवाद केंद्र द्वारा निर्मित डॉक्यूमेंट्री है जो दिल्ली में RSS की पहली शाखा से लेकर आज के विस्तार तक की यात्रा को दर्शाती है। इसके निर्माण में 60 से अधिक वरिष्ठ कार्यकर्ताओं के साक्षात्कार, 85 से अधिक पुस्तकें और 100 घंटे से अधिक की वीडियो फुटेज का उपयोग किया गया।
विभाजन के दौरान RSS स्वयंसेवकों ने क्या भूमिका निभाई?
आंबेकर के अनुसार, तत्कालीन सरसंघचालक गुरुजी का निर्देश था कि पाकिस्तान में रह गए हिंदुओं की रक्षा की जाए और अंतिम व्यक्ति के सुरक्षित आने तक स्वयंसेवक डटे रहें। अगस्त 1947 में गुरुजी स्वयं कराची में रहकर स्वयंसेवकों का मार्गदर्शन कर रहे थे, और विस्थापितों के लिए लगाए गए कैंपों में कई लाख लोग आश्रय पाने पहुँचे।
डॉ. हेडगेवार ने राजनीतिक दल की जगह RSS क्यों बनाया?
आंबेकर ने कहा कि डॉ. हेडगेवार का उद्देश्य राजनीति नहीं, बल्कि समाज में सांस्कृतिक जागरण लाना और पूरे राष्ट्र को आत्मविश्वास के साथ खड़ा करना था। इसीलिए उन्होंने एक राजनीतिक दल की बजाय सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन के रूप में RSS की स्थापना की।
RSS शताब्दी वर्ष पर कौन-से आयोजन हो रहे हैं?
RSS के शताब्दी वर्ष के अवसर पर 'दिल्ली में संघ यात्रा' जैसी डॉक्यूमेंट्री का प्रदर्शन और 'अपनी दिल्ली अपनी बात' द्वारा विशेषांक 'राष्ट्र सेवा के 100 वर्ष' का प्रकाशन किया गया है। इन आयोजनों के माध्यम से संघ अपने इतिहास को दस्तावेज़ीकृत कर आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाने का प्रयास कर रहा है।
राष्ट्र प्रेस
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