क्या तीन फीसदी स्वयंसेवक बनकर हम समाज में सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं? : सुनील आंबेकर

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क्या तीन फीसदी स्वयंसेवक बनकर हम समाज में सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं? : सुनील आंबेकर

सारांश

क्या आप जानते हैं कि अगर केवल तीन फीसदी लोग भी स्वयंसेवक बन जाएं, तो समाज में सकारात्मक बदलाव लाया जा सकता है? सुनील आंबेकर ने दिल्ली महोत्सव 2026 में यह विचार साझा किया। जानें, इसके पीछे का विचार क्या है और संघ की यात्रा के महत्वपूर्ण पहलुओं पर।

मुख्य बातें

तीन फीसदी स्वयंसेवक बनकर समाज में बदलाव लाया जा सकता है।
हेडगेवार ने संघ की स्थापना की और अनुशासन के नियम बनाए।
संघ की शाखाएं स्थानीय लोगों को एकजुट करती हैं।
प्रत्येक शाखा में व्यायाम और चर्चाएं होती हैं।
संघ का उद्देश्य राष्ट्रीयता और संस्कृति को बढ़ावा देना है।

नई दिल्ली, 4 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने रविवार को 'दिल्ली महोत्सव 2026' में भाग लिया और संघ के सफर पर अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि यदि तीन फीसदी लोग भी स्वयंसेवक बनें, तो समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाया जा सकता है।

कार्यक्रम के दौरान, आंबेकर ने संघ की 100 साल की यात्रा पर कहा, "संघ के संस्थापक हेडगेवार का जीवन राष्ट्रीयता के साथ गहराई से जुड़ा हुआ है। हेडगेवार का मानना था कि स्वतंत्रता के बाद भी देश की स्वाधीनता बनी रहनी चाहिए और राष्ट्र को वैभव तक पहुँचाना चाहिए। उन्होंने यह तय किया कि राष्ट्र सर्वोपरि है, और इसके लिए हमें मिलकर कार्य करना होगा। हमें उत्तम लोग तैयार करने होंगे और सभी हिंदू समाज को एकजुट करना होगा। इसी उद्देश्य से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की गई।"

सुनील आंबेकर ने कहा, "हेडगेवार ने शाखा पद्धति का विकास किया और संगठन के लिए अनुशासन के नियम स्थापित किए। उनकी दूरदर्शिता का उदाहरण है कि उन्होंने अगले 54 वर्षों तक गुरु गोलवलकर और बालासाहेब देवरस के रूप में लीडरशिप का निर्माण किया, जो कि बहुत कठिन होता है। हेडगेवार ने ऐसा संगठन तैयार किया, जहाँ राजनीतिक अनुकूलता और विपरीतता, दोनों स्थितियों में संघ की शाखाएं कार्यरत रहती हैं। यही कारण है कि संघ ने 100 वर्षों का सफर तय किया है और आगे भी जब तक देश को इसकी आवश्यकता रहेगी, संघ कार्य करता रहेगा।"

आंबेकर ने संघ शाखाओं के महत्व पर भी चर्चा की। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखाओं में जीवन के कई महत्वपूर्ण मूल्य जुड़े होते हैं। एक घंटे की शाखाओं में स्थानीय लोग इकट्ठा होते हैं, व्यायाम करते हैं, चर्चाएं होती हैं और महापुरुषों के जीवन को याद किया जाता है।

उन्होंने बताया कि शाखाओं में अनुशासन का अभ्यास किया जाता है। विशेष रूप से भगवा ध्वज के सामने हर रोज एक प्रार्थना में संकल्प लिया जाता है कि 'मैं ऐसा व्यक्ति बनूं, जो देश और समाज के लिए आवश्यक है। मेरा यह संकल्प हमेशा बना रहे, जिसमें मुझे देश को परम वैभव के स्तर पर ले जाना है। यही शाखा का स्वरूप है, जो हर उम्र के लिए उपयुक्त है।'

आंबेकर ने बताया कि देशभर में 87,000 से अधिक दैनिक शाखाएं हैं, और 32,000 शाखाएं सप्ताह में एक बार आयोजित होती हैं। इसी प्रकार सुबह और शाम के समय भी विभिन्न शाखाएं लगती हैं।

उन्होंने आगे कहा, "कई लोग संघ की विचारधारा को मानते हैं, और कई लोग संघ के कार्यों में सहयोग करते हैं। मैं यह कहना चाहूंगा, जैसा कि डॉक्टर हेडगेवार ने संकल्प लेते हुए कहा था कि यदि शहरों और गांवों में 1 से 3 फीसदी लोग भी स्वयंसेवक बनते हैं, तो हम समाज में वह वातावरण ला सकते हैं, जो हम चाहते हैं।"

संपादकीय दृष्टिकोण

एक राष्ट्रीय संपादक के रूप में मेरा मानना है कि समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने के लिए हमें संगठित प्रयासों की आवश्यकता है। सुनील आंबेकर का यह विचार कि तीन फीसदी स्वयंसेवक भी बदलाव ला सकते हैं, सच में विचारणीय है। संघ की स्थापना का उद्देश्य सामाजिक एकता और राष्ट्रीयता को बढ़ावा देना है, जो आज के समय में और भी महत्वपूर्ण है।
RashtraPress
13 मई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ क्या है?
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एक स्वयंसेवी संगठन है, जिसका उद्देश्य भारतीय संस्कृति और राष्ट्रीयता को बढ़ावा देना है।
हेडगेवार का योगदान क्या था?
हेडगेवार ने संघ की स्थापना की और संगठन के लिए अनुशासन के नियम बनाए, जिससे संघ को मजबूती मिली।
संघ शाखाओं का महत्व क्या है?
संघ की शाखाएं स्थानीय लोगों को एकजुट करती हैं, जहां व्यायाम, चर्चाएं और महापुरुषों के जीवन का स्मरण किया जाता है।
संघ के कार्यों में कैसे शामिल हो सकते हैं?
आप स्थानीय शाखाओं में शामिल होकर संघ के कार्यों में सहयोग कर सकते हैं।
क्या केवल तीन फीसदी स्वयंसेवक बनकर बदलाव लाया जा सकता है?
जी हां, सुनील आंबेकर के अनुसार, यदि तीन फीसदी लोग स्वयंसेवक बनें, तो समाज में सकारात्मक बदलाव संभव है।
राष्ट्र प्रेस
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