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मोहन भागवत: 1947 में पाकिस्तान से आए लोग शरणार्थी नहीं, मातृभूमि के लिए संघर्ष करने वाले योद्धा थे

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मोहन भागवत: 1947 में पाकिस्तान से आए लोग शरणार्थी नहीं, मातृभूमि के लिए संघर्ष करने वाले योद्धा थे

सारांश

आरएसएस सरसंघचालक मोहन भागवत ने नागपुर में सिंधी समुदाय के एक समारोह में कहा कि 1947 के विभाजन में पाकिस्तान से भारत आए लोग शरणार्थी नहीं बल्कि मातृभूमि और धर्म के प्रति निष्ठा से प्रेरित योद्धा थे, जिन्होंने संपत्ति और करियर से ऊपर अपना देश चुना।

मुख्य बातें

मोहन भागवत ने 2 जुलाई को नागपुर में सिंधु एजुकेशन सोसायटी के 75वें स्थापना दिवस पर संबोधन दिया।
उन्होंने कहा कि 1947 के विभाजन में पाकिस्तान से आए लोग शरणार्थी नहीं, बल्कि मातृभूमि और धर्म के प्रति निष्ठावान योद्धा थे।
भागवत के अनुसार, इन लोगों ने स्वेच्छा से पुरखों की संपत्ति और कारोबार छोड़कर भारत आने का निर्णय लिया।
उन्होंने शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य विवेक-प्राप्ति बताया और कहा कि पहली शिक्षक माता होती है।
भागवत ने जीवन-दर्शन देते हुए कहा — कठिन परिस्थितियों में घुटने नहीं टेकने चाहिए , बल्कि फिर से खड़े होने का प्रयास करना चाहिए।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने 2 जुलाई को नागपुर में स्पष्ट कहा कि 1947 के विभाजन के दौरान पाकिस्तान से भारत आए लोग शरणार्थी नहीं, बल्कि मातृभूमि और धर्म के प्रति अपनी आस्था के लिए संघर्ष करने वाले योद्धा थे। उन्होंने कहा कि इन लोगों ने अपनी पुरखों की संपत्ति, ज़मीन और कारोबार छोड़कर स्वेच्छा से भारत आने का निर्णय लिया।

किस मंच से कही यह बात

भागवत सिंधी समुदाय द्वारा संचालित सिंधु एजुकेशन सोसायटी के 75वें स्थापना दिवस समारोह को संबोधित कर रहे थे। इस अवसर पर उन्होंने विभाजन की पीड़ा और उससे उबरने वाले समुदाय के संघर्ष को केंद्र में रखा।

मुख्य वक्तव्य: शरणार्थी नहीं, विस्थापित योद्धा

भागवत ने कहा कि बंटवारे के समय लोग किसी मजबूरी में नहीं, बल्कि सोच-समझकर सीमा पार कर भारत आए, क्योंकि वे पाकिस्तान में नहीं, भारत में रहना चाहते थे — जहाँ वे पूर्ण स्वतंत्रता के साथ अपने धर्म का पालन कर सकें। उन्होंने कहा, 'वो लोग शरणार्थी नहीं, बल्कि विस्थापित थे। उनको शरणार्थी कहना गलत होगा, क्योंकि वे मातृभूमि और अपने धर्म के प्रति लगाव और निष्ठा के कारण संघर्ष करने वाले योद्धा थे।'

उन्होंने आगे कहा कि 'हालाँकि हम सब भारत को एक रखने की लड़ाई हार गए थे, लेकिन उन्होंने न तो करियर चुना और न ही संपत्ति — उन्होंने अपना देश और धर्म चुना।'

विपरीत परिस्थितियों में खड़े रहने का संदेश

भागवत ने जीवन-दर्शन पर भी बात की। उन्होंने कहा कि कठिन समय में घुटने टेकने की बजाय फिर से खड़े होने का प्रयास करना चाहिए, क्योंकि परिस्थितियों के सामने स्वयं को निर्बल समझने वाले असफल होते हैं, जबकि संघर्ष से उबरने वाले ही अंततः सफल होते हैं।

शिक्षा और जीवन के उद्देश्य पर विचार

आरएसएस प्रमुख ने शिक्षा के वास्तविक उद्देश्य पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि रोज़गार और रोज़ी-रोटी के लिए शिक्षा ज़रूरी है, लेकिन यह उसका अंतिम लक्ष्य नहीं होना चाहिए। विवेक प्राप्ति की असली शिक्षा घर से शुरू होती है, जहाँ माता पहली शिक्षक होती है। उन्होंने कहा कि जीवन का उद्देश्य केवल अपने लिए नहीं, बल्कि अपनों के लिए जीना है — स्वयं नेकी से जीना और सबको नेकी सिखाना।

आगे का संदर्भ

गौरतलब है कि सिंधी समुदाय विभाजन की सबसे बड़ी कीमत चुकाने वाले समुदायों में से एक रहा है। सिंधु एजुकेशन सोसायटी का 75 वर्षों का सफर इसी पुनर्निर्माण की कहानी है। भागवत का यह वक्तव्य उस व्यापक विमर्श के बीच आया है जिसमें विभाजन-पीड़ितों की पहचान और उनके योगदान को ऐतिहासिक दृष्टि से पुनर्परिभाषित करने की माँग उठती रही है।

संपादकीय दृष्टिकोण

जो सिंधी समुदाय जैसे समूहों की राजनीतिक और सांस्कृतिक स्मृति को संघ के व्यापक राष्ट्रवादी आख्यान से जोड़ता है। यह बयान ऐसे समय में आया है जब विभाजन स्मृति को लेकर सार्वजनिक विमर्श तेज़ हो रहा है और 'विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस' जैसे आयोजन राजनीतिक परिदृश्य में स्थान पा रहे हैं। मुख्यधारा की कवरेज अक्सर इस बयान को केवल भावनात्मक श्रद्धांजलि के रूप में पेश करती है, जबकि इसका गहरा निहितार्थ यह है कि विस्थापन को 'बलिदान' के रूप में स्थापित करना भविष्य की नागरिकता और पहचान की राजनीति को भी आकार देता है।
RashtraPress
2 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मोहन भागवत ने विभाजन के समय पाकिस्तान से आए लोगों के बारे में क्या कहा?
मोहन भागवत ने कहा कि 1947 के विभाजन में पाकिस्तान से भारत आए लोग शरणार्थी नहीं, बल्कि मातृभूमि और धर्म के प्रति निष्ठा से प्रेरित योद्धा थे। उन्होंने इन लोगों को 'विस्थापित' कहना अधिक उचित बताया।
भागवत ने यह बयान कहाँ और किस अवसर पर दिया?
यह बयान 2 जुलाई को नागपुर में सिंधी समुदाय द्वारा संचालित सिंधु एजुकेशन सोसायटी के 75वें स्थापना दिवस समारोह में दिया गया। भागवत मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित थे।
भागवत के अनुसार इन लोगों ने पाकिस्तान क्यों छोड़ा?
भागवत ने कहा कि ये लोग किसी मजबूरी में नहीं, बल्कि स्वेच्छा से भारत आए क्योंकि वे पूर्ण स्वतंत्रता के साथ अपने धर्म का पालन करना चाहते थे। उन्होंने पुरखों की संपत्ति, ज़मीन और कारोबार छोड़कर देश और धर्म को प्राथमिकता दी।
भागवत ने शिक्षा के बारे में क्या विचार रखे?
भागवत ने कहा कि रोज़गार के लिए शिक्षा ज़रूरी है, लेकिन यह उसका अंतिम उद्देश्य नहीं होना चाहिए। उनके अनुसार विवेक-प्राप्ति की असली शिक्षा घर से शुरू होती है और माता पहली शिक्षक होती है।
सिंधु एजुकेशन सोसायटी का इस संदर्भ में क्या महत्व है?
सिंधु एजुकेशन सोसायटी सिंधी समुदाय द्वारा संचालित संस्था है, जो विभाजन के बाद विस्थापित हुए सिंधी परिवारों के पुनर्निर्माण प्रयासों का प्रतीक है। इसके 75 वर्ष पूरे होना उस सामुदायिक संघर्ष और पुनरुत्थान की कहानी है जिसे भागवत ने अपने संबोधन का केंद्र बनाया।
राष्ट्र प्रेस
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