झारखंड के लिए 5 मेडल जीतने वाली सुनीता उरांव खेल निदेशालय में कर रहीं झाड़ू-पोछा, मरांडी ने सोरेन सरकार को घेरा
सारांश
मुख्य बातें
झारखंड में थ्रोबॉल और वॉलीबॉल में दो गोल्ड सहित पाँच मेडल जीत चुकीं खिलाड़ी सुनीता उरांव इन दिनों रांची के मोरहाबादी स्थित राज्य खेल निदेशालय परिसर में झाड़ू-पोछा का काम करने को मजबूर हैं। 13 सितंबर 2026 को यह मामला सार्वजनिक होने के बाद नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की सरकार पर तीखा हमला बोला है।
सुनीता की स्थिति: मेडल की चमक, ज़िंदगी में अँधेरा
सुनीता उरांव के अनुसार, उन्हें इस काम के बदले लगभग ₹10,000 प्रतिमाह मिलते हैं — और वह भी अक्सर देरी से। वे प्रतिदिन करीब आठ घंटे काम करती हैं, लेकिन यह राशि किराया और बुनियादी ज़रूरतों में ही खप जाती है।
सुनीता के माता-पिता नहीं हैं और वे अपने भाई-भाभी के साथ रहती हैं। परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद नाज़ुक है — उनका एक भाई ईंट-भट्ठे पर मजदूरी करता है। सुनीता ने स्पष्ट कहा कि आर्थिक मजबूरी के कारण उन्हें यह काम स्वीकार करना पड़ा।
खेल प्रतिभा और उपलब्धियाँ
सुनीता उरांव ने थ्रोबॉल और वॉलीबॉल में झारखंड का प्रतिनिधित्व करते हुए दो गोल्ड, एक सिल्वर समेत कुल पाँच मेडल अर्जित किए हैं। उन्होंने तमिलनाडु और राजस्थान में आयोजित राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में भी भाग लिया है।
यह ऐसे समय में आया है जब राज्य सरकार खेल संस्कृति को बढ़ावा देने के दावे करती रहती है, लेकिन ज़मीनी हकीकत एक गोल्ड मेडलिस्ट की पीड़ा में उजागर हो रही है।
मुख्यमंत्री से लगाई गुहार
सुनीता ने हाल ही में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से अपील की है कि उन्हें उनकी योग्यता और खेल उपलब्धियों के अनुरूप सम्मानजनक सरकारी रोज़गार दिलाया जाए। उनका कहना है कि वे अपनी मेहनत और खेल प्रतिभा के दम पर आगे बढ़ना चाहती हैं, न कि दया की भिक्षा पर।
मरांडी का सरकार पर हमला
नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने आरोप लगाया कि झारखंड सरकार खेल प्रतिभाओं के हित में काम करने के बजाय प्रचार-प्रसार और अन्य मदों में करोड़ों रुपये खर्च कर रही है। उन्होंने सीधे मुख्यमंत्री से सवाल किया: 'यदि सरकार के पास विज्ञापन और प्रचार के लिए संसाधन हैं, तो सुनीता जैसी प्रतिभावान बेटी के सम्मानजनक भविष्य के लिए क्यों नहीं?'
गौरतलब है कि झारखंड में आदिवासी और ग्रामीण खिलाड़ियों की उपेक्षा का यह कोई पहला मामला नहीं है। राज्य में खेल नीति की खामियाँ और क्रियान्वयन की कमज़ोरी बार-बार सवालों के घेरे में रही है।
आगे क्या होगा
इस मामले के सार्वजनिक होने के बाद राजनीतिक दबाव बढ़ रहा है। खेल विशेषज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की माँग है कि झारखंड सरकार तत्काल खेल कोटे के तहत सुनीता उरांव को उचित पद पर नियुक्त करे। अब देखना यह है कि हेमंत सोरेन सरकार इस मामले में क्या कदम उठाती है और क्या सुनीता को न्याय मिलता है।