सुप्रीम कोर्ट में 5 नए न्यायाधीश नियुक्त, राष्ट्रपति मुर्मु ने दी मंजूरी; वी. सुब्रमणि मोहना बार से सीधे बेंच तक
सारांश
मुख्य बातें
सर्वोच्च न्यायालय को 1 जून 2025 को पाँच नए न्यायाधीश मिले, जब राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाले कॉलेजियम की सिफारिशों पर अपनी मुहर लगाई। नव-नियुक्त न्यायाधीशों में चार उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीश और एक वरिष्ठ अधिवक्ता शामिल हैं, जो बार से सीधे शीर्ष अदालत की पीठ तक पहुँचने वाले विरले उदाहरणों में से एक हैं।
नियुक्त न्यायाधीशों के नाम
केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने एक्स पर पोस्ट करते हुए बताया कि संविधान के अनुच्छेद 124(2) के तहत प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए राष्ट्रपति ने मुख्य न्यायाधीश से परामर्श के बाद निम्नलिखित को सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त किया है: न्यायमूर्ति शील नागू (पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय), न्यायमूर्ति चंद्रशेखर (बॉम्बे उच्च न्यायालय), न्यायमूर्ति संजीव सचदेवा (मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय), न्यायमूर्ति अरुण पल्ली (जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय) तथा वरिष्ठ अधिवक्ता वी. सुब्रमणि मोहना।
वी. सुब्रमणि मोहना: एक असाधारण सफर
वी. सुब्रमणि मोहना उन चुनिंदा विधिवेत्ताओं में शामिल हैं जिन्होंने वकालत से सीधे सर्वोच्च न्यायालय की न्यायाधीश बनने तक का सफर तय किया — एक ऐसी नियुक्ति जो न्यायपालिका में दुर्लभ मानी जाती है। वह एक ऐसे परिवार में जन्मीं जिसका कानून के पेशे से कोई संबंध नहीं था। वर्ष 1983 में जब भारत में पहली बार पाँच वर्षीय एकीकृत विधि पाठ्यक्रम शुरू हुआ, तब उन्होंने कोयंबटूर के गवर्नमेंट लॉ कॉलेज के उस ऐतिहासिक पहले बैच में प्रवेश लिया था।
न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने की पृष्ठभूमि
यह नियुक्तियाँ ऐसे समय में आई हैं जब केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 5 मई 2025 को सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या 33 से बढ़ाकर 37 करने के प्रस्ताव को मंजूरी दी थी। संविधान के अनुच्छेद 124(1) के अनुसार यह अधिकार संसद के पास है। सरकार संसद के अगले सत्र में संबंधित विधेयक पेश करेगी, जिसके बाद 1956 के कानून में संशोधन किया जाएगा।
आगे क्या होगा
कानून लागू होने के बाद नव-सृजित रिक्त पदों को भरने के लिए कॉलेजियम अतिरिक्त नामों की सिफारिश कर सकेगा। गौरतलब है कि सर्वोच्च न्यायालय में लंबित मामलों की बड़ी संख्या को देखते हुए न्यायाधीशों की संख्या में यह वृद्धि न्यायिक प्रशासन की दृष्टि से महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इन पाँच नई नियुक्तियों के साथ शीर्ष अदालत की कार्यक्षमता में उल्लेखनीय सुधार की उम्मीद है।