सुप्रीम कोर्ट ने आर्ट ऑफ लिविंग का ₹5 करोड़ जुर्माना रद्द किया, यमुना बाढ़ क्षेत्र विवाद में बड़ा फैसला
सारांश
मुख्य बातें
सर्वोच्च न्यायालय ने 22 अगस्त 2026 को आर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन और उसके पंजीकृत ट्रस्ट व्यक्ति विकास केंद्र पर राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (NGT) द्वारा लगाया गया ₹5 करोड़ का पर्यावरणीय मुआवजा रद्द कर दिया। यह जुर्माना मार्च 2016 में नई दिल्ली के यमुना बाढ़ क्षेत्र में आयोजित 'विश्व संस्कृति महोत्सव' के दौरान कथित पर्यावरणीय क्षति के आधार पर लगाया गया था। लगभग 10 वर्षों की कानूनी लड़ाई के बाद आया यह फैसला संस्था के लिए निर्णायक राहत है।
मुख्य घटनाक्रम
शीर्ष अदालत ने दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) को निर्देश दिया कि वह व्यक्ति विकास केंद्र द्वारा पहले ही जमा की जा चुकी ₹5 करोड़ की राशि वापस लौटाए। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि आर्ट ऑफ लिविंग के आयोजन से यमुना के इको-सेंसिटिव जोन को हुई क्षति का कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य रिकॉर्ड पर नहीं है।
DDA की जिम्मेदारी पर कोर्ट की टिप्पणी
न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि DDA यमुना के इको-सेंसिटिव जोन की सुरक्षा की अपनी संवैधानिक और कानूनी जिम्मेदारी निभाने में विफल रहा। साथ ही कोर्ट ने DDA को निर्देश दिया कि वह NGT के आदेशों के अनुरूप यमुना बाढ़ क्षेत्र के पुनर्वास (rehabilitation) का कार्य जारी रखे।
विवाद की पृष्ठभूमि
गौरतलब है कि मार्च 2016 में श्री श्री रवि शंकर द्वारा स्थापित आर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन ने यमुना के बाढ़ मैदानों पर तीन दिवसीय 'विश्व संस्कृति महोत्सव' का आयोजन किया था। आलोचकों और पर्यावरण विशेषज्ञों ने आरोप लगाया था कि इस आयोजन से नदी के संवेदनशील पारिस्थितिक तंत्र और जैव विविधता को भारी नुकसान पहुँचा। इसके बाद NGT ने संस्था पर ₹5 करोड़ का पर्यावरणीय मुआवजा लगाया, जिसे फाउंडेशन ने जमा भी किया। यह ऐसे समय में आया है जब यमुना के बाढ़ क्षेत्र में निर्माण और आयोजनों पर नियामकीय सख्ती को लेकर बहस जारी है।
आगे क्या होगा
सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले के बाद DDA को अब जमा राशि वापस करनी होगी। यमुना बाढ़ क्षेत्र के पुनर्वास का कार्य NGT के दिशानिर्देशों के अंतर्गत जारी रहेगा। पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला भविष्य में इको-सेंसिटिव क्षेत्रों में आयोजनों की अनुमति और निगरानी से जुड़े कानूनी ढाँचे को प्रभावित कर सकता है।