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सूरत नगर निगम ने नासिरनगर विध्वंस मामले में 5 इंजीनियर निलंबित किए, गुजरात हाई कोर्ट की जांच तेज

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सूरत नगर निगम ने नासिरनगर विध्वंस मामले में 5 इंजीनियर निलंबित किए, गुजरात हाई कोर्ट की जांच तेज

सारांश

सूरत में 30 मई को 106 घरों के विवादास्पद विध्वंस का मामला अब गुजरात हाई कोर्ट की कड़ी निगरानी में है। SMC ने 5 इंजीनियर निलंबित किए, पर अदालत ने पुलिस की 16 दिन की चुप्पी और निजी बिल्डर की संभावित भूमिका पर गहरे सवाल उठाए हैं।

मुख्य बातें

सूरत नगर निगम (SMC) ने 1 जुलाई 2026 को पाँच सिविल इंजीनियरों को तत्काल प्रभाव से निलंबित किया।
विवाद 30 मई को नासिरनगर में लगभग 106 घरों के विध्वंस से जुड़ा है, जो कथित तौर पर बिना पूर्व सूचना के हुआ।
निलंबित अधिकारियों में कार्यकारी अभियंता सुजलकुमार प्रजापति और जयंग जीवनरामजीवाला प्रमुख हैं।
गुजरात उच्च न्यायालय ने 29 जून की सुनवाई में पुलिस की 16 दिन की निष्क्रियता पर सवाल उठाए।
अदालत ने यह भी जाँचने को कहा कि क्या विध्वंस किसी निजी विकास परियोजना को लाभ पहुँचाने के लिए हुआ — ये आरोप अभी साबित नहीं हुए हैं।
मामले की अगली सुनवाई 2 जुलाई को निर्धारित है।

सूरत नगर निगम (SMC) ने 1 जुलाई 2026 को पाँच सिविल इंजीनियरिंग अधिकारियों को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया और नासिरनगर में 100 से अधिक घरों के विवादास्पद विध्वंस की विभागीय जाँच के आदेश दिए। यह कार्रवाई ऐसे समय में आई है जब गुजरात उच्च न्यायालय इस पूरे प्रकरण की गहन न्यायिक समीक्षा कर रहा है।

निलंबन का आधार और जाँच समिति की रिपोर्ट

SMC के जनसंपर्क विभाग के अनुसार, यह निलंबन विभागीय जाँच को 'निष्पक्ष, तटस्थ और पारदर्शी' तरीके से संचालित करने के उद्देश्य से किया गया है। निगम द्वारा गठित एक विशेष जाँच समिति की रिपोर्ट आने के बाद यह कदम उठाया गया, जब प्रभावित निवासियों ने उच्च न्यायालय में याचिकाएँ दायर कीं।

निलंबित अधिकारियों में कार्यकारी अभियंता सुजलकुमार प्रजापति और जयंग जीवनरामजीवाला, उप अभियंता अर्पण परमार, सहायक अभियंता मोनिका गधिया तथा कनिष्ठ अभियंता नरेशकुमार गलचर शामिल हैं।

मुख्य घटनाक्रम: 30 मई का विध्वंस अभियान

यह पूरा विवाद सूरत के केंद्रीय क्षेत्र नासिरनगर में 30 मई को चलाए गए विध्वंस अभियान से जुड़ा है। निवासियों का आरोप है कि लगभग 106 घरों को बिना पूर्व सूचना और उचित कानूनी प्रक्रिया के ध्वस्त कर दिया गया। इस घटना ने तत्काल राजनीतिक विवाद और न्यायिक हस्तक्षेप को जन्म दिया।

जाँच में विशेष ध्यान कार्यकारी अभियंता जयंग जीवनरामजीवाला पर केंद्रित है, जो क्षेत्रीय अधिकारी के रूप में विध्वंस की निगरानी कर रहे थे। विध्वंस के दौरान उनके सिर पर रुमाल बाँधकर अभियान की देखरेख करते हुए वीडियो सोशल मीडिया पर व्यापक रूप से प्रसारित हुए थे। खबरों के अनुसार, सार्वजनिक आलोचना बढ़ने पर उन्होंने 8 जून से एक सप्ताह की छुट्टी ले ली थी।

कार्यकारी अभियंता सुजलकुमार प्रजापति पर भी गंभीर आरोप हैं। यद्यपि विध्वंस स्थल कथित तौर पर उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं आता था, तथापि आरोप है कि उन्होंने इस कार्य के लिए तीन पोक्लेन उत्खनन यंत्र, दो जेसीबी तोड़ने वाली मशीनें और लगभग 60 श्रमिकों की तैनाती का निर्देश दिया। साथ ही यह भी आरोप है कि उन्होंने पुलिसकर्मियों की उपस्थिति में विध्वंस कराया, जबकि उनके अपने विभाग का कोई अधिकारी दल के साथ मौजूद नहीं था। ये आरोप चल रही जाँच का हिस्सा हैं।

गुजरात उच्च न्यायालय की सख्त टिप्पणियाँ

29 जून को हुई नवीनतम सुनवाई में उच्च न्यायालय ने सूरत पुलिस आयुक्त अनुपम सिंह गहलोत से पूछा कि विध्वंस के दौरान पुलिसकर्मियों की उपस्थिति के बावजूद 16 दिनों तक कोई कार्रवाई क्यों नहीं की गई। पीठ ने सीमांकन प्रक्रिया में एक पुलिस उपायुक्त सहित वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल उठाए।

रिपोर्टों के अनुसार, उच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि तोड़फोड़ सड़क सीमांकन की आड़ में की गई प्रतीत होती है और इस बात पर जोर दिया कि यदि यह कार्रवाई गैरकानूनी थी, तो मौके पर मौजूद पुलिस अधिकारियों का इसे रोकने का कर्तव्य था। अदालत ने इस कार्रवाई में नामित निजी बिल्डर को भी नोटिस जारी किया है।

निजी विकास परियोजना को लाभ का संदेह

उच्च न्यायालय ने SMC को अपनी आंतरिक जाँच रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है। साथ ही अदालत ने उन आरोपों की भी जाँच करने को कहा है कि यह तोड़फोड़ किसी निजी विकास परियोजना को लाभ पहुँचाने के लिए की गई हो सकती है। गौरतलब है कि ये आरोप अभी न्यायिक विचाराधीन हैं और अभी तक साबित नहीं हुए हैं।

आगे क्या होगा

इस मामले की अगली सुनवाई 2 जुलाई को निर्धारित है। SMC की आंतरिक जाँच रिपोर्ट और उच्च न्यायालय के आगामी निर्देश यह तय करेंगे कि इस प्रकरण में और किन अधिकारियों पर कार्रवाई होगी। यह मामला सरकारी विध्वंस अभियानों में प्रक्रियागत पारदर्शिता और जवाबदेही के व्यापक सवाल भी उठाता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

तीन पोक्लेन और पुलिस की मौजूदगी किसी एक जूनियर अधिकारी की पहल नहीं हो सकती। उच्च न्यायालय का निजी बिल्डर को नोटिस और 16 दिन की पुलिस निष्क्रियता पर सवाल यह संकेत देता है कि अदालत सतह से नीचे देखने को तैयार है।
RashtraPress
1 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सूरत नगर निगम ने किन इंजीनियरों को निलंबित किया और क्यों?
SMC ने कार्यकारी अभियंता सुजलकुमार प्रजापति और जयंग जीवनरामजीवाला, उप अभियंता अर्पण परमार, सहायक अभियंता मोनिका गधिया और कनिष्ठ अभियंता नरेशकुमार गलचर को निलंबित किया। यह निलंबन नासिरनगर में 30 मई को हुए विवादास्पद विध्वंस की विभागीय जाँच को निष्पक्ष रूप से संचालित करने के लिए किया गया है।
नासिरनगर विध्वंस विवाद क्या है?
30 मई 2026 को सूरत के नासिरनगर इलाके में SMC ने लगभग 106 घरों को ध्वस्त किया। निवासियों का आरोप है कि यह विध्वंस बिना पूर्व सूचना और उचित कानूनी प्रक्रिया के हुआ, जिसके बाद उन्होंने गुजरात उच्च न्यायालय में याचिकाएँ दायर कीं।
गुजरात हाई कोर्ट ने इस मामले में क्या कहा है?
29 जून की सुनवाई में उच्च न्यायालय ने सूरत पुलिस आयुक्त से पूछा कि विध्वंस के दौरान पुलिस की मौजूदगी के बावजूद 16 दिन तक कोई कार्रवाई क्यों नहीं हुई। अदालत ने यह भी कहा कि तोड़फोड़ सड़क सीमांकन की आड़ में हुई प्रतीत होती है और एक निजी बिल्डर को नोटिस जारी किया है।
क्या इस विध्वंस में किसी निजी बिल्डर की भूमिका है?
उच्च न्यायालय ने SMC को यह जाँचने का निर्देश दिया है कि क्या विध्वंस किसी निजी विकास परियोजना को लाभ पहुँचाने के लिए किया गया। इस मामले में एक निजी बिल्डर को नोटिस भी जारी किया गया है। हालाँकि ये आरोप अभी न्यायिक विचाराधीन हैं और साबित नहीं हुए हैं।
इस मामले की अगली सुनवाई कब है?
गुजरात उच्च न्यायालय में इस मामले की अगली सुनवाई 2 जुलाई 2026 को निर्धारित है। अदालत ने SMC को अपनी आंतरिक जाँच रिपोर्ट भी प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है।
राष्ट्र प्रेस
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