सूरत नगर निगम ने नासिरनगर विध्वंस मामले में 5 इंजीनियर निलंबित किए, गुजरात हाई कोर्ट की जांच तेज
सारांश
मुख्य बातें
सूरत नगर निगम (SMC) ने 1 जुलाई 2026 को पाँच सिविल इंजीनियरिंग अधिकारियों को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया और नासिरनगर में 100 से अधिक घरों के विवादास्पद विध्वंस की विभागीय जाँच के आदेश दिए। यह कार्रवाई ऐसे समय में आई है जब गुजरात उच्च न्यायालय इस पूरे प्रकरण की गहन न्यायिक समीक्षा कर रहा है।
निलंबन का आधार और जाँच समिति की रिपोर्ट
SMC के जनसंपर्क विभाग के अनुसार, यह निलंबन विभागीय जाँच को 'निष्पक्ष, तटस्थ और पारदर्शी' तरीके से संचालित करने के उद्देश्य से किया गया है। निगम द्वारा गठित एक विशेष जाँच समिति की रिपोर्ट आने के बाद यह कदम उठाया गया, जब प्रभावित निवासियों ने उच्च न्यायालय में याचिकाएँ दायर कीं।
निलंबित अधिकारियों में कार्यकारी अभियंता सुजलकुमार प्रजापति और जयंग जीवनरामजीवाला, उप अभियंता अर्पण परमार, सहायक अभियंता मोनिका गधिया तथा कनिष्ठ अभियंता नरेशकुमार गलचर शामिल हैं।
मुख्य घटनाक्रम: 30 मई का विध्वंस अभियान
यह पूरा विवाद सूरत के केंद्रीय क्षेत्र नासिरनगर में 30 मई को चलाए गए विध्वंस अभियान से जुड़ा है। निवासियों का आरोप है कि लगभग 106 घरों को बिना पूर्व सूचना और उचित कानूनी प्रक्रिया के ध्वस्त कर दिया गया। इस घटना ने तत्काल राजनीतिक विवाद और न्यायिक हस्तक्षेप को जन्म दिया।
जाँच में विशेष ध्यान कार्यकारी अभियंता जयंग जीवनरामजीवाला पर केंद्रित है, जो क्षेत्रीय अधिकारी के रूप में विध्वंस की निगरानी कर रहे थे। विध्वंस के दौरान उनके सिर पर रुमाल बाँधकर अभियान की देखरेख करते हुए वीडियो सोशल मीडिया पर व्यापक रूप से प्रसारित हुए थे। खबरों के अनुसार, सार्वजनिक आलोचना बढ़ने पर उन्होंने 8 जून से एक सप्ताह की छुट्टी ले ली थी।
कार्यकारी अभियंता सुजलकुमार प्रजापति पर भी गंभीर आरोप हैं। यद्यपि विध्वंस स्थल कथित तौर पर उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं आता था, तथापि आरोप है कि उन्होंने इस कार्य के लिए तीन पोक्लेन उत्खनन यंत्र, दो जेसीबी तोड़ने वाली मशीनें और लगभग 60 श्रमिकों की तैनाती का निर्देश दिया। साथ ही यह भी आरोप है कि उन्होंने पुलिसकर्मियों की उपस्थिति में विध्वंस कराया, जबकि उनके अपने विभाग का कोई अधिकारी दल के साथ मौजूद नहीं था। ये आरोप चल रही जाँच का हिस्सा हैं।
गुजरात उच्च न्यायालय की सख्त टिप्पणियाँ
29 जून को हुई नवीनतम सुनवाई में उच्च न्यायालय ने सूरत पुलिस आयुक्त अनुपम सिंह गहलोत से पूछा कि विध्वंस के दौरान पुलिसकर्मियों की उपस्थिति के बावजूद 16 दिनों तक कोई कार्रवाई क्यों नहीं की गई। पीठ ने सीमांकन प्रक्रिया में एक पुलिस उपायुक्त सहित वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल उठाए।
रिपोर्टों के अनुसार, उच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि तोड़फोड़ सड़क सीमांकन की आड़ में की गई प्रतीत होती है और इस बात पर जोर दिया कि यदि यह कार्रवाई गैरकानूनी थी, तो मौके पर मौजूद पुलिस अधिकारियों का इसे रोकने का कर्तव्य था। अदालत ने इस कार्रवाई में नामित निजी बिल्डर को भी नोटिस जारी किया है।
निजी विकास परियोजना को लाभ का संदेह
उच्च न्यायालय ने SMC को अपनी आंतरिक जाँच रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है। साथ ही अदालत ने उन आरोपों की भी जाँच करने को कहा है कि यह तोड़फोड़ किसी निजी विकास परियोजना को लाभ पहुँचाने के लिए की गई हो सकती है। गौरतलब है कि ये आरोप अभी न्यायिक विचाराधीन हैं और अभी तक साबित नहीं हुए हैं।
आगे क्या होगा
इस मामले की अगली सुनवाई 2 जुलाई को निर्धारित है। SMC की आंतरिक जाँच रिपोर्ट और उच्च न्यायालय के आगामी निर्देश यह तय करेंगे कि इस प्रकरण में और किन अधिकारियों पर कार्रवाई होगी। यह मामला सरकारी विध्वंस अभियानों में प्रक्रियागत पारदर्शिता और जवाबदेही के व्यापक सवाल भी उठाता है।