सुरेंद्र राजपूत: क्या भाजपा और चुनाव आयोग के बीच है मिली-जुली कबड्डी?
सारांश
Key Takeaways
- चुनाव आयोग की नई घोषणा पर सवाल उठाए गए हैं।
- सुरेंद्र राजपूत के आरोप भाजपा और आयोग के बीच साठगांठ का संकेत देते हैं।
- राजनीतिक खेल में पारदर्शिता की आवश्यकता है।
- भाजपा द्वारा चुनावी प्रक्रिया में अनैतिकता के आरोप लगाए गए हैं।
- भविष्य में इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं।
लखनऊ, 16 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। चुनाव आयोग ने रविवार को चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में विधानसभा चुनाव की तिथि की घोषणा की। कांग्रेस नेता सुरेंद्र राजपूत ने केरल, असम और पुडुचेरी में 9 अप्रैल को मतदान और 4 मई को परिणाम के बीच के अंतर पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि आयोग और भाजपा को स्पष्ट करना चाहिए कि क्या वे मिली-जुली कबड्डी खेलने का प्रयास कर रहे हैं।
राष्ट्र प्रेस से बात करते हुए सुरेंद्र राजपूत ने कहा कि 9 अप्रैल को मतदान और 4 मई को परिणाम का क्या औचित्य है? क्या इसमें भाजपा की कोई साठगांठ है? एक ओर, आयोग ने बैलट पेपर को हटाने और ईवीएम पर निर्भर रहने का निर्णय लिया है ताकि नतीजे तुरंत मिल सकें। लेकिन, 4 मई को परिणाम आ रहे हैं। चुनाव आयोग और भाजपा को इन सवालों का उचित जवाब देना चाहिए कि क्या वे मिली-जुली कबड्डी खेल रहे हैं।
बंगाल के मुख्य सचिव और गृह सचिव को निर्वाचन आयोग द्वारा हटाने पर कांग्रेस नेता ने कहा कि हमें चुनाव आयुक्त से यही उम्मीद थी। आयोग भाजपा के इशारों पर काम कर रहा है और बंगाल की सरकार को दुश्मन मानता है। जब हम कई राज्यों के मुख्य सचिव या डीजीपी के खिलाफ शिकायत करते थे, तब आयोग ने कोई कार्रवाई नहीं की। यह स्पष्ट है कि चुनाव आयोग पक्षपातपूर्ण है और भाजपा के पक्ष में कार्यवाही करता है।
कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के बयान पर, जिसमें उन्होंने कहा कि 'राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस विधायकों को क्रॉस-वोटिंग के लिए 5-5 करोड़ रुपए का ऑफर दिया गया', सुरेंद्र राजपूत ने कहा कि भाजपा ने इसी तरीके से मध्य प्रदेश में सरकार गिराई। पूर्वोत्तर राज्यों और कर्नाटक में भी यही हुआ। राजस्थान में भी अशोक गहलोत ने इनकी साजिश को नाकाम किया था। भाजपा पैसों के लोभ और लालच देकर लोकतंत्र को कमजोर करने का प्रयास कर रही है, जिसके गंभीर परिणाम भविष्य में सामने आएंगे।