भारतीय टेक्सटाइल उद्योग में सस्टेनेबिलिटी की क्रांति, 2030 तक $350 अरब के लक्ष्य पर मोदी का जोर
सारांश
मुख्य बातें
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 19 सितंबर 2026 को कहा कि सतत विकास (सस्टेनेबिलिटी) भारत की सदियों पुरानी परंपरा और जीवनशैली का अभिन्न हिस्सा रही है, और अब यही दर्शन देश के टेक्सटाइल उद्योग के भविष्य की दिशा तय कर रहा है। उन्होंने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर केंद्रीय वस्त्र मंत्री गिरिराज सिंह का एक लेख साझा करते हुए रेखांकित किया कि कपड़ा रीसाइक्लिंग, स्वच्छ उत्पादन प्रक्रियाएँ और हरित प्रौद्योगिकियाँ भारतीय वस्त्र उद्योग को वैश्विक स्तर पर अधिक प्रतिस्पर्धी बना रही हैं।
मंत्री का विजन: हरित और मजबूत भविष्य
केंद्रीय वस्त्र मंत्री गिरिराज सिंह ने अपने लेख में स्पष्ट किया कि रीसाइक्लिंग, अपशिष्ट पुनर्प्राप्ति, स्वच्छ तकनीक और जिम्मेदार विनिर्माण के जरिए भारतीय टेक्सटाइल उद्योग की प्रतिस्पर्धात्मकता को नई ऊंचाई पर ले जाया जा रहा है। उनके अनुसार, यह बदलाव न केवल पर्यावरण संरक्षण की दिशा में है, बल्कि बाज़ार अवसरों के विस्तार की एक सुविचारित रणनीति भी है।
मंत्री ने प्रधानमंत्री मोदी के उस वक्तव्य का उल्लेख किया जिसमें उन्होंने कहा था कि 'दुनिया फैशन फॉर एनवायरनमेंट एंड एम्पावरमेंट के विजन को अपना रही है और भारत इस दिशा में नेतृत्व कर सकता है।' सिंह के अनुसार, यह परिवर्तन अब भारतीय टेक्सटाइल उद्योग में स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है।
उद्योग का विस्तार: आँकड़े बोलते हैं
देश का घरेलू टेक्सटाइल बाज़ार 2014-15 में लगभग ₹6 लाख करोड़ था, जो अब बढ़कर ₹16 लाख करोड़ से अधिक हो गया है — यह वृद्धि इस क्षेत्र की असाधारण गति और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में इसके बढ़ते योगदान को दर्शाती है। फाइबर, यार्न, फैब्रिक, प्रोसेसिंग, परिधान, तकनीकी वस्त्र और मेड-अप्स जैसे विस्तृत क्षेत्रों में फैला यह उद्योग अब पर्यावरण-अनुकूल उत्पादन मॉडल को तेज़ी से अपना रहा है।
गौरतलब है कि टेक्सटाइल और परिधान क्षेत्र वर्तमान में देश में 5.3 करोड़ से अधिक लोगों को प्रत्यक्ष रोजगार प्रदान करता है, जो इसे कृषि के बाद भारत का सबसे बड़ा नियोक्ता बनाता है।
2030 तक $350 अरब का महत्वाकांक्षी लक्ष्य
केंद्रीय वस्त्र मंत्री ने स्पष्ट किया कि भारत वर्ष 2030 तक $350 अरब (350 बिलियन डॉलर) के टेक्सटाइल और परिधान उद्योग का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहा है। इस महत्वाकांक्षी लक्ष्य के मद्देनज़र सस्टेनेबिलिटी अब केवल एक वैकल्पिक विषय नहीं, बल्कि प्रतिस्पर्धात्मकता, बाज़ार पहुँच और जिम्मेदार विकास की केंद्रीय रणनीति बन गई है।
यह ऐसे समय में आया है जब यूरोपीय संघ समेत कई प्रमुख आयातक देश अपने आपूर्तिकर्ताओं से पर्यावरण-अनुपालन के कठोर मानक माँग रहे हैं। ऐसे में भारत का 'ग्रीन टेक्सटाइल' पर जोर महज़ नैतिक प्रतिबद्धता नहीं, बल्कि बाज़ार पहुँच सुनिश्चित करने की व्यावसायिक आवश्यकता भी है।
रोजगार और सर्कुलर अर्थव्यवस्था का तालमेल
सरकार के अनुसार, आने वाले तीन वर्षों में इस क्षेत्र से करीब 2 करोड़ अतिरिक्त रोजगार सृजित होने की संभावना है। यदि यह लक्ष्य हासिल होता है, तो टेक्सटाइल क्षेत्र भारत के रोजगार संकट को संबोधित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
सर्कुलर अर्थव्यवस्था मॉडल को अपनाने से जहाँ एक ओर कच्चे माल की लागत घटेगी, वहीं दूसरी ओर कार्बन उत्सर्जन में कमी आएगी — जो भारत के अंतरराष्ट्रीय जलवायु प्रतिबद्धताओं के अनुरूप है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि सस्टेनेबिलिटी को नीतिगत समर्थन के साथ-साथ वित्तीय प्रोत्साहन भी मिले, तो भारत वैश्विक टेक्सटाइल आपूर्ति श्रृंखला में चीन के विकल्प के रूप में उभर सकता है।
सरकार की प्रतिबद्धता यह है कि विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच चुनाव न करना पड़े, बल्कि दोनों एक साथ आगे बढ़ें — और यह नीति आने वाले वर्षों में भारतीय टेक्सटाइल उद्योग की वैश्विक पहचान को पुनर्परिभाषित कर सकती है।